गौरैया: नेचुरल कीटनाशक है

संजय कुमार / गौरैया कीट-पतंगे खाकर किसानों की मदद करती है। एक गौरैया एक दिन में कई कीड़े खा जाती है। इसके आहार में 60 प्रतिशत हिस्सा कीड़े होते हैं। खासकर बच्चों को प्रोटीन के लिए कैटरपिलर, कीड़ा-मकोड़ा, गमला या मिटटी में लगे छोटे कीड़े आदि ही खिलाती है। खेतों में फसल और सब्जी में…

संजय कुमार / गौरैया कीट-पतंगे खाकर किसानों की मदद करती है। एक गौरैया एक दिन में कई कीड़े खा जाती है। इसके आहार में 60 प्रतिशत हिस्सा कीड़े होते हैं। खासकर बच्चों को प्रोटीन के लिए कैटरपिलर, कीड़ा-मकोड़ा, गमला या मिटटी में लगे छोटे कीड़े आदि ही खिलाती है। खेतों में फसल और सब्जी में लगने वाले कीड़े को खुद और बच्चों को खिला कर फसल को बचाती है । इससे फसल और सब्जी पर कीटनाशक छिड़कने की जरूरत कम होती है। खेत-खलिहान और घर कीट-मुक्त रहते हैं। कह सकते हैं कि गौरैया, नेचुरल कीटनाशक का काम करती है। अगर घर में गौरैया आए तो गार्डन में केमिकल स्प्रे बंद कर दें। वो खुद पेस्ट कंट्रोल कर देगी। जिन घरों में गौरैया रहती है उन घरों में गौरैया, उस घर कीड़े-मकोड़े कम होते हैं। फसल-सब्जी-पौधों पर कीटनाशक के छिडकाव से गौरैया को बहुते नुकसान हुआ हैं। वैसे घरेलू गौरैया के आहार में प्राकृतिक रूप से कच्चे अनाज और बीजों  शामिल है। इसे पसंद से खाती भी है। गौरैया का पाचन तंत्र कच्चे दानों को पचाने के लिए बेहतर तरीके से अनुकूलित होता है। प्रोटीन के मामले में कच्चे और पके हुए चावल में बहुत मामूली अंतर होता है। चावल में प्रोटीन की मात्रा स्थिर रहती है । पकाने की प्रक्रिया से चावल के दानों के अंदर मौजूद प्रोटीन की मात्रा खत्म नहीं होती है। 100 ग्राम कच्चे चावल में जितना प्रोटीन होता है, पकने के बाद भी उस चावल के वजन में पानी जुड़ जाने के बावजूद कुल प्रोटीन उतना ही रहता है। देखें तो चावल प्रोटीन का बहुत अच्छा स्रोत नहीं है। गौरैया को उनके दैनिक आहार में पर्याप्त प्रोटीन देने के लिए चावल के बजाय बीज को शामिल करना चाहिए जो उसके लिए अधिक फायदेमंद और पसंदीदा होती हैं।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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