नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। दुनिया इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के पीछे भाग रही है। तकनीकी कंपनियां नए डाटा सेंटर बना रही हैं। सरकारें डिजिटल अर्थव्यवस्था को भविष्य की ताकत बता रही हैं, लेकिन इस तकनीकी दौड़ के बीच एक नया सवाल सामने आया है। अगर भविष्य डाटा सेंटरों में बसने वाला है, तो क्या वे खुद जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित हैं?
जलवायु जोखिम विश्लेषण संस्था एक्सडीआई की नई रिपोर्ट कहती है कि शायद नहीं। रिपोर्ट में दुनिया भर में प्रस्तावित 2595 डाटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया। निष्कर्ष यह हैकि इनमें से कई ऐसे इलाकों में बन रहे हैं जहां बढ़ती गर्मी, बाढ़, जंगल की आग और दूसरे चरम मौसमी जोखिम आने वाले वर्षों में गंभीर चुनौती बन सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कम रेजिलिएंस वाले परिदृश्य में 2026 में ही लगभग 6 प्रतिशत प्रस्तावित डाटा सेंटर उच्च जोखिम श्रेणी में आते हैं। अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार मौजूदा दिशा में बनी रही, तो यह जोखिम आगे और बढ़ सकता है। यह सिर्फ इमारतों का सवाल नहीं है। डाटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के इंजन बन चुके हैं। जब कोई व्यक्ति ऑनलाइन वीडियो देखता है, क्लाउड पर फाइल सेव करता है, डिजिटल भुगतान करता है या एआई चैटबॉट से सवाल पूछता है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं एक डेटा सेंटर काम कर रहा होता है। यानी डिजिटल दुनिया जितनी वर्चुअल दिखती है, उसकी बुनियाद उतनी ही भौतिक है।
हॉटस्पाट क्षेत्रों में नहीं है भारत
रिपोर्ट ने अमेरिका, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य क्षेत्रों को ऐसे स्थानों के रूप में चिन्हित किया है, जहां प्रस्तावित डाटा सेंटरों के लिए जलवायु जोखिम अपेक्षाकृत अधिक हैं। भारत का नाम प्रमुख जोखिम हॉटस्पॉट के रूप में रिपोर्ट में नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चिंता की कोई वजह नहीं है। भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजारों में शामिल है।
संकट ज्यादा
अमेरिका
फ्रांस
दक्षिण कोरिया
(साभार -दैनिक हिंदुस्तान नई दिल्ली 20 जून 26 )















