प्रो. श्याम नंदन प्रसाद / आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है । इस संकट से मुक्ति पाने की दिशा में सरकारी स्तर पर निःसंदेह प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु आम नागरिकों की भागीदारी के बिना इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51- A (g) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा स्पष्ट निर्देशित है कि वनों , नदियों , झीलों और वन्यजीवों की रक्षा करना भारत के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
आज पूरा विश्व पर्यावरण संकट की दंश झेल रहा है । इस विषम परिस्थिति के लिए मानव गतिविधियां जिम्मेवार है, इस नंगे सत्य से हम इनकार नहीं कर सकते हैं। विकास के साथ प्रकृति के विनाश की पटकथा लिख रहा है मानव । विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर मानव ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का प्रदूषण , बढ़ता तापमान और घटते जल स्रोत अब मानव सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है , ऐसा हमारा मानना है । प्रकृति अब मौन नहीं है । अभी 4 – 5 दिनों से देश के कुछ भागों खासकर बिहार में पड़ रही भीषण गर्मी प्रकृति के द्वारा एक चेतावनी है कि हे मानव ! सचेत हो जाओ। यदि तुम प्रकृति से इसी तरह छेड़ छाड़ करने रहे , तब एक ना एक दिन इस धरती से तुम्हारा मिट जाना तय है।
पर्यावरण संरक्षण से निजात पाने में सरकारी स्तर पर निःसंदेह प्रयास किए जा रहे हैं , किंतु जब तक आम नागरिकों की सकारात्मक भागीदारी नहीं होगी तब तक हम इस गंभीर संकट से मुक्ति नहीं पा सकते हैं , ऐसा हमारा स्पष्ट मानना है । हमें जागना होगा । नदियों की पवित्रता लौटानी होगी । गंगा नदी, जिसे हम प्राचीन काल से ही मां गंगा के नाम से पुकारते आ रहे हैं , वह प्रदूषण की शिकार हो गई हैं । इसके लिए कौन जिम्मेवार है ? निश्चित रूप से मानव गतिविधियां ही जिम्मेवार हैं। गंगा नदी में अपशिष्ट पदार्थों के डालने से ही गंगा की पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ा है, जिसके चलते देशी मछलियां, डॉल्फिन एवं अन्य जलीय जीव विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं । गैंगटिक डॉल्फिन को बचाने और संरक्षित करने की दिशा में भारत सरकार द्वारा प्रोजेक्ट डॉल्फिन , नमामि गंगे कार्यक्रम जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं । अगर आम लोगों की भागीदारी नहीं होगी , तब क्या हम डॉल्फिन को बचा पाएंगे , कदापि नहीं ।
गंगा नदी, जिसे हम मां कहते हैं , उनमें अपशिष्ट पदार्थों का डालना उचित है ? क्या हमारा यह व्यवहार मां का अपमान नहीं हैं ? क्या हम प्राचीन संस्कृति को भूलते जा रहे हैं ? क्या भारतीय संविधान में निर्देशित दायित्व का पालन करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है ? ये ऐसे अनगिनत सवाल हमारे जेहन में गूंजते रहते हैं और मन दुखित हो जाता है यह सोच कर कि हम क्या अपने आने वाली पीढ़ियों को इससे भी गंभीर पर्यावरणीय संकट को झेलने के लिए छोड़ना चाहते हैं ? कल विश्व जैव विविधता दिवस पर हमने अपने दिल की आवाज आम जनों तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास है ।
शेष अगले कड़ी में ।

प्रो. श्याम नंदन प्रसाद,पर्यावरणविद् & चीफ कॉर्डिनेटर , वनस्पति शास्त्र विभाग , नालंदा खुला विश्वविद्यालय , नालंदा , बिहार , इंडिया ।
प्रदेश अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व प्राप्त और महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास के लिए समर्पित वूमेन पावर सोसियलिटी फाउंडेशन ( WPSF ) , बिहार इकाई , पटना , इंडिया















