संजय कुमार /गौरैया / छोटे आकार वाली खूबसूरत गौरैया का ज़िक्र आते ही बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं। कभी घर-आंगन का अभिन्न हिस्सा रही यह चिड़िया आज कंक्रीट के जंगलों में अपना अस्तित्व तलाश रही है। 20 मार्च को ‘विश्व गौरैया दिवस’ के रूप में मना कर हम इसके संरक्षण का संकल्प लेते हैं, वहीँ, सवाल यह उठता है कि यह नन्ही जान हमारे पारिस्थितिक तंत्र के लिए इतनी ज़रूरी क्यों है?
तो हमें यह जानना होगा कि गौरैया और इंसान का रिश्ता सदियों पुराना है। बेथलहम की एक गुफा से मिले 4,00,000 साल पुराने जीवाश्म इस बात के गवाह हैं कि गौरैया ने आदिमानवों के साथ भी अपना बसेरा साझा किया था। वहीँ, ‘रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन’ (2018) के अनुसार, यह बंधन लगभग 11,000 साल पुराना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गौरैया पूरी तरह से इंसानों पर निर्भर है; जहाँ इंसान नहीं, वहाँ गौरैया का अस्तित्व भी मुश्किल है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने 2002 में इसे लुप्तप्राय: प्रजातियों की सूची में डाल दिया था। ब्रिटेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इनकी तादाद में 60% तक की कमी आई है। हालांकि, ‘स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020’ की रिपोर्ट राहत भरी खबर देती है कि पिछले 25 सालों से भारत में गौरैया की संख्या स्थिर बनी हुई है। अक्सर मोबाइल टावरों के रेडिएशन को गौरैया की मौत का मुख्य कारण माना जाता है, लेकिन इसी रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मोबाइल टावर से गौरैया को कोई सीधा खतरा होने का पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है। असली दुश्मन हमारी बदलती जीवनशैली और शहरीकरण हैं। सवाल लाजमी है कि आखिर विलुप्ति के कगार पर क्यों? तो गौरैया के विलुप्ति या संकट के पीछे कई गंभीर कारण हैं। जैसे आवासीय संकट, आधुनिक फ्लैट और शीशे वाली इमारतों में गौरैया के लिए घोंसला बनाने की जगह नहीं बची है। पुराने खपरैल और मिट्टी के घरों का खत्म होना, इनके लिए काल बन गया। आहार की कमी और कीटनाशक भी अहम् कारण है, खेतों और बगीचों में रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से वो कीड़े-मकोड़े खत्म हो गए हैं जिन्हें गौरैया अपने चूजों को खिलाती है। पैकेट बंद अनाज के चलन ने आंगन में गिरने वाले दानों को भी छीन लिया है। जबकि प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने संकट को गहरा दिया। बढ़ता वायु और ध्वनि प्रदूषण इनके प्रजनन चक्र को प्रभावित कर रहा है, तो वहीँ गौरैया वहां चली गयी जहाँ का पर्यावरण बेहतर है।
सवाल यह भी उठता है सिर्फ गौरैया संरक्षण ही क्यों? घरेलू चिड़ियाँ में गौरैया के बाद कौआ का नाम आता है वह भी कम हो रहे हैं। मैना सहित कई चिड़ियाँ हमारे आसपास से गायब हो रहे हैं। देखा जाये तो गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि ‘इकोलॉजिकल इंडिकेटर’ यानि पारिस्थितिक संकेतक है। इसकी उपस्थिति स्वस्थ पर्यावरण का प्रतीक है। यह किसानों की मित्र है। क्योंकि, यह फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों को खाती है। बीजों के फैलाव में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। तभी तो गौरैया हमसे कहती है— “अभी मैं ज़िंदा हूँ, बस थोड़ी सी पहल करो।” यदि हम अपनी बालकनी में थोड़ा सा दाना, पानी और एक छोटा सा बॉक्स लगा सकें, तो यह चहचाहट फिर से हमारे घर-आँगन-छत का हिस्सा बन सकती है। गौरैया का बचना केवल एक पक्षी का बचना नहीं, बल्कि हमारी मानवता और प्रकृति के बीच के उस पुराने जुड़ाव का बचना है। (संपर्क-sanju3feb@gmail.com)
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संजय कुमार















