संजय कुमार / गौरैया संरक्षण की बात हो और सालिम अली की चर्चा न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। जिनको गौरैया की एक खास प्रजाति यानि सोन कंठ वाली या पीले (पीत कंठी) गले वाली चिड़िया ने पक्षी वैज्ञानिक बना दिया था। तो पहले जानते है सालिम अली आखिर थे कौन। डॉ। सालिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली एक भारतीय पक्षी विज्ञानी, वन्यजीव संरक्षक और प्रकृतिप्रेमी के तौर पर विख्यात हैं। वे भारत के पहले ऐसे पक्षी विज्ञानी थे जिन्होंने पूरे देश में व्यवस्थित रूप से पक्षियों का सर्वेक्षण/शोध किया और पक्षियों पर बहुत सारे लेख और किताबें लिखी। पक्षी संरक्षण में किये गए अहम काम ने डॉ सालिम अली को ‘भारत का बर्डमैन’ बनाया वे इस नाम से विख्यात हुए, और भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1958 में पद्मभूषण और वर्ष 1976 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया।
डॉ सालिम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया था। उनके जानने वाले मानते थे कि सालिम अली चिड़ियों की ज़ुबान समझते थे। उन्होंने पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों के बारे में अध्ययन के लिए देश के कई भागों और जंगलों का दौरा किया। डॉ अली ने कुमाऊँ के तराई क्षेत्र से बया पक्षी की एक ऐसी प्रजाति को ढूंढ़ निकाली थी, जो विलुप्त घोषित हो चुकी थी। उन्होंने साइबेरियाई सारसों पर बहुत काम किया और वे उनकी एक-एक आदत को अच्छी तरह पहचानते थे। अपने अध्ययन के माध्यम से उन्होंने ही बताया था कि साइबेरियन सारस मांसाहारी नहीं होते, बल्कि वे पानी के किनारे पर जमी काई को खाते हैं। सालिम अली पक्षियों को बिना कष्ट पहुंचाए पकड़ने के कई तरीक़े जानते थे। पक्षियों को पकड़ने के लिए डॉ सालिम अली ने प्रसिद्ध गोंग एंड फायर व डेक्कन विधि की खोज की थी, जिन्हें आज भी पक्षी विज्ञानियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।
वर्ष 1947 के बाद डॉ सालिम बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गए थे। साथ ही भरतपुर और सुल्तानपुर पक्षी विहार की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही थी । वर्ष 1930 में सालिम अली ने अपने शोध और अध्ययन पर आधारित कई महत्वपूर्ण लेख लिखे। इन लेखों के माध्यम से लोगों को उनके कार्यों के बारे में पता चला और उन्हें एक पक्षी शास्त्री के रूप में पहचान मिली। लेखों के साथ-साथ सालिम अली ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं। 1941 में प्रकाशित चर्चित पुस्तकों में ‘द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स’ ने रिकॉर्ड बिक्री की। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी पुस्तक ‘हैण्डबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एण्ड पाकिस्तान’ भी लिखी, जिसमें सभी प्रकार के पक्षियों, उनके गुणों, -खान-पान, प्रजनन, प्रवासी आदतों आदि से संबंधित अनेक रोचक और मतवपूर्ण जानकारियां दी गई थी। डॉ सालिम अली ने एक और पुस्तक ‘द फाल ऑफ़ ए स्पैरो’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने गौरैया के साथ साथ अपने जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र किया है।
डॉ सालिम अली का जन्म मुम्बई के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में 12 नवम्बर 1896 में हुआ था। वे अपने माता-पिता के सबसे छोटे और नौंवीं संतान थे। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता की भी मृत्यु हो गई। सालिम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा द्वारा मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में हुआ।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू।एस। मिलार्ड ने सालिम अली के अन्दर पक्षियों के प्रति जिज्ञासा बढ़ाई और बालक सालिम को पक्षियों के अध्ययन के लिए उत्साहित किया था। पक्षियों में खास रूचि रखने के कारण सालिम ने पक्षियों पर अध्ययन/शोध करना शुरू किया। मिलार्ड ने सोसायटी में संग्रहित सभी पक्षियों को सालिम को दिखाना प्रारंभ किया और पक्षियों के संग्रहण के लिए प्रोत्साहित भी किया। उन्होंने सालिम अली को कुछ किताबें भी दी जिसमें ‘कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबई’ भी शामिल थी। मिल्लार्ड ने सालिम को पक्षियों की खाल निकालने और संरक्षण में प्रशिक्षित करने की पेशकश भी की। उन्होंने ही युवा सालिम की मुलाकात नोर्मन बॉयड किनियर से करवाई, जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में प्रथम पेड क्यूरेटर थे।
प्राथमिक शिक्षा के लिए सालिम और उनकी दो बहनों का दाखिला गिरगाम स्थित ज़नाना बाइबिल मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल और बाद में मुंबई के सेंट जेवियर में कराया गया। जब वे 13 साल के थे तब सरदर्द के गंभीर बीमारी से पीड़ित हुए, जिसके कारण उन्हें अक्सर स्कूल से दूर रहना पड़ता था। उन्हें अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध भेज दिया गया। सिंध की शुष्क हवा से शायद वे स्वस्थ होते इसलिए भेज दिया गया था। लंबे समय के बाद वे सिंध से वापस लौटे और बड़ी मुश्किल से वर्ष 1913 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। सालिम अली ने प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रहण की, लेकिन कॉलेज का पहला साल मुश्किलों भरा था जिसके बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और परिवार के वोलफ्रेम माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा चले गए। यह स्थान सालिम के अभिरुचि में सहायक साबित हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता। लगभग सात साल बाद सालिम अली मुंबई वापस लौट गए और पक्षी शास्त्र में प्रशिक्षण लिया और साथ ही मुंबई के ‘नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के म्यूज़ियम में गाइड के पद पर नियुक्त हो गये। बहुत समय बाद इस कार्य में उनका मन नहीं लगा तो अवकाश लेकर जर्मनी जाकर पक्षी विज्ञान में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया।
डॉ सालिम अली ने प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी। 27 जुलाई 1987 को 91 साल की उम्र में डॉ। सालिम अली का निधन मुंबई में हुआ। डॉ सालिम अली भारत में एक ‘पक्षी अध्ययन व शोध केन्द्र’ की स्थापना करना चाहते थे। इनके महत्वपूर्ण कार्यों और प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में अहम् योगदान के मद्देनजर ‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ और ‘पर्यावरण एवं वन मंत्रालय’ भारत सरकार द्वारा कोयम्बटूर के निकट ‘अनाइकट्टी’ नामक स्थान पर ‘सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र’ स्थापित किया गया।
ये थे सालिम अली। अब जानते है सालिम की गौरैया के बारे में, जिसने उन्हें ‘बर्डमैन ऑफ़ इंडिया’ बना दिया । सालिम अली को शिकार के दौरान एक ऐसी गौरैया हाथ लगी जो विलुप्त प्रायः और सामान्य गौरैया से बिलकुल अलग थी उसके गले के पास सुनहरा रंग था, जो सोना सी चमक लिये थी। इस गौरैया की पहचान बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू।एस। मिलार्ड ने की और सोनकंठी गौरैया नाम दिया। गौरैया की कंठ सोने के रंग जैसी थी। सुनते है सोनकंठी गौरैया की कहानी, सालिम अली की जुबानी, जिसे सालिम अली ने आत्म जीवन चरित्र पुस्तक “द फॉल ऑफ स्पैरो” ( मूल अंग्रेजी में पुस्तक का प्रकाशन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा 1985 में किया गया था जबकि हिंदी अनुवाद नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया ने 2005 में विश्वमोहन तिवारी से करवा कर प्रकाशित किया) में शब्दसह पिरोया है ।
बचपन में मां और पिता की मृत्यु के बाद सालिम अली अपने मामा अमीरुद्दीन तैयबजी और उनकी निःसंतान पत्नी हामिदा बेगम की स्नेह छाया में पलने लगे। हमारे पिता तुल्य मामा जी ने, जिनके साथ हम रहते थे वे गजब के शिकारी थे उनकी उपलब्धियों से प्रभावित होकर हम उन्हें अपना हीरो मानते थे। जब मैं 9 वर्ष का था तब मुझे एक एयर गन मामा ने भेंट की थी। जल्द ही गन चलाने की कुशलता प्राप्त कर ली थी और मैं गौरैयों को मार सकता था। बड़ी संख्या में गौरैया हमारे अस्तबल के पास रहती थी । घोड़ों के नकथैलों से गिरे दानों को खाती रहती थी, और दीवार तथा छतगिर में अनेक छेदों को अपना आवास बनाये हए थी ।
हम लड़के खुदा से डरने वाले मुस्लिम बच्चों की तरह पाले गए थे। हमें पता था कि गौरैया का गोश्त वैध गोश्त था और उसे हम तभी खा सकते थे जब उसे हलाल किया जाए। 9 या 10 वर्ष की उम्र में मैंने अपना प्रथम पक्षी नोट लिखा था। खेतवाड़ी अस्तबल में गौरैया के शिकार की घटना मुख्य विषय थी। दीवार में लकड़ी की खूंटियाँ ठोकी गई थी ताकि अश्व साज उन पर टांगे जा सके उनमें से एक खूंटी निकल आई थी इसलिए गौरैया को घोंसला बनाने के लिए एक सुराख उपलब्ध था। एक मादा गौरैया का उसमें घोंसला बनाने की घटना का वर्णन नोट में किया गया था । लगभग 60 वर्ष पश्चात जब उस नोट को खोजा, तब अनगढ़ तथा अपूर्ण होने के बावजूद प्रकाशित होने योग्य पाया गया जो थोड़े बहुत मूल रूप में इस प्रकार हैं-
“1906/07 जब मादा गौरैया अंदर सुराख़ में घोंसले के अंदर बैठी थी तब एक नर गौरैया सुराग के पास कील पर बैठा था । मैंने अस्तबल में खड़ी गाड़ी के पीछे से उसे मारा। थोडी देर में उस मादा गौरैया ने एक अन्य नर गौरैया को बुला लिया और नर गौरैया पहरेदार की तरह कील पर बैठा। मैंने उसे भी मार दिया । थोड़ी देर में उस मादा गौरैया के पास एक और नर गौरैया था, जो फिर पहरे पर बैठ गया । मैंने उसको भी मारा। अगले सात दिनों में मैंने उस स्थान पर आठ नर गौरैयों को मार गिराया, और प्रत्येक बार उस मादा गौरैया को एक नर गौरैया मिल जाता। मानो नर गौरैया उसके लिए हमेशा तैयार रहते थे, जो मृत पति गौरैया का स्थान ग्रहण कर लेते थे।“
…….मुझे इस नोट का गर्व है। यधपि यह नोट मेरी शिकार प्रतिभा का अभिलेख था, और इसके अन्य उपयोगों की संभावनाओं को समझने की शक्ति भी मुझ में उस समय नहीं थी, पर आज के व्यवहार संबंधी अध्ययन की दृष्टि से यह बहुत सार्थक सिद्ध हुआ।……देवनार में भूखे जानवरों से बचाने के लिए धान के पुआल के गट्ठर बनाकर किसान लोग वृक्षों पर रख देते थे। संध्या समय बड़ी संख्या में गौरैया उन गठारों में बसेरा बनाती थी। अंधेरा होने के समय आकर गठारों में सुरंग बनाकर घुस जाती थी, हम लोगों की रणनीति होती थी कि उनके आगमन के लिए तैयार रहें तथा केवल नर गौरैयों को शिकार बनाये। इसके पहले की सुरंग में वे गुम न हो जायें।……जहां तक मुझे याद आता है कि इस अवधि में, इसी तरह के गौरैया शिकार अभियान में पक्षियों के विषय में मेरी प्रथम वैज्ञानिक जिज्ञासा जागृत हुई थी। एक बार जब मेरा शिकार गौरैया का हलाल होने ही वाला था मुझे लगा कि उस चिड़िया में कुछ गड़बड़ है वह मेरे द्वारा मारी गई अनेक मादा गौरैयों के ही समान थी किंतु उसके कंठ पर एक पीला चकत्ता सा था, जैसे कि मसाले का दाग हो । मैंने उस चिड़िया को हलाल होने से रोका और चिड़िया के शव को अपने घर ले आया ताकि परिवार में इकलौते शिकारी मामा अमीरुद्दीन से आवश्यक जानकारी ले सकूं। उन्होंने उस चिड़िया को जांचा परखा और सहमत हुए कि वह कोई नई चिड़िया है। इसे उन्होंने भी पहले कभी नहीं देखा था। मामा अमीरुद्दीन, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सदस्यों में से थे, जो 1883 की स्थापना के तुरंत बाद ही बने थे । उस समय के अवैतनिक सचिव तथा मदिरा व्यवसायी फिप्सन एंड कंपनी के मालिक डब्ल्यू एस मिलार्ड के नाम उन्होंने मुझे परिचय पत्र दिया, जिसमें उन्होंने उस पक्षी को पहचान का आग्रह किया था।…..1908 की घटना है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से मेरा पहला संपर्क हुआ था, जो मेरे कार्य और जीवन को बदलने में महत्वपूर्ण कारक बना। जैसे ही मैंने श्री मिलार्ड को रहस्यमय पक्षी को दिखाया, तो एक झलक में उन्होंने बताया कि यह सोनकंठी गौरैया (Petronia xanthocollis पेट्रोनिया जैन्थोकोलिस) है। मुझे लाइब्रेरी में ले गए जहां उन्होंने इस पक्षी के अनेक मरे हुए नमूने प्रमाण स्वरूप दिखायें। गौरैया की अन्य अनेक जातियों के नमूने भी वहां रखे थे, जिन्हें उन्होंने निकालकर बड़े धैर्य पूर्वक समझाया तथा उनमें अंतर भी बताया। उन्होंने एक के बाद एक भारतीय साम्राज्य के सैकड़ों पंछी दिखाएं और मेरा विश्वास है इस क्षण में पक्षियों के प्रति मेरी जिज्ञासा को जैसे अचानक ही और आलोकित तथा जाग्रत किया था। छोटे से पुस्तकालय में से उन्होंने मुझे कुछ पक्षियों से संबंधित पुस्तकें पढ़ने को दी। और इस तरह मेरा परिचय एडवर्ड हैमिल्टन एटकिन अद्वितीय कालजयी पुस्तकें ‘बॉम्बे के पक्षी’ तथा ‘एक प्रकृति विज्ञानी की टोह’ से हुआ। पुस्तकों ने मेरी रूचि को और बढाया, और मैंने उन्हें पिछले 60 वर्षों में आनंदित होकर बार-बार पढ़ा……इस सोनकंठी गौरैया की घटना ने मेरे जीवन में ऐसे रास्ते खोल दिए जिस मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। और फिर मेरे अध्ययन की दिशा, प्राकृतिक इतिहास की पुस्तकों, विशेषकर पक्षियों की पुस्तकों की ओर अग्रसर हुई। उन दिनों ही क्यों उसके बाद अनेक वर्षों तक भारतीय पक्षियों पर सचित्र पुस्तकें लगभग नहीं के बराबर थी……इसमें तो कोई संदेह नहीं कि मेरा पक्षियों में गहरी रूचि लेने का श्रेय उस रहस्मयी ‘सोन चिरैया’ यानी सोनकंठी गौरैया को जाता है,जिसने मेरी दुनिया ही बदल दी ।

सालिम अली की गौरैया को ‘बिहार के बर्ड मैन’ एवं गरुड़ संरक्षण अरविन्द मिश्रा ने सर्व प्रथम मध्य प्रदेश के कान्हा के जंगल में देखा तो उसके बाद उनकी इच्छा इसे बिहार में देखने की भी हुई । पक्षियों के संरक्षण के लिए दुनियां की सबसे बड़ी संस्था इंग्लैंड की रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स के पक्षी वैज्ञानिक डॉ० पॉल डोनाल्ड के साथ बिहार में भटकते हुए उन्होंने इस पीतकंठी गोरैया को बिहार में पहली बार पूर्णिया के सिंघिया के वन क्षेत्र में देखा अप्रैल 2014 में । इसके बाद तो इसे जमुई जिले के गरही डैम में फरवरी 2022 में और अब बक्सर के गोकुल जलाशय के किनारे जून 2022 में भी देखा । 2014 में अच्छा कमरा न होने का अफ़सोस मिट गया जब जमुई और बक्सर में अरविन्द मिश्रा ने अपने कैमरे में इस दुर्लभ पक्षी को कैद किया । विलुप्त सोनकंठी गौरैया के बारे में श्री मिश्रा कहते हैं कि यदि संकल्प मन में है तो सपने बार-बार भी पूरे होते हैं और एक नन्ही सी जान भी जिन्दगी के मकसद बदल देती है । इसे हिंदी में राजी, जंगल चिड़िया या ललकंधा गौरैया भी कहा जाता है । मादा राजी के कंठ में पीलापन बहुत हल्का होता है, मगर इसकी चोंच घरेलू गौरैया से थोड़ी बड़ी और नुकीली होती है और नर पक्षी की चोंच प्रजनन काल में काली हो जाती है ।
सोनकंठी गौरैया की प्रजाति वृक्ष-प्रेमी होती है। हालांकि, कभी-कभी तारों और जमीन पर भी देखी जाती है। तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित संभवतः म्यांमार के कुछ हिस्सों में भी यह पाई जाती है।
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