गौरैया के लिए कितना कारगर हैं पेंटेड कृत्रिम घोंसले?

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया का हमारे घर-आँगन से मुँह मोड़ने के पीछे आवासीय संकट एक बड़ा कारण है। बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों ने गौरैया के प्राकृतिक ठिकानों को छीन लिया है। ऐसे में गौरैया की ‘घर वापसी’ के लिए कृत्रिम घोंसले लगाने का अभियान ज़ोर-शोर से चल रहा है। आज बाज़ार में प्लाईवुड,…

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया का हमारे घर-आँगन से मुँह मोड़ने के पीछे आवासीय संकट एक बड़ा कारण है। बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों ने गौरैया के प्राकृतिक ठिकानों को छीन लिया है। ऐसे में गौरैया की ‘घर वापसी’ के लिए कृत्रिम घोंसले लगाने का अभियान ज़ोर-शोर से चल रहा है। आज बाज़ार में प्लाईवुड, लकड़ी, बाँस, नारियल के छिलके, गत्ता, मिट्टी और यहाँ तक कि प्लास्टिक व चमड़े से बने घोंसले उपलब्ध हैं। कुछ लोग नि:शुल्क देते हैं तो कुछ लोग शुल्क लेकर देते हैं और कुछ व्यवसाय के जरिये। 

गौरैया के लिए कृत्रिम घोंसला को आकर्षक एवं सुंदर बनाने के लिए डिजाइनदार और कलरफुल बनाया जाता है। इन घोंसलों को लेकर वर्तमान में एक नई बहस छिड़ गई है। क्या पेंट किए गए (रंगीन) घोंसले गौरैया के लिए सुरक्षित हैं? पेंट किये हुए घोंसला को कैमिकल फ्री तो कोई रेडिएशन फ्री घोंसला का दावा कर रहा होता है। गौरैया संरक्षण में जुटे कुछ लोगों का मानना है कि कृत्रिम घोंसलों पर किया गया पेंट पक्षियों के लिए घातक हो सकता है। छत्तीसगढ़ के संजय साहू कहते हैं कैमिकल मुक्त पेंट की जानकारी मांगने पर देते भी नहीं हैं।

इसके पीछे मुख्य कारण, विषाक्तता पेंट में अक्सर सीसा और अन्य हानिकारक रसायन होते हैं। गौरैया अक्सर अपनी चोंच से घोंसले को कुरेदती रहती है, जिससे पेंट के कण उसके शरीर में जाकर उसे बीमार कर सकते हैं। वहीँ, गहरे रंग सूर्य की रोशनी को अधिक सोखते हैं। इससे गर्मियों में घोंसले के अंदर का तापमान अत्यधिक बढ़ सकता है, जो अंडों और चूजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।  लाल, सफ़ेद या चमकीले नीले जैसे भड़कीले रंग शिकारी पक्षियों और जानवरों का ध्यान जल्दी खींचते हैं, जिससे घोंसला असुरक्षित हो जाता है।

कृत्रिम घोंसला चुनते समय ध्यान देना जरुरी है, मसलन प्राकृतिक रंग का हो, घोंसले का रंग भूरा, मटमैला या प्राकृतिक लकड़ी जैसा होना चाहिए ताकि वह वातावरण में घुल-मिल जाए। देवदार जैसी लकड़ी, जूट या नारियल की जटा, मिट्टी  से बने घोंसले गौरैया को सबसे अधिक प्रिय होते हैं। घोंसला का प्रवेश द्वार का आकार-छेद लगभग 32 मिलीमीटर होना चाहिए। यह आकार गौरैया के लिए पर्याप्त है, लेकिन बड़े शिकारी पक्षियों को बाहर रखता है। सुरक्षा के लिये घोंसले को ज़मीन से 8 से 10 फीट की ऊंचाई पर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर लगाएं। इसे ऐसी जगह रखें जहाँ सीधी धूप, बारिश और शोर-शराबा कम हो।

‘नेचर फॉरएवर सोसाइटी’ जैसी संस्थाओं द्वारा डिज़ाइन किए गए प्राकृतिक लकड़ी के घोंसले सबसे प्रभावी माने गए हैं। हालांकि, कुछ मामलों में देखा गया है कि गौरैया ने पेंट किए हुए घोंसलों को भी अपनाया है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से कैमिकल-फ्री और बिना पेंट वाले घोंसले ही सर्वोत्तम हैं। पेंट करें भी तो बाहरी हिस्से में, अंदर नहीं। साथ ही पेंट किये गए घोंसला को पूरी तरह से धूप में सूखा लें ताकि कैमिकल का जहरीला भाग ख़त्म हो जाये। कोशिश हो कि कैमिकल पेंट का इस्तेमाल नहीं हो। वैसे, कैमिकल पेंट में रासायनिक पदार्थ जैसे कि पेट्रोलियम, सॉल्वेंट, और अन्य हानिकारक रसायन होते हैं। कैमिकल पेंट विषाक्त हो सकते हैं और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं। कैमिकल पेंट वातावरण प्रदूषण का कारण बन सकते हैं। जबकि प्राकृतिक पेंट में प्राकृतिक पदार्थ जैसे कि वनस्पति तेल, प्राकृतिक रंग, और अन्य प्राकृतिक सामग्री होते हैं। प्राकृतिक पेंट विषाक्त नहीं होते हैं और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होते हैं। प्राकृतिक पेंट वातावरण अनुकूल होते हैं और प्रदूषण नहीं करते हैं।

यदि आप गौरैया के लिए घोंसला ले रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि वह पूरी तरह प्राकृतिक हो। हमारा उद्देश्य केवल उन्हें छत देना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित जीवन देना भी होना चाहिए।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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