घरेलू गौरैया के विलुप्त होने के पीछे सामूहिक हत्या बड़ा कारण

संजय कुमार / कई देशों से घरेलू गौरैया के विलुप्त होने के पीछे कई कारणों में एक बड़ा कारण गौरैया की सामूहिक हत्या भी शामिल है। चौंकाने वाली बड़ी बात यह है कि इतिहास में गौरैया को “कीट” मानकर बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्या/कत्लेआम की घटना दर्ज हैं। चीन में “चार कीट अभियान” 1958 से…

संजय कुमार / कई देशों से घरेलू गौरैया के विलुप्त होने के पीछे कई कारणों में एक बड़ा कारण गौरैया की सामूहिक हत्या भी शामिल है। चौंकाने वाली बड़ी बात यह है कि इतिहास में गौरैया को “कीट” मानकर बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्या/कत्लेआम की घटना दर्ज हैं। चीन में “चार कीट अभियान” 1958 से 1960 तक चला था। माओ ज़ेडोंग के “ग्रेट लीप फॉरवर्ड” के दौरान सरकार ने गौरैया को अनाज खाने वाला कीट घोषित कर दिया। इसे मच्छर, मक्खी और चूहे के साथ “चार कीटों” में रखा गया। पूरे देश में लोगों को लामबंद किया गया। नल, थाली, ड्रम बजाकर गौरैया को उड़ने पर मजबूर किया जाता था ताकि थककर गिर जाएं। घोंसले तोड़े, अंडे फोड़े। स्कूल, गांव, फैक्ट्री की रैंकिंग इसी से होती थी। वहीँ स्पेन के एक्सट्रीमाडुरा और उबेदा जैसे इलाकों में फसल बचाने के लिए गौरैया की कत्लेआम हुई। कुछ अरब और भूमध्यसागरीय देशों में ग्रामीण स्तर पर छोटे पक्षियों गौरैया, बटेर और तीतर को जाल या गुलेल से पकड़ने और शौकिया शिकार करने की पुरानी परंपराएं रही हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, उज़्बेकिस्तान और कुछ अन्य मध्य एशियाई देशों के कुछ स्थानीय रेस्तरां में गौरैया का मांस (Sparrow Meat) पारंपरिक रूप से परोसा जाता रहा है( https://kz.kursiv.media)।

चीन में दो साल में लगभग दो अरब गौरैया मारी गईं। शंघाई ने अकेले 1,367,440 गौरैया मारने की रिपोर्ट दी। गौरैया कीड़े खाती थीं, खासकर टिड्डी और राइस बोरर। उनके खत्म होते ही कीटों की बाढ़ आ गई। इससे फसल बर्बाद हुई। आकाल पड़ा और इससे लगभग 20 लाख लोगों की मौत हुई। लेकिन 1960 में सरकार ने गलती मानी। गौरैया को लिस्ट हटाया। गौरैया को बसाने के लिए आबादी फिर से बसाने के लिए सोवियत संघ से 2.5 लाख गौरैया आयात की गईं।

वहीँ, चार शताब्दियों तक स्पेन के एक्सट्रीमाडुरा और उबेदा जैसे इलाकों में फसल बचाने के लिए गौरैया कत्लेआम होते थे। हर नगर परिषद के लिए कोटा तय था। 1640-1668 तक पुर्तगाल-स्पेन युद्ध के कारण गौरैया का कत्लेआम रुका। 1804 में “ऑर्डेनेंजा दे काजा” शिकार कानून में गौरैया का मारना जरूरी हुआ था। 1834-1840 तक उदार राज्य बनने के बाद इसे “दमनकारी प्रथा” मानकर धीरे-धीरे बंद किया गया। 18वीं सदी में एक जीवविज्ञानी झू शी ने चेतावनी दी थी कि प्रशिया में पहले गौरैया मारने से दूसरे कीट बढ़ गए थे। पोलैंड कैंपेन के दौरान दो दिन लगातार ड्रम बजाने से दूतावास में मरी गौरैया इतनी थीं कि फावड़े से साफ करनी पड़ीं थी । चीन का उदाहरण इकोलॉजी की सबसे बड़ी गलती माना जाता है। गौरैया अनाज भी खाती है पर कीट उससे 10 गुना ज्यादा खाती है। इसी कारण आज दुनिया भर में गौरैया संरक्षण को प्राथमिकता मिलती है।

भारत में भी किसान गौरैया से परेशान होते हैं, लेकिन यहाँ गौरैया की सामूहिक हत्या नहीं की जाती है। वैसे भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के कारण गौरैया को संरक्षण मिला हुआ है। (संदर्भ-cato.orgepic.uchicago.edu,researchgate.net, epic.uchicago.edu)

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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