एक छत के नीचे दो दुनिया: कबूतर की दबंगई के बीच गौरैया का घर

संजय कुमार/ झारखण्ड के गोड्डा जिले के दिग्गी गाँव में घरेलू गौरैया और कबूतरों को साथ-साथ रहते, 14 जून 2026 को देखने को मिला। कबूतरों के लिए घर के बाहर बने लकड़ी के घरों में गौरैया ने भी घोसला बना लिया था। और मजे से कबूतर और गौरैया रह रहे थे। अमूमन कबूतर, गौरैया को…

संजय कुमार/ झारखण्ड के गोड्डा जिले के दिग्गी गाँव में घरेलू गौरैया और कबूतरों को साथ-साथ रहते, 14 जून 2026 को देखने को मिला। कबूतरों के लिए घर के बाहर बने लकड़ी के घरों में गौरैया ने भी घोसला बना लिया था। और मजे से कबूतर और गौरैया रह रहे थे। अमूमन कबूतर, गौरैया को भगा देता है लेकिन ऐसा नहीं था।

घरेलू गौरैया और कबूतर दोनों ही हमारे घरों और आसपास पाए जाने वाले सबसे आम पक्षी में से हैं। मानव बस्तियों में साथ रहने के बावजूद, इनके बीच का संबंध काफी दिलचस्प और मिला-जुला है। गौरैया और कबूतर एक ही परिवेश जैसे घरों की छतें, बालकनी, पार्क और पुरानी इमारतें साझा करते हैं। इनके बीच कोई ‘दुश्मनी  या हिंसक लड़ाई नहीं होती, लेकिन इनमें कोई सामाजिक जुड़ाव या दोस्ती भी नहीं दिखती है। ये एक-दूसरे की उपस्थिति को नजरअंदाज करते हुए शांति से साथ रहते हैं।

दोनों पक्षी मुख्य रूप से दाना, अनाज और बीज खाते हैं। जब लोग छतों या पार्कों में दाना डालते हैं, तो इनके बीच एक मूक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। गौरैया के लिए जब दाना डाला जाता है तो कबूतर आकर चट कर जाता है बल्कि मौके पर कबूतर, गौरैया को भगाता है तो गौरैया थोडा हट कर दाना चुगने लगती है।  कबूतर आकार में बड़े और भारी होते हैं,  इसलिए वे जल्दी-जल्दी और ज्यादा मात्रा में दाना चुग लेते हैं। कई बार उनके बड़े आकार के कारण छोटी गौरैया सहम कर पीछे हट जाती है। गौरैया आकार में छोटी और बेहद फुर्तीली होती है। वह कबूतरों के पहुंचने से पहले छोटे दानों को लेकर उड़ जाती है। शहरीकरण के कारण आजकल दोनों पक्षियों के लिए घोंसला बनाने की जगह कम हो गई है, जिससे इनके बीच थोड़ी प्रतियोगिता बढ़ गई है। गौरैया को घोंसले के लिए छोटे सुराख, बिजली के मीटर के पीछे की जगह या कृत्रिम बर्ड-हाउस पसंद आते हैं। कबूतर बालकनी के कोनों, गमले, एयर कंडीशनर के ऊपर या फ्लैट्स के छज्जों पर डेरा जमाते हैं। कभी-कभी कबूतर अपने बड़े आकार के कारण गौरैया की चुनी हुई सुरक्षित जगहों पर कब्जा कर लेते हैं, जिससे गौरैया को वहां से हटना पड़ता है। कबूतर और गौरैया के बीच का संबंध जियो और जीने दो जैसा प्रतीत होता है। पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन के लिए दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, हालांकि शहरों में कबूतरों की बढ़ती आबादी और गौरैया की घटती संख्या आज एक चिंता का विषय बनी हुई है।

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

हमें आप लिख सकते हैं …आप हमें  📩 ईमेल करें: ilovesparrow68@gmail.com

🐦 आपकी भागीदारी जरूरी है: अगर आपके पास गौरैया और पर्यावरण संरक्षण संरक्षण से जुड़े अनुभव, प्रेरक कहानियाँ, कविताएँ, गीत या शोधपरक आलेख हैं, तो हमें ज़रूर भेजें।

www.ilovesparrow.com वेबसाईट का उद्देश्य साफ़ है घर -घर गौरैया संरक्षण की पहल हो..साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो।

सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन