चोंच से पहचाने गौरैया को

संजय कुमार / घरेलू गौरैया को चोंच से पहचाना जा सकता है।  गौरैया की चोंच बहुत मजबूत होती है। युवा अवस्था  में घरेलू नर-मादा गौरैया की चोंच का रंग हलका गुलाबी होता है। लेकिन, जैसे जैसे प्रजनन काल आता है गहरा भूरा (काला) हो जाता है। नर और मादा के चोंच के ऊपर रोमछिद्र होता है…

संजय कुमार / घरेलू गौरैया को चोंच से पहचाना जा सकता है।  गौरैया की चोंच बहुत मजबूत होती है। युवा अवस्था  में घरेलू नर-मादा गौरैया की चोंच का रंग हलका गुलाबी होता है। लेकिन, जैसे जैसे प्रजनन काल आता है गहरा भूरा (काला) हो जाता है। नर और मादा के चोंच के ऊपर रोमछिद्र होता है । इसकी चोंच के चारों ओर, गले पर एवं चोंच और आंखों के बीच की जगह पर काला रंग होता है।  और शीर्ष के बीच एक छोटी सफेद धारी होती है और आंखों के ठीक पीछे छोटे सफेद धब्बा होता है, जिनके नीचे और ऊपर काले धब्बे होते हैं। नीचे के हिस्से हल्के भूरे या सफेद होते हैं, जैसे गाल, कान के आवरण और सिर के आधार पर धारियां होती हैं। नर गौरैया के ऊपर से लेकर पीछे तक गहरे भूरे रंग का मुकुट होता है। सर के किनारों पर भी मुकुट गहरा भूरे रंग का होता है। पीठ का ऊपरी हिस्सा भी भूरे रंग का होता है, जिसमें चौड़ी काली धारियां होती हैं, पीठ, दुम और ऊपरी पूंछ का आवरण भूरे भूरे रंग का होता है। घरेलू गौरैया के पंख अधिकतर भूरे और भूरे रंग के विभिन्न रंगों के होते हैं मादा गौरैया ऊपर और नीचे से मटमैली होती है।

चोंच: गौरैया का ‘मल्टी-टूल’

गौरैया की चोंच Conical यानी शंक्वाकार होती है। छोटी दिखती है पर बीज तोड़ने, कीड़ा पकड़ने, घोंसला बनाने के लिए तिनका उठाने – सबके लिए परफेक्ट। इसी मजबूत चोंच से वो दीवार में 2-3 इंच का छेद भी कर लेती है। मोटी, शंकु के आकार की चोंच एवं मांसल जीभ से आहार को छीलने एवं निगलने की स्थिति में लाने में मदद करती है। उदर से हजम करने की/ पीसने की प्रक्रिया करते है. पीसने के बाद ही पाचन प्रक्रिया होती है. गिजार्ड (The gizzard) (गला/कंठ/पेषणी) यानि पक्षियों का मांसपेशीय उदर, जिसमें निगले हुए कंकड़ बीजों को तोड़ कर पचाने में सहायक होते हैं। यह पेट का दूसरा कक्ष है और इसमें बहुत सख्त मांसपेशियां होती हैं। इन मांसपेशियों का उपयोग विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों को पीसने और पचाने के लिए किया जाता है। मांसपेशियाँ इस प्रक्रिया को अकेले नहीं करतीं। कई पक्षी भोजन करते समय छोटे-छोटे कंकड़, रेत या मिट्टी उठा लेते हैं और ये वस्तुएं गिजार्ड में चली जाती हैं। फिर गिजार्ड पाचन में सहायता के लिए खाद्य पदार्थों को चूर्णित करने में मदद करने के लिए इन ग्रिट जैसी वस्तुओं का उपयोग करता है। विभिन्न पक्षी प्रजातियाँ अलग-अलग खाद्य पदार्थ खाती हैं और उनके गिजार्ड विशेष रूप से उनके द्वारा खाए जाने वाले भोजन के प्रकार पर काम करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

रंग बदलना- लव सिग्नल

सर्दी/गैर-प्रजनन काल: नर-मादा दोनों की चोंच हल्की सींग जैसी, गुलाबी-पीली होती है। प्रजनन काल फरवरी-जुलाई: हॉर्मोन बदलते हैं। नर की चोंच एकदम काली/गहरी भूरी हो जाती है। मादा की चोंच भी गहरी होती है पर नर जितनी काली नहीं। ये ‘मैं तैयार हूँ’ का सिग्नल है। गर्मी खत्म होते ही फिर हल्की हो जाती है। रोमछिद्र/Nostril: चोंच के ठीक ऊपर, आधार पर दो छोटे छेद होते हैं। इन्हें ढकने वाले बारीक पंख भी होते हैं, ताकि धूल न जाए।

नर गौरैया- ‘श्रृंगार वाला राजा’

नर को पहचानना सबसे आसान है। इसे Passer domesticus का ‘Breeding Plumage’ कहते हैं: काला बिब: चोंच के नीचे, गले पर बड़ा काला पैच। इसे Bib कहते हैं। जितना बड़ा और गहरा बिब, नर उतना ताकतवर और मादाओं का फेवरेट। लड़ाई में बिब का साइज ही रैंक तय करता है। भूरा मुकुट: सिर के ऊपर Crown गहरा भूरा/चेस्टनट रंग का।सफेद गाल: आंख के पीछे से गले तक चमकीले सफेद गाल। इसी के ऊपर-नीचे काली धारी होती है, जिससे आंख ‘काजल’ लगी लगती है। भूरी पीठ + काली धारियां: पीठ पर मोटी काली धारियां, जैसे किसी ने स्केच पेन से लाइनें खींच दी हों।सफेद धारी: कंधे पर पंख में एक सफेद Wing-bar होता है, जो उड़ते वक्त साफ दिखता है।

मादा गौरैया – ‘सादी पर चालाक’

मादा को Dull कहते हैं, पर वो सबसे ज्यादा होशियार होती है:कोई काला बिब नहीं: गला और पेट हल्का मटमैला-सफेद। एकदम सादा।भूरी आंख-पट्टी: आंख के पीछे से गर्दन तक हल्की भूरी पट्टी, जिसे Supercilium कहते हैं। यही उसका सबसे बड़ा पहचान चिन्ह है।पीठ: नर की तरह धारीदार, पर रंग फीका। पूरा शरीर रेतिया-भूरा, ताकि घोंसले में बैठे तो दुश्मन को न दिखे। Camouflage का मास्टरपीस।4. बच्चे गौरैया = ‘मम्मी की कॉपी’

घोंसला छोड़ने के बाद 3-4 महीने तक सभी बच्चे मादा जैसे दिखते हैं। चोंच गुलाबी, शरीर सादा। पहली सर्दी के बाद नर बच्चों के गले पर काला बिब उगना शुरू होता है।‘I Love Sparrow’ के लिए क्विक आइडेंटिफिकेशन टेबलफीचरनर गौरैयामादा गौरैयाचोंच प्रजनन काल मेंएकदम कालीगहरी भूरी, काली नहींगलाबड़ा काला बिबसादा मटमैलासिरभूरा मुकुट + सफेद गालपूरी भूरी, आंख के पीछे हल्की पट्टीपीठचटक भूरी + मोटी काली धारीफीकी भूरी + पतली धारीबच्चों के लिए मजेदार ट्रिक:”नर गौरैया = काला टाई लगाए स्कूल का मॉनिटर। मादा गौरैया = बिना यूनिफॉर्म के क्लास की सबसे होशियार लड़की।”जरूरी वैज्ञानिक नोट: गौरैया की चोंच और रंग में बदलाव Photoperiod यानी दिन-रात के घटने-बढ़ने से होता है। जैसे ही दिन बड़े होने लगते हैं, दिमाग हॉर्मोन छोड़ता है, चोंच काली होती है, नर गाने लगता है। प्रकृति का GPS सिस्टम।Sanjay जी, किताब में एक ‘पहचान कार्ड’ बनाइए – बाएं तरफ नर की फोटो, दाएं मादा की। नीचे ये 4 पॉइंट। बच्चा खिड़की पर बैठी गौरैया को 10 सेकंड में पहचान लेगा।और कोई अंग – जैसे पैर, आंख, आवाज़ – पर डिटेल चाहिए तो बताइए। अहमदाबाद वाले स्मारक से लेकर चोंच के रंग तक, गौरैया का हर किस्सा तैयार

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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