मानव कल्याण में एथनोबोटनी ( ETHNOBOTANY ) के उपयोग की आवश्यकता : आज के परिदृश्य में समय की मांग
*प्रो. श्याम नंदन प्रसाद/ लोक वनस्पतिविज्ञान ( ETHNOBOTANY ) विज्ञान की वह शाखा है , जिसके अंतर्गत विभिन्न संस्कृतियों और आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा पौधों के पारंपरिक उपयोग जैसे दवा , भोजन और धार्मिक कार्यों का अध्ययन किया जाता है । मानव गतिविधियों के कारण उत्पन्न पर्यावरण संकट ने मुझे प्रेरित किया कि मैं पौधों के पारंपरिक उपयोग पर अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण हेतु एक संदेश पहुंचाने का काम करूं । प्राचीन काल से ही मानव जड़ी बूटियों का उपयोग रोगमुक्त होने में करता चला जा रहा है , यह सर्वविदित है ।
प्रसंगवश रामायण काल में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा राम भक्त हनुमान जी द्वारा द्रोणगिरी पर्वत से लाए गए संजीवनी बूटी से ही हुई थी , यह जग जाहिर है । प्रीमिटिव सोसाइटी के लोग जैसे आदिवासी लोग बहुत पहले से ही उनके हैबिटेट में पाए जाने वाले वाइल्ड पौधों ( स्वयं उगने वाले पौधे ) का उपयोग मुख्य रूप से दवा के रूप में करते थे । आज भी वे लोग पौधों का पारम्परिक उपयोग करते है और स्वस्थ रहते हैं ।
प्रकृति ने हमें औषधियों पौधों का अकूत भंडार दिया है । जितनी भी होम्योपैथिक दवाएं हैं , वे मुख्य रूप से औषधियों पौधों से ही बनतीं हैं । उनकी शीशी के ऊपर व्यवहार किए जाने वाले पौधे का कॉमन और वानस्पतिक नाम दोनो लिखे रहते है । आयुर्वेदिक दवाएं तो औषधियों पौधों से ही बनाई जाती हैं । एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में पौधों के वर्क ( Extract ) का व्यवहार बड़े पैमाने पर किया जाता हैं । उदाहरणस्वरूप , मलेरिया से रोगमुक्त होने की दवा कुनैन सिनकोना नामक पेड़ की छाल ( Bark ) से बनाया जाता है । उसी प्रकार दर्द निवारक मार्फिन और कोडीन अफीम का पौधा ओपियम पॉपी से बनाया जाता है । जानलेवा कैंसर के लिए किमोथिरेपी के दौरान उपयोग में आने वाली TEXOL नामक दवा Pacific Yew नामक पेड़ की छाल से निर्मित होता है । वह कौन सा घर है , जिसके आंगन में तुलसी ( Ocimum sanctum ) का पौधा नहीं हो । सर्दी , जुकाम , खांसी और स्वांस संबंधी संबंधी रोगों में तुलसी का काढ़ा रामबाण साबित होता है , यह किसी से छिपा नहीं है ।
आदिवासियों द्वारा पारम्परिक उपयोग में आने वाले पौधों में प्रमुख हैं – नीम , महुआ , गिलोय , तुलसी , हरड़ ( Terminalia chebula ) , अर्जुन ( Terminalia arjuna ) , आंवला और बहेरा इत्यादि । यह पारंपरिक ज्ञान परम्परा आज भी ग्रामीणों और आदिवासियों के प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का मुख्य आधार है । आदिवासी समुदाय में स्थानीय पौधों के औषधियों गुणों के बारे में भरपूर ज्ञान होता है । उनके इस ज्ञान और पारम्परिक खेती से जैव विविधता कायम रहती है एवं इस प्रकार आदिवासी पर्यावरण संरक्षण में महत्व्पूर्ण भूमिका निभाते हैं ।
अगर हम बिहार की बात करें , तब प्रसंगवश लखीसराय से लेकर फतुहा तक दक्षिण की ओर अवस्थित टाल क्षेत्र में वहां के निवासियों द्वारा पौधों के पारंपरिक औषधियों के उपयोग की चर्चा किए बिना यह आलेख अधूरा रह जायेगा । टाल क्षेत्र एक निचला क्षेत्र ( Low lying area ) है , जहां बरसात ( Rainy season ) में एक लम्बी अवधि तक वर्षा का पानी जमा रहता है और उस क्षेत्र के गांव चारों ओर से घिरे रहते है । मेरे गाइडेंस में ” Traditional Medicinal Uses of Plants of Tal area of Patna District , Bihar ” टोपिक पर AWARDED Ph.D. Degree की Thesis में उस वक्त टाल क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा पौधों के पारस्परिक औषधियों उपयोग का विस्तृत विवरण है , जिसे मगध यूनीवर्सिटी की लाइब्रेरी में देखा जा सकता है । अब उक्त क्षेत्र में रोड बन जाने के बाद टाल क्षेत्र के गांव सड़क से जुड़ गए है । यह बेहद हर्ष की बात है कि आज भी इन क्षेत्रों के ग्रामीण अपने पारंपरिक ज्ञान को संजोए हुए हैं। यही आज समय की मांग है । इस बदलते परिवेश में हमें अपनी ज्ञान परम्परा को जीवित रखना है । यही नहीं , इस पारस्परिक ज्ञान का Digitalization भी जरूरी है , ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस अदभुत ज्ञान का लाभ प्राप्त हो सके ।
अंत में यहां महान प्राचीन दार्शनिक अरस्तू के अदभुत संदेश को उद्धृत किए बिना नहीं रह सकता हूं । उन्होंने कहा था कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग का वास होता है , जो आज भी प्रासंगिक है । यह ठीक ही कहा गया है कि स्वास्थ्य से बढ़ कर कोई दौलत नहीं होता है ।
आइए ! हम स्वस्थ जीवन प्रणाली अपनाकर अपने प्रिय देश भारत को उच्चाइयों पर ले जाने में साकारात्मक भागीदारी सुनिश्चित करने का संकल्प लें ।
*पी. एचडी. ( प्लांट इकोलॉजी ) , पर्यावरणविद्
चीफ कॉर्डिनेटर , वनस्पति शास्त्र विभाग , नालंदा खुला विश्वविद्यालय , नालंदा , बिहार , इंडिया ।















