गौरैया के लिए मोबाइल फोन टावर कितना खतरनाक ?

 संजय कुमार/ घरेलू गौरैया की संख्या में कमी के पीछे  के कारणों में एक बड़ा कारण मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन को  बताया जाता है। स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स ने इसे पुख्ता सबूत नहीं माना है। जबकि गौरैया की संख्या में कमी के पीछे आहार की कमी, बढ़ता आवासीय संकट, कीटनाशक का व्यापक प्रयोग,…

 संजय कुमार/ घरेलू गौरैया की संख्या में कमी के पीछे  के कारणों में एक बड़ा कारण मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन को  बताया जाता है। स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स ने इसे पुख्ता सबूत नहीं माना है। जबकि गौरैया की संख्या में कमी के पीछे आहार की कमी, बढ़ता आवासीय संकट, कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली में बदलाव, प्रदूषण, पेड़ों का कटना सहित अन्य कारण बताये जाते हैं।

शोध / रिपोर्ट बताते हैं कि कीड़ों की कमी (गौरैया के बच्चों का एक प्रमुख भोजन) इनकी संख्या में कमी का एक बड़ा कारण है। गौरैया अपने बच्चे को शुरुआत में कीड़ा खिलाती है यह कीड़ा उसे खेत-खलिहान-बाग-बगीचा और गाय के गोबर के पास से मिलता है। फसल और साग-सब्जी में बेतहाशा कीटनाशक के प्रयोग ने कीड़ों को मार डाला है। ऐसे में गौरैया अपने बच्चे को पालने के दौरान समुचित आहार यानि प्रोटीन नहीं दे पाती हैं। पैकेट बंद अनाज ने भी प्रभाव डाला है। गौरैया के प्रजनन के लिए अनुकूल आवास में कमी भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। आवासों का तेजी से कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होने से तस्वीर बदल दी है।

 आरोप है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन गौरैया के नेविगेशन सिस्टम को प्रभावित कर रहा है और उनकी संख्या घट रही है। जबकि लेकिन स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020- रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स  ने अपने  रिपोर्ट में  साफ-साफ कहा है कि मोबाइल फोन टावर का जो तर्क दिया जाता रहा है उसे लेकर कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है, जिससे यह पता चले कि रेडिएश्न से गौरैया के प्रजनन पर प्रभाव पड़ता हो। यानि यह भ्रम है कि  मोबाइल फोन टावर से गौरैया के प्रजनन को खतरा होता है। गौरैया की संख्या को कम करने में मोबाइल फोन टावरों की कोई भूमिका नहीं है। इसे लेकर एक रिपोर्ट पहले भी आ चुकी है। विश्व भर के विशेषज्ञों द्वारा 88 पेज की एक रिपोर्ट-‘रिपोर्ट ऑन पॉसिबल इम्पक्ट्स ऑफ़ कम्युनिकेशन टावर्स ऑन वाइल्डलाइफ इन्क्लुडिंग बर्ड्स एंड बी’ में साफ़ कहा गया है कि अब तक के परिणाम में यह प्रभावी खतरा नहीं हैं। वहीँ  कुछ संस्था अभी भी इसे दोषी मानती है। गौरैया की संख्या को कम करने में मोबाइल फोन टावरों की भूमिका है या नहीं को लेकर सवाल उठते रहते हैं। पक्षी विशेषज्ञ मानते हैं, 1950-70 तक गौरैया की संख्या बढ़ी थी वही, 1970-90 के बीच गिरावट आई। जबकि  उस  समय  मोबाईल  टावर नहीं  था। आज  कई घरों  के  पास  कई  मोबाईल  फोन  टावर  है और गौरैया आसपास हर साल प्रजनन करती है, बच्चे निकते हैं। अगर किसी को भी लगता है कि मोबाईल टावर से गौरैया को खतरा हो रहा है तो  रेडिएशन को लेकर दूरसंचार मंत्रालय पर शिकायत किया जा सकता है। दूरसंचार मंत्रालय ने मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन के प्रभावों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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