पक्षियों के कृत्रिम घोंसले को लेकर उठा सवाल

संजय कुमार/ घर-आंगन और इंसान बीच रहने वाली घरेलू गौरैया यानी हाउस स्पैरो की विलुप्ति की दास्ताँन के बीच उसकी घर वापसी की पहल दुनिया भर में चल रही है। विलुप्ति के कारणों में से आवासीय संकट और पेड़ों का लगातार कम होना ने गौरैया सहित दूसरी चिड़ियों को संकट में डाल, पलायन या विलुप्ति…

संजय कुमार/ घर-आंगन और इंसान बीच रहने वाली घरेलू गौरैया यानी हाउस स्पैरो की विलुप्ति की दास्ताँन के बीच उसकी घर वापसी की पहल दुनिया भर में चल रही है। विलुप्ति के कारणों में से आवासीय संकट और पेड़ों का लगातार कम होना ने गौरैया सहित दूसरी चिड़ियों को संकट में डाल, पलायन या विलुप्ति की ओर घकेल रखा हैं। ऐसे में पक्षी प्रेमी गौरैया की घर वापसी पहल में कृत्रिम घोंसले (बॉक्स) लगाकर / लोगों के बीच वितरित कर, पहल कर रहे हैं। देश भर में  कृत्रिम घोंसलों का प्रचालन व्यापक हो चुका है। कई राज्यों में लकड़ी, प्लाई, मिटटी, गत्ता आदि के कृत्रिम घोंसला निर्माण लघु उधोग का स्वरूप ले चुका है। ऑनलाइन बाजार में 100 रूपये से हजार तक के रंग-बिरंगे घोंसले बिक रहे हैं।

कृत्रिम घोंसलों ने क्रांतिकारी बदलाव लाया है। कुछ लोग स्वयं घोंसले बना भी रहे हैं, इनमें मिटटी, कद्दू, लकड़ी,प्लाइ आदि के रंग-बिरंगे घोंसले शामिल हैं उनके घोंसलों में गौरैया आ भी रही हैं। साथ ही कृत्रिम घोंसलों के प्रवेश द्वार बड़े होने से दूसरी चिड़ियाँ भी उस में आ रही है, वहीँ पेड़ों की कमी को देखते हुए कई लोग गौरैया के अलावे दूसरी चिड़ियों को भी आवासीय संकट से उबारने के लिए कृत्रिम घोंसलों को भी लगा रहे हैं। ऐसे में शहरों में पक्षियों के संरक्षण के लिए कृत्रिम घोंसले के बक्सों को बढ़ावा नहीं दिये जाने का सवाल भी खड़ा हो गया है। बातुल पिपेवाला ने पक्षियों पर कृत्रिम घोंसलों के ‘नकारात्मक प्रभाव : एक समीक्षा” लुचांग झांग एट अल 2023’ का संदर्भ लेकर लिखा है कि पक्षियों का संरक्षण आजकल बाजार में उपलब्ध विभिन्न आकार, आकार और रंग के कृत्रिम घोंसले के बक्सों के रूप में चलन में है। मेरे विचार से, अधिक पेड़ लगाना, परिपक्व पेड़ों को दूसरी जगह लगाना पक्षियों के संरक्षण के लिए अधिक लाभकारी होगा। उन्होंने घोंसला क्या है? पर लिखा है कि घोंसला माता-पिता पक्षियों को अंडे देने और अपने बच्चों को पालने के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करता है। घोंसला कहाँ बनाएँ? पर लिखते हैं कि उपयुक्त घोंसले के स्थान का चयन पाँच मुख्य कारकों के संयोजन से निर्धारित होता है- माता-पिता और बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता, शिकार का जोखिम, सह-विशिष्टों की उपस्थिति और व्यवहार, उपयुक्त घोंसले के निर्माण की सामग्री की उपलब्धता और  बच्चों के पालन-पोषण के लिए परिवेशी जलवायु की उपस्थिति।

बातुल पिपेवाला लिखते हैं, पक्षी अपने अंडों/चूजों को बिल्लियों, साँपों और अन्य पक्षियों जैसे शिकारियों से बचाने के लिए सुरक्षित घोंसले के निर्माण स्थल का चयन करते हैं। वे शिकारियों के प्रकार के अनुसार अपने घोंसले बनाने की ऊँचाई बदलते हैं। स्तनधारी शिकारियों से बचाने के लिए जमीन से ऊपर और पक्षियों के शिकारियों के जवाब में नीचे। शिकारियों से बचाने के लिए घोंसलों को भी छिपाया जाता है। घोंसले की सामग्री परजीवियों से बचाव का काम भी करती है। हरे पौधों में वाष्पशील द्वितीयक यौगिक होते हैं जो परजीवियों और रोगजनकों को मार सकते हैं, घोंसलों पर पंख भी लगे होते हैं जो घोंसलों को गर्म रखने के अलावा इसके अंदर बैक्टीरिया के विकास को रोकते हैं। पक्षी बारिश से बचने के लिए छतरियों (शेड) के अंदर अपना घोसला बनाते हैं। उत्तर की ओर प्रजनन करने वाले पक्षी बड़े, कम छिद्रयुक्त घोंसलों का निर्माण करते हैं जो गर्मी को बेहतर बनाए रखते हैं लेकिन अधिक पानी को अवशोषित करते हैं और दक्षिण के घोंसलों की तुलना में सूखने में अधिक समय लेते हैं। पक्षियों के घोंसले ठंडे क्षेत्रों में कम गर्मी खोने वाले स्थानों पर स्थित होते हैं और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सीधे सूर्य के प्रकाश से बचते हैं। बातुल पिपेवाला, शहर में घोंसले के बक्सों के उपयोग की जाँच पर लिखते हैं, कृत्रिम घोंसले के बक्से लकड़ी, घास, सीमेंट और मिट्टी के बर्तन से बने होते हैं। लकड़ी के बक्से टूटने, सड़ने और क्षतिग्रस्त होने का खतरा होता है। सीमेंट के बक्से वायुरोधी होंगे। यदि बक्से का मुंह बड़ा है, तो यह शिकारियों को आकर्षित कर सकता है, और यदि बहुत छोटा है, तो माता-पिता पक्षियों के लिए चूजों को खिलाना मुश्किल हो जाएगा। घोंसले के बक्सों को बारिश से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए रंगा जाता है, जो पक्षियों को दूर भगा सकता है और शिकारियों को आकर्षित कर सकता है। पुराने घोंसले के बक्सों को यदि साफ नहीं किया जाता है, तो मल, मृत घोंसले के शव के कारण बाह्य परजीवी का भार बढ़ जाएगा और इसके परिणाम स्वरूप प्रजनन की सफलता कम होगी। घोंसले के बक्सों में आम मैना जैसी आक्रामक प्रजातियों के होने की संभावना अधिक होती है। जब बहुत सारे घोंसले के बक्से ऐसे क्षेत्रों में रखे जाते हैं जहाँ संसाधनों की कमी होती है, तो पक्षियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है, जिससे प्रजनन की सफलता कम हो जाती है। इस प्रकार, मेरा मानना है कि पक्षियों के संरक्षण को पौधों के संरक्षण से अलग नहीं किया जा सकता। अरविंद मिश्रा, जिन्होंने भागलपुर में ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क के संरक्षण पर उल्लेखनीय काम किया है, कहते हैं कि उनकी मुख्य चिंता यह थी कि क्या पक्षी कृत्रिम घोंसले को स्वीकार करेंगे और इसलिए उन्होंने RSPB.org.uk के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उन्हें लगता है कि पक्षी उपलब्ध पौधों से अपने घोंसले बनाएंगे और पक्षियों की सुरक्षा के लिए समुदाय में जागरूकता बहुत महत्वपूर्ण थी। हालांकि वैज्ञानिक रूप से डिज़ाइन की गई परियोजनाओं में हॉर्नबिल जैसे लुप्तप्राय पक्षियों के संरक्षण के लिए घोंसले के बक्सों के योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता है। अंत में लिखते हैं कि शहर में कृत्रिम पक्षी घोंसलों के बेतरतीब वितरण को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

बातुल पिपेवाला ने कृत्रिम घोंसलों को लेकर जो बातें कही है वे सच है साथ ही सवाल गंभीर भी है। अगर बात को गौरैया संरक्षण से जोड़ कर देखें तो कृत्रिम घोंसलों ने बड़े पैमाने पर देश भर में गौरैया को आसरा दिया है। गौरैया ने कृत्रिम घोंसला को स्वीकार किया है और अंडे दिए बच्चे भी निकले। जहाँ बड़े प्रवेश द्वारा वाले घोंसले गौरैया के लिए लगे वहां मैना, दहियर आदि ने कब्ज़ा जमाया। घरेलू गौरैया के लिए कुछ लोग पेड़ पर घोंसला लगा देते हैं, जबकि पेड़ों पर सोनकंठी गौरैया, हिंदी में राजी, जंगली चिड़िया या ललकंधा गौरैया कहते हैं घोंसला बनाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संजय साहू ने देखा कि, “सोनकंठी यानि जंगली गौरैया पिछले कई वर्षों से उनके क्षेत्रों में हैं। जिसे लोग  ‘बगरेला’ के नाम से जानते हैं। अमूमन ये जंगल के पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं लेकिन घरेलू गौरैया के लिए मिट्टी के लगे जो घोंसला घरों में लगा रखे हैं, उसमें भी ये वाली गौरैया सिल्वर बिल पक्षी के साथ-साथ घोंसला बनाने लगी। इससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पक्षी खुद तय करते हैं कि उनको कहाँ घोंसला बनाना है । हालाँकि वे प्राकृतिक घोंसला को पहले स्वीकार करते हैं। वैसे कृत्रिम घोंसलों के नकारात्मक पक्ष पर भी सोचना होगा। कृत्रिम घोंसलों का रंगा होना, प्रवेश द्वार का बड़ा होना, लकड़ी के बक्से का टूटने, सड़ने और क्षतिग्रस्त होने का खतरा का होना, ज्यादा घोंसला लगाने से पक्षियों के बीच प्रतिस्पर्धा का बढ़ना, जिससे प्रजनन की का होना आदि पर विचार करने की जरुरत है। पेड़ पर घोंसला बनाने वाले पक्षियों के मद्देनजर पेड़ों को लगाने पर बल दिया जाना चाहिए। बहरहाल, शोध और पहल की जरुरत हैं ताकि पक्षियों के अनुकूल घोंसले हो।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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