यादों  के  झरोखे में गौरैया  

संजय कुमार/ शायद ही कोई हो जिसने नन्ही गौरैया के साथ अपना बचपन न गुजारा हो। घर-आँगन में जमीन पर पड़े दाने को चुगने आने वाली गौरैया को टोकरी में फंसा कर उसे पकड़ना और फिर उस पर रंग लगा कर उड़ा देना। और, जब दूबारा आती तो ताली बजा-बजा कर बताना, मेरी वाली गौरैया।…

संजय कुमार/ शायद ही कोई हो जिसने नन्ही गौरैया के साथ अपना बचपन न गुजारा हो। घर-आँगन में जमीन पर पड़े दाने को चुगने आने वाली गौरैया को टोकरी में फंसा कर उसे पकड़ना और फिर उस पर रंग लगा कर उड़ा देना। और, जब दूबारा आती तो ताली बजा-बजा कर बताना, मेरी वाली गौरैया। बच्चे अब यह खेल अब नहीं खेलते, वे मोबाईल पर गेम खेलने में लगे रहते हैं । आज  के  दौर  में  जब  हम  कंक्रीट के  ऊँचे  अपार्टमेंट्स  की  खिड़कियों  से  बाहर  झाँकते  हैं, तो  आसमान में  उड़ते  कबूतर-चील-कौवे  तो  दिख  जाते  हैं, लेकिन  वह  नन्ही  सी  ‘चीं-चीं’  करती गौरैया नहीं दिखती। यादों  के  झरोखे  को  थोड़ा  और  पीछे ले जाए तो, तो  वह  दौर  आँखों  के  सामने  तैरने लगता  है,  जब  सुबह  की पहली  किरण  और  गौरैया  का  चहकना  एक दूसरे से जुड़े थी।

हम सब का बचपन उस  समय  बीता  जब  घर  के  दरवाजे  केवल  मेहमानों  के  लिए  ही  नहीं, बल्कि  गौरैया  के  लिए  भी  खुले  रहते  थे। गौरैया  का  हमारे  घर  में  प्रवेश  किसी  बाहरी  जैसा  नहीं, बल्कि  परिवार  के  एक  सदस्य  जैसा  होता  था। वह रौशनदान, रसोई  की  परछत्ती, पंखे के कप,  दीवार  पर टंगी  पुरानी  फोटो फ्रेम  के  पीछे,  बिजली  के  तारों  के  जंक्शन  बॉक्स,  या जहाँ भी उसे जगह मिले अपना आशियाना बना लेती थी। बचपन  में  गौरैया  को  घोंसला  बनाते  देखना  किसी  चमत्कार  से  कम  नहीं होता  था। वह  कहीं  से  सूखी  घास का तिनका लाती, तो  कभी सुतली का छोटा  सा  टुकड़ा या पुआल। घोंसला बनाने ले लिए बहुत मिहनत करती। जब कुछ दिनों बाद  उसके  घोंसले  से  छोटे-छोटे  बच्चों  की  कुछ दिनों बाद  आवाज़ें  आतीं, तो  पूरा  घर  एक  अजीब  सी  ख़ुशी  से  भर  जाता  था। बार-बार घोंसला तक गौरैया जोड़ा का आना और बच्चों को खिलाना, नजारा मनमोहक होता।  वहीँ, माँ  जब आँगन  में  बैठकर  सूप  से  अनाज  फटकती  थीं,  तब  यह  नन्ही  परी  बिना  किसी  डर  के  उनके  पैरों  के  पास  फुदकती रहती  थी। हम  बच्चे  उसे  पकड़ने  की  नाकाम  कोशिश  करते  और  वह  फुर्र  से  उड़ान  भरकर  पास  के  अमरूद  के  पेड़  पर या दिवार पर  जा  बैठती  थी।

गौरैया  सिर्फ  हमारे  आँगन  में  ही  नहीं,  हमारी  कहानियों  में  भी  है। दादी  की  वह  कहानी  जिसमें  ‘एक  था  राजा  और  एक  थी  गौरैया’, आज भी  कानों  में  गूँजती  है। वह  हमें  सिखाती  थी  कि  कैसे  एक  छोटी  सी चिड़िया  अपनी  चतुराई  और  एकता  से अपनी लड़ाई लडती, विजय हासिल करती  है। गौरैया  हमारे  लिए  केवल  एक  पक्षी  नहीं,  बल्कि  एक  प्रतीक  भी है । यादों में  गौरैया का  आँगन  की  सूखी  धूल  में  लोटपोट यानि अपने  पंख  फड़फड़ा कर धूल को अपने ऊपर डालते हुए  मिटटी  स्नान’  करती । एक और मजेदार  दृश्य दिखता, जब  वह  घर में लगे  आईने में अपनी  ही  परछाई  को  कोई  दूसरी  चिड़ियाँ  समझकर  उससे  घंटों बातें  करती  या उड़ते हुए आइना पर  चोंच  मारती  थी। उसकी  वे  मासूम  हरकतें  चेहरे  पर  मुस्कान  लाने  के  लिए  काफी  थीं। लेकिन, आज  घरों  से  रौशनदान  दूर होता जा रहा है। बालकोनी को घेर दिया जाता है। दरवाजे बंद रहते हैं। आँगन का कांसेप्ट ख़त्म होता जा रहा हैं। गौरैया का घरों के अन्दर प्रवेश बंद हो चुका है। शहर के साथ-साथ  अब गाँव भी स्मार्ट घरों में तब्दील होते जा रहे हैं। रोशनदानों की जगह शीशे लगे एल्युमीनियम  की  खिड़कियों  ने  ले  ली है  और  कच्चे   आँगन,  टाइल्स   के  फर्श  में  तब्दील  हो  गए हैं।  आधुनिकता  की  दौड़  में  हमने  नन्हे दोस्त का रास्ता रोक दिया है। आज का बचपन वीडियो गेम्स और मोबाइल में सिमट गया है, जहाँ आर्टिफिसियल चिड़ियाँ तो है लेकिन वह चहकती  नहीं, साथ खेलती नहीं।

गौरैया को फिर से ‘यादों  के  झरोखे  से’  देखना है तो  गौरैया  को  वापस बुलाना होगा, जो  केवल  पर्यावरण  के  लिए  नहीं, बल्कि  हमारे  भीतर की  इंसानियत  और  बचपन में जैसे चहकते थे वैसी ख़ुशी पाने के लिए  अपनी  बालकनी या घर  में  एक  कोना  उसके  नाम  करना होगा, दाना- पानी रखना होगा, कृत्रिम घोंसला और पेड़ लगाना होगा। ताकि, गौरैया आये और  हमारे  घर  को  अपना  घर  समझे। और, हम उसे अपनी यादों में बसाते रहे।

संजय कुमार

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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