संजय कुमार/ पक्षियों के संसार से कई पक्षी गायब हो गये हैं। कई कगार पर हैं। गिद्ध अब नहीं के बराबर दिखते हैं। कई मोहल्लों से कौआ गायब हो चुका है। घर आँगन की नन्ही चिड़ियाँ गौरैया अब नहीं दिखती है। कई चिड़ियों का नहीं दिखना यानि गायब हो जाना गंभीर सवाल है। देखा जाये तो पृथ्वी पर पक्षियों की 10,000 से ज़्यादा प्रजातियाँ हैं जिसमें फ़िंच, हमिंगबर्ड, बाज और गिद्ध से लेकर सबसे छोटे–बड़े पक्षी शामिल हैं। दुर्भाग्य से, उनमें से कई विलुप्त होने के कगार पर हैं। इनमें घर-आँगन में चहकने-फूदकने और चहचहाने वाली इंसान की दोस्त नन्ही गौरैया भी शामिल हो गयी है।
तेजी से जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों ने दुनिया भर में 10 लाख से अधिक वन्यजीव प्रजातियों को प्रभावित कर खतरे में डाल रखा हैं। गौरैया का हाल बेहाल है। जब भी गौरैया की चर्चा होती है तो सुनने-देखने को मिलता है कि अब गौरैया नहीं दिखती है। गायब हो गई है। इसके संरक्षण को लेकर हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मना का संरक्षण का सन्देश दिया जाता है।
जहाँ तक गौरैया सहित दूसरी चिड़ियों के विलुप्त होने की बात है तो वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों को कम करने और लुप्तप्राय पक्षियों की रक्षा करने के लिए दुनिया भर में प्रयास चल रहे हैं। लेकिन तस्वीर बदल नहीं रही है, खतरा बढ़ता ही जा रहा है। विश्व में खतरे में पक्षियों में पीले-कलगी वाले कॉकटू, कैलिफोर्निया कोंडोर,उत्तरी गंजा आइबिस, लाल चेहरे और लंबी, घुमावदार चोंच वाला एक बड़ा काली पक्षी, कई कारकों के संयोजन के कारण खतरे में है। शोध को देखें तो अलग-अलग खतरे, अलग-अलग वन्यजीव प्रजातियों की आबादी को प्रभावित कर रहे हैं।
गौरैया के ऊपर मंडराते खतरे को देखते हुए। भारत सरकार ने घरेलू गौरैया सहित सात गौरैया प्रजाति को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-II में शामिल किया गया है। ताकि इसका संरक्षण हो। इसके तहत मानव जीवन को खतरे के अलावा उनका शिकार नहीं किया जा सकता। गौरैया को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए(ट्रांस्लोकेट) चीफ वाइल्ड लाइफ़ वार्डन की अनुमति जरुरी है।
बात विलुप्ति और खतरे की तो तापमान में परिवर्तन के कारण गौरैया सहित संसार भर की हर आठ में से एक पक्षी प्रजाति पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों ने इसका मुख्य कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि और मौसम में हो रहे लगातार परिवर्तनों को बताया है। गौरैया, कौआ और मैना ऐसी चिडिय़ां है, जो इंसान के घर आंगन में घोंसला बनाकर उसके सबसे करीब रहती है, लेकिन गाँव/ शहरों के विकास, विस्तार और बदलते जीवनशैली से अब गौरैया, कौआ और मैना आदि पक्षियों के बसेरा, सुरक्षा और भोजन में कई दिक्कतें आ रही है। भवनों का शीशे से पैक होने से परेशानी बढ़ रही है। गौरैया अपनी परछाई देख लो मरती है या उड़ते हुए टकरा कर घायल हो जा रही है। बचपन की साथी और किसान मित्र गौरैया की तो वैश्विक तापमान में वृद्धि और मौसम में हो रहे लगातार परिवर्तनों से गाँव-शहरों में अब गौरैया की आबादी कम होती जा रही हैं। गांव, शहर में तब्दील हो रहे हैं। खेत-खलिहान, तालाब और बाग बगीचों की जगह कंकरीट के जंगल ले रहे हैं। बची-खुची हरियाली पिछले कुछ सालों में जमीन और सड़कों के चौड़ीकरण, पक्की टाइल्स और पत्थर के पार्कों में चली गई है। एक समय था जब गौरैया, कौआ और मैना जैसी चिडिय़ां हमारे जीवन का हिस्सा थीं, लेकिन आज वे हमसे काफी दूर चली गई हैं। इंसान का रिश्ता उनसे टूट चुका है। ऐसे में पर्यावरण उनसे दोबारा रिश्ता बनाना हमारी पर्यावरण चेतना का अहम हिस्सा होना चाहिए। बेजुबान पक्षियों के लिए हम थोड़े से दाना पानी की व्यवस्था करके इन्हें लुप्त होने से बचा सकते हैं।
गौरैया सहित पक्षियों की घटती आबादी के पीछे मुख्य कारण में कृषि उपयोग में कीटनाशक का बढ़ता प्रयोग, आहार की कमी, पेड़ कटाई, प्रकृति का अतिदोहन, बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, बदलता जीवनशैली, जलवायु परिवर्तन आदि हैं। प्राकृतिक आवास कृषि भूमि या भवन निर्माण में तब्दील हो रहे हैं। बाग-बगीचा और बाड़ी जहाँ फलदार पेड़ों को उजाड़ कर खेती या ईमारत खड़े कर दिए जा रहे हैं। गौरैया का हमसे दूर कर दिया है। पेड़ों और वनों की कटाई ने गौरैया सहित दूसरी चिड़ियों का आशियाना उजाड़ दिया है। एक ओर जहाँ इन्सान के घर के आसपास पेड़ों पर गौरैया बैठती है तो वहीँ दो-तिहाई पक्षी प्रजातियाँ जंगलों के अलावा कहीं और नहीं रह सकती हैं। पक्षियों के शिकार या अवैध रूप से मारे जाने के कारण हर साल अकेले भूमध्यसागरीय क्षेत्र में लगभग 12 से 38 मिलियन पक्षी मारे जाते हैं। गौरैया को बगेरी के नाम पर शिकार बनाया जा रहा है। गौरैया सहित अन्य चिड़ियों के सामने मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन सबसे गंभीर खतरा साबित हो रहा है। शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक उभरता हुआ और लगातार गंभीर खतरा है – जो वर्तमान में वैश्विक रूप से खतरे में पड़ी 33 प्रतिशत प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है – और यह अक्सर मौजूदा खतरों को और बढ़ा देता है। इन्ही कारणों से घर आँगन की गौरैया गाँव- शहर में दिखनी बंद हो गयी है। पटना शहर में गौरैया शहर के बाहर गंगा नदी पर बने गंगा पथ पुल के ऊपर नीचे अच्छी संख्या में दिख रही है। चिड़ियों के वेटलैंड,नदी,पोखर आहार का केंद्र है। ये यहाँ आती है और आहार के साथ साथ पास में बसेरा बना लेती हैं।
गौरैया की घर वापसी के लिए हमें प्रयास को तेज करने होंगे। आहार-आवास की व्यवस्था, बैठने के लिए पेड़ लगाने होंगे इससे तापमान को बढ़ने से रोका जा सकता है और जलवायु परिवर्तन पर भी अंकुश लगेगा। इन्सान को अपने जीवनशैली में बदलाव करना होगा, पुराने दौर को अपने जीवन में ढालना होगा। कंक्रीट के जंगल को तोड़ नहीं सकते तो उसको हरियाली से पाट देना होगा। घर घर गौरैया के लिए दाना-पानी रखना होगा,कृत्रिम घोंसला या घर निर्माण के दौरान चिड़ियों के लिए उनके अनुकूल घर बनाना होगा। यकीनन गौरैया संरक्षण पहल से तस्वीर बदलेगी साथ ही गौरैया के संरक्षण से दूसरी चिड़ियों का भी संरक्षण होगा।
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