मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकथाम पर संसदीय परामर्श समिति की बैठक

नई दिल्ली ,5 अगस्त/ पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कई राज्यों में मानव -वन्यजीव टकराव को कम करने और स्थान-विशिष्ट प्रबंधन दृष्टिकोण की जरूरत पर बल दिया है। आज नई दिल्ली में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति…

नई दिल्ली ,5 अगस्त/ पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कई राज्यों में मानव -वन्यजीव टकराव को कम करने और स्थान-विशिष्ट प्रबंधन दृष्टिकोण की जरूरत पर बल दिया है। आज नई दिल्ली में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति की एक उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान, मंत्रालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि टकराव के स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न हैं, जिनमें से कई राज्यों में मानव-हाथी टकराव प्रमुख है। बाघों, तेंदुओं, भालुओं, गैंडों, जंगली सूअरों, जंगली भैंसो, बंदरों और अन्य प्रजातियों से जुड़े टकरावों के लिए स्थान-विशिष्ट प्रबंधन दृष्टिकोण की जरूरत है। इस बैठक का एजेंडा मानव-वन्यजीव टकराव (एचडब्ल्यूसी) के मुद्दे पर विचार-विमर्श करना और लोगों तथा वन्यजीवों के बीच टकराव की रोकथाम, शमन और दीर्घकालिक सह-अस्तित्व को मजबूत करने के लिए आवश्यक उपायों पर चर्चा करना था ।

संसदीय समिति को प्रधानमंत्री द्वारा सातवीं राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक के दौरान घोषित मानव-वन्यजीव टकराव उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-एचडब्ल्यूसी) की स्थापना के बारे में जानकारी दी गई। इस केंद्र की स्थापना मानव-वन्यजीव टकराव के प्रभावी प्रबंधन हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, नीतिगत समर्थन, क्षमता निर्माण और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोणों के लिए एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में की गई है। समिति को बताया गया कि 10 जुलाई, 2026 को राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव टकराव पोर्टल का शुभारम्भ किया गया जो टकराव की घटनाओं को दर्ज करने, डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझाकरण और निर्णय समर्थन के लिए एक एकीकृत डिजिटल मंच है। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण पर क्षेत्रीय कार्य योजना (आरएपी) को मंजूरी दे दी गई है।

असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश राज्यों ने अपने मानव-वन्य जीव टकरावों, निवारण उपायों, सामुदायिक भागीदारी पहलों, प्रौद्योगिकी के उपयोग, संस्थागत तंत्रों और राष्ट्रीय प्रयासों को सुदृढ़ करने के लिए सिफारिशों पर प्रकाश डालते हुए प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों में भू-भाग-विशिष्ट योजना, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणालियों, पर्यावास सुधार, वन्यजीव गलियारों के संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, ​​प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, सामुदायिक सहभागिता और अंतर-राज्यीय समन्वय के महत्व को दर्शाया गया।

बैठक की चर्चाओं में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि मानव-वन्यजीव टकराव के प्रभावी प्रबंधन के लिए पारिस्थितिक संरक्षण के साथ-साथ मानव जीवन और उसकी आजीविका की सुरक्षा पर भी विचार करना आवश्यक है। सदस्यों ने जीआईएस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रेडियो टेलीमेट्री और भविष्यसूचक विश्लेषण जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विचार-विमर्श किया, साथ ही अग्रिम पंक्ति की क्षमता को मजबूत करने, मुआवज़ा वितरण में सुधार करने, जन जागरूकता बढ़ाने और संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने के महत्व पर भी बल दिया।

छह राज्यों द्वारा प्रस्तुत किए गए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश ने इस बात पर प्रकाश डाला कि राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के अधिकांश मामले तेंदुओं से संबंधित घटनाओं के हैं, जिनमें तराई क्षेत्र प्रमुख केंद्र है। राज्य ने त्वरित प्रतिक्रिया दल, बचाव केंद्र (4 निर्मित), सौर बाड़, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक स्वयंसेवी कार्यक्रम, वैज्ञानिक निगरानी और संरक्षित क्षेत्रों से परे मजबूत संरक्षण उपायों पर आधारित अपनी रणनीति प्रस्तुत की। समिति ने वैज्ञानिक प्रबंधन पर राज्य के फोकस की सराहना की और उच्च संघर्ष वाले क्षेत्रों में समुदाय-आधारित शमन और निगरानी प्रणालियों को निरंतर मजबूत करने की सलाह दी।

असम : असम सरकार ने हाथियों, बाघों, तेंदुओं, गैंडों, जंगली भैंसों और जंगली सूअरों से जुड़े मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए अपनी भू-भाग आधारित रणनीति प्रस्तुत की। असम ने क्षेत्र-विशिष्ट कार्य योजनाओं को तैयार करने के लिए क्षेत्रीय मानव-वन्यजीव टकराव जोखिम न्यूनीकरण समितियों के गठन पर प्रकाश डाला, जो पर्यावास बहाली, गलियारा संरक्षण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, त्वरित प्रतिक्रिया, सामुदायिक भागीदारी और आजीविका विविधीकरण पर केंद्रित होंगी। समिति ने क्षेत्रीय नियोजन दृष्टिकोण की सराहना की और अन्य संघर्ष-बहुल भू-भागों में इसके अनुकरण के लिए इसके परिणामों के दस्तावेजीकरण पर बल दिया।

कर्नाटक : कर्नाटक ने मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन के लिए अपने एकीकृत छह-स्तंभ मॉडल का प्रदर्शन किया, जो इंजीनियरिंग कार्यक्रम, एआई-सक्षम निगरानी, ​​कमांड सेंटर, त्वरित प्रतिक्रिया दल, सामुदायिक स्वयंसेवक नेटवर्क और ई-परिहारा डिजिटल मुआवजा प्रणाली पर आधारित है। कर्नाटक ने एक राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष मिशन, सामान्य मानक संचालन प्रक्रियाएं, गलियारों का पुनर्स्थापन और सीमा पार हाथी आबादी के प्रबंधन के लिए राज्यों के बीच मजबूत समन्वय का भी सुझाव दिया। समिति ने कर्नाटक के प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण की सराहना की और राज्यों के बीच सर्वोत्तम तौर-तरीकों के व्यापक प्रसार की सिफारिश की।

केरल : केरल ने अपने एकीकृत संस्थागत ढांचे पर प्रकाश डाला, जिसमें मानव-वन्यजीव संघर्ष को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित करना, त्वरित प्रतिक्रिया दल और प्राथमिक प्रतिक्रिया दल तैनात करना, संघर्ष से प्रभावित 273 पंचायतों की पहचान करना और जन जागृत समितियों तथा एसएआरपीए स्वयंसेवक कार्यक्रमों जैसी सामुदायिक पहलों को लागू करना शामिल है। केरल ने वन्यजीव गलियारों के पुनर्स्थापन, पर्यावास प्रबंधन, जिम्मेदार पर्यटन और प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी पर भी बल दिया। संसदीय समिति ने केरल के मजबूत संस्थागत और सामुदायिक दृष्टिकोण की सराहना की और अन्य राज्यों के साथ सफल उपायों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया।

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए अपना ‘रोकथाम प्रथम’ मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से संचालित निगरानी, ​​जीपीएस ट्रैकिंग, ड्रोन, गजरक्षक, त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रजाति-विशिष्ट मानक संचालन प्रक्रियाएं, समयबद्ध मुआवजा और बाघ मित्र, हाथी मित्र और पर्यावरण विकास समितियों के माध्यम से व्यापक सामुदायिक भागीदारी को एकीकृत किया गया है। मध्य प्रदेश ने पर्यावास प्रबंधन, वन्यजीव स्वास्थ्य सहायता और विज्ञान-आधारित प्रजाति प्रबंधन, जिसमें संघर्षग्रस्त जानवरों का स्थानांतरण भी शामिल है, पर भी प्रकाश डाला। संसदीय समिति ने प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और समय पर राहत तंत्र के एकीकरण की सराहना की और पूर्वानुमानित संघर्ष प्रबंधन को और मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया।

उत्तराखंड : उत्तराखंड ने प्राथमिकता वाले भूभागों में संघर्ष को कम करने के लिए एकीकृत कमान एवं नियंत्रण केंद्र, 24×7 हेल्पलाइन (1926), ई-निगरानी, ​​जीपीएस ट्रैकिंग, पर्यावास बहाली, जैव-बाड़बंदी, समय पर मुआवजा और ग्राम-आधारित स्वयंसेवी नेटवर्क के माध्यम से अपनी रणनीतिक कार्ययोजना प्रस्तुत की। राज्य ने वन्यजीव-संवेदनशील भूभाग नियोजन, जिला स्तरीय निगरानी समितियों और ‘तेंदुओं/बाघों के साथ रहना’ पहल के तहत सह-अस्तित्व उपायों को मजबूत करने पर केंद्रित अपनी दीर्घकालिक रणनीति की रूपरेखा भी प्रस्तुत की। संसदीय समिति ने उत्तराखंड के एकीकृत भूभाग दृष्टिकोण की सराहना की और प्रौद्योगिकी-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और सामुदायिक तैयारियों के महत्व पर जोर दिया।केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने राज्यों की ओर से की गई पहलों की सराहना की और कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन, संस्थागत समन्वय, प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल और उत्कृष्टता केंद्र डेटा-आधारित रणनीतियों को विकसित करने, ज्ञान के आदान-प्रदान को सुगम बनाने और राज्यों को सर्वोत्तम तौर-तरीकों को अपनाने में सहायता प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत ढांचा प्रदान करेंगे। इससे पहले, बैठक को संबोधित करते हुए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री (ईएफसीसी), श्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सुझाव दिया कि पर्यावास-आधारित वैज्ञानिक अध्ययन करके उसकी वहन क्षमता का पता लगाया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि परितंत्र में वन्यजीवों की आबादी को बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं या नहीं। इससे संसाधनों को बढ़ाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रबंधन करने की रणनीति की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलेगी।

बैठक का समापन संसद सदस्यों के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों को मजबूत करने और साथ ही भारत की समृद्ध वन्यजीव विरासत के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपायों पर विस्तृत चर्चा के साथ हुआ।

बैठक में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह, समिति के सांसद सदस्य, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, पीसीसीएफ और सहभागी राज्यों के मुख्य वन्यजीव वार्डन सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।संसदीय परामर्श समिति को 18.12.2025 को हुई पिछली बैठक में जारी निर्देशों पर की गई आगे की कार्रवाई से अवगत कराया गया। इनमें टकराव प्रभावित क्षेत्रों के संसद सदस्यों के साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के परामर्श शामिल थे। 

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

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