संजय कुमार/ गौरैया / केंद्र शासित राज्य लद्दाख के शहरी और ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में ‘चिपा ग्याओ’ पाई जाती है। लद्दाख में घरेलू गौरैया को दिलचस्प नाम ‘चिपा ग्याओ’ से पुकारा जाता है। हिमायल रेंज की पहाड़ियों से घिरे लद्दाख के लोग भले ही घरेलू गौरैया को ‘चिपा ग्याओ’ से पुकारते हैं लेकिन हाउस स्पैरो से पहचान कर लेते हैं। वैसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों और ग्रामीण अंचलों में घरेलू गौरैया को पुकारने के लिए स्थानीय बोलियों के कई दिलचस्प नाम प्रचलित हैं। ब्रज और अवधी में ‘गौरी’ या ‘गौरइया’ कहा जाता है। ‘फुदकी’ भी कहते हैं। बिहार/पूर्वांचल के लोग इसे ‘चिड़ई’ या ‘गोरइया’ के नाम से पुकारते है। राजस्थान के कई हिस्सों में इसे ‘चकली’ या ‘चिड़कली’ पुकारा जाता है। पहाड़ी क्षेत्र मसलन उत्तराखंड/हिमाचल के लोग नर गौरैया को ‘चिरौटा’ और मादा को ‘चिरौटी’ से पुकारते हैं। गोवा और कोंकण क्षेत्र में इसे ‘चिमणी’ या ‘घर-चिमणी’ कहते हैं। आंध्र और तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में इसे ‘पिचुका’ कहा जाता है। कर्नाटक का तटीय क्षेत्र में गौरैया को ‘गय्ये’ के नाम से जाना जाता है। ओडिशा में गौरैया को ‘घरचटिया’ कहा जाता है। तो बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में इसे ‘चिरई’ कहते हैं। गुजरात में चकली कहते हैं। गौरैया फुदक- फुदक कर चलती है इसलिए कई इलाकों को फुदकी या फ़दको भी कहते हैं। वैसे स्थानीय स्तर और घरेलू गौरैया का और भी नाम हो सकता है।
बात लद्दाख की घरेलू गौरैया यानी ‘चिपा ग्याओ’ की जो यहां सालों भर पड़ने सर्दियों खास कर माइनस तापमान में इंसान के साथ मजे से रहती है । तापमान को नियंत्रित करने के लिये शरीर को फूला कर रखती है और धूप का सेवन खूब करती है। जिस तरह से कई कारणों से विश्व के कई देशों में घरेलू गौरैया की तादाद घटी है उसी तरह से लद्दाख में पहले की तरह ‘चिपा ग्याओ’ नहीं दिखती। लेह के स्थानीय सोनम गुरमथ कहते हैं शहरी और ग्रामीण इलाकों में पहले पुराने घरों में लोगों के घरों में यह इंसान के साथ रहती थी लेकिन धीरे- धीरे घरों के निर्माण में बदलाव आया और पत्थर के आधुनिक घर बनने लगे। फिर यह पत्थर के खोह, घास ओर खेतों में शिफ्ट हो गई। साथ ही आधुनिक घरों में लकड़ी के डिजाइन के बीच खोह या दीवार के खोह में घोंसला बना कर रहने लगी है। वैसे आज भी लद्दाख के कई ग्रामीण इलाकों में पुराने घरों में गौरैया बड़ी संख्या में रहती है। दाना पानी और कृत्रिम घोंसला लगाने के सवाल पर स्थानीय लोगों ने बताया कि ‘चिपा ग्याओ’ आहार, खेत-खलिहान और इंसानी बस्तियों से खोज लेती है और अपना आवास भी।
प्राकृतिक माहौल में आहार की कमी नहीं है।
लद्दाख दौरे के क्रम में देखा गौरैया लद्दाख में मुख्य रूप से मानवीय बस्तियों और खेती वाले इलाकों में रह रही है। शहरी और ग्रामीण इलाकों में कमोवेश सामान्य दिखी।
यह लद्दाख के उन क्षेत्रों में अधिक देखी गई है जहाँ लोग रहते हैं, क्योंकि यह भोजन और घोंसले के लिए इंसानों पर निर्भर रहती है।’चिपा ग्याओ’ पक्षी लेह शहर और उसके आसपास के गांवों के साथ-साथ लद्दाख की उन घाटियों में आसानी से देखे जा सकते हैं जहाँ कृषि गतिविधियाँ होती हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ रिपोर्टों में इनके संख्या में कमी आने की बात कही गयी है, लेकिन ये अब भी लद्दाख के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में देखे जा सकती है। कह सकते हैं लद्दाख की ‘चिपा ग्याओ’ यानी घरेलू गौरैया इंसान ओर प्रकृति के संग मजे से रह रही है।
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