पसंदीदा है गौरैया का गेहूँ चुगना

संजय कुमार / गेंहू चुगना घरेलू गौरैया का सबसे पसंदीदा काम है। कुछ किसान और कुछ लोग गौरैया को ‘खेत की दोस्त-दुश्मन’ दोनों मानते हैं। जबकि सच यह है कि जहाँ घरेलू गौरैया दाना चुगे, समझो वहां बरकत है। क्योंकि वह गिरा हुआ दाना ही खाती है, किसान का भंडार नहीं। बल्कि फसल में लगे…

संजय कुमार / गेंहू चुगना घरेलू गौरैया का सबसे पसंदीदा काम है। कुछ किसान और कुछ लोग गौरैया को ‘खेत की दोस्त-दुश्मन’ दोनों मानते हैं। जबकि सच यह है कि जहाँ घरेलू गौरैया दाना चुगे, समझो वहां बरकत है। क्योंकि वह गिरा हुआ दाना ही खाती है, किसान का भंडार नहीं। बल्कि फसल में लगे कीड़ों को आहार बना कर फसल को सुरक्षित रखती है साथ ही घरों में प्रवेश कर कीड़ों-मकोड़ों को आहार बना कर इन्सान के घर को सुरक्षित रखती है। वही, जब गेंहू को पानी से धो कर सूखने के लिए आँगन-छत पर सूखने दिया जाता है तब कबूतर के साथ-साथ  या अलग से गेंहू चुगने गौरैया आ जाती है। लोगों को पक्षियों द्वारा सुखाने के लिए रखे गेंहू को चुगना अच्छा नहीं लगता है।

अब सवाल, गौरैया गेहूँ क्यों चुगती है?  तो इसका बड़ा कारण यह है कि यह ऊर्जा का भंडार है और इसमें 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है। गौरैया दिनभर में अपने वजन का 10 प्रतिशत यानि 2 से 6 ग्राम आहार लेती है यानी 100-150 गेहूँ के दाने वह चुग लेती है। गौरैया की चोंच जो शंकु के आकार की होती है गेहूँ के लिए परफेक्ट होता है। जैसे अखरोट तोड़ते हैं, वैसे ही गौरैया गेहूँ का सख्त छिलका तोड़ती है।

खेत-खलिहान में गौरैया गेहूँ चुगते-चुगते वह अपने बच्चों के लिए कीटों  को पकडती है और खिलाती है। कई चक्र में कीटो-कीड़ों को पकड बच्चों को वह खिलाती है। इस क्रम में खुद भी कीड़ों को खा जाती है ।

यों तो घरेलू गौरैया खेत-खलिहान, घर-आँगन, सड़क पर गिरे दाने चुगती रहती है। पौधे से सीधा गेंहू की बाली नहीं तोडती है। हाँ, धान की बाली से धान को तोड़ चोंच में दाना दबाकर जीभ से घुमाती है। चोंच के किनारे से छिलका फाड़ देती है। छिलका बाहर और दाना अंदर। लेकिन उसे गेंहू के दाने में मिहनत नहीं करनी पड़ती है। दो से तीन सेकेण्ड में दाना को तोड़ आहार बना लेती है। अगर दाना बड़ा हो तो चोंच से ‘कटर’ की तरह आधा काटती है। गिजार्ड बाकी पीसने का काम करता है। गेहूँ सूखा होता है, इसलिए चुगने के बाद तुरंत पानी भी पीती है। हालाँकि ऐसा कई बार देखने को मिला कुछ भी चुगने के बाद पानी पीती है, ताकि वह सीधे पेट में चला जाए।

खेतों में जब हाथ से गेंहूँ या धान की कटाई होती थी, तो खेत- खलिहान में गिरे दाना को गौरैया चुगती थी। माना जाता है कि गौरैया एक फसल के मौसम में लाखों कीड़े खा जाती है। इससे कीटनाशक का खर्च बचता था। और, किसान मित्र बन जाती है। खेत-खलिहान में आज मशीन से कटाई होने से दाना बहुत कम गिरता है। ऊपर से कीटनाशक से कीड़े खत्म हो रहे हैं।

जब गौरैया को दाना नहीं मिलाता तो मजबूरी में खड़ी फसल की बाल नोचती है। और, किसान नाराज हो उठते हैं। एक अध्यन के अनुसार गौरैया खेत की 0.5 प्रतिशत फसल ही नुकसान करती है, पर 70 प्रतिशत नुकसानदायक कीड़े खा जाती है। पुराने जमाने में खलिहान में बैल के पैरों से गेहूँ माड़ते थे तब गौरैया उसी समय टूटे दाने चुगने आती थी। किसान इसे ‘शगुन’ मानते थे।

देखें तो गौरैया पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह हमारे घरों और खेतों को कीड़ों से सुरक्षित रखती है। आँगन में सुखाए गए गेहूँ में से अगर वह कुछ दाने चुग भी ले, तो उसे भगाने के बजाय यह सोचना चाहिए कि यह प्रकृति की उस ‘नन्हें दोस्त’ की दावत है जो हमारे पर्यावरण को संतुलित रखती है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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