संवाददाता, पटना/ बिहार की नदियों, चौर, आर्द्रभूमि और झीलों से समृद्ध बिहार में कभी 100 से अधिक छोटी-बड़ी देसी मछली प्रजातियां प्राकृतिक रूप से पायी जाती थीं. लेकिन, अब इनमें से कई प्रजातियां तेजी से गायब हो रही हैं. सौ में लगभग 20 प्रजाति की मछली ही बिहार में मिल रही है. वर्तमान में रोहू कतला, मृगल, कॉमन कार्प, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प, बिगहेड कार्प, सिंगी, मांगुर, टेंगरा, पंगास, पंगासग, झींगा, गैंची, चेल्हवा, बाम, पोटी, नैनी, कतला और रेहू की स्थानीय किस्मों का ही उत्पादन हो रहा है. केवल सीमित प्रजातियां ही सामान्य रूप से बची हैं. डेयरी, पशु व मत्स्य संसाधन विभाग ने इसे लेकर अनुसंधान कराया है. इसके कारणों की पड़ताल की है. इसमें बताया गया है कि बढ़ते शहरीकरण, जल प्रदूषण, रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल और अन्य मानवीय गतिविधियों का सबसे ज्यादा असर देसी मछलियों पर पड़ा है. जिन जलस्रोतों में पहले मछली की कई प्रजातियां बड़ी संख्या में मिलती थीं, वहां अब चुनिंदा प्रजातियां ही दिखाई दे रही हैं. क्षेत्रवार मछलियां विलुप्त हुई हैं.
दुर्लभ होती जा रहीं छोटी देसी मछलियां
अनुसधान में बताया गया है कि बिहार की कई मूल देसी प्रजातियां संकटग्रस्त हो चुकी हैं. पहले गांवों के तालाबों, आहर-पइन और नदियों में आसानी से मिलने वाली छोटी देसी मछलियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं. इसका असर जैव विविधता के साथ-साथ पारंपरिक मत्स्य पालन और मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है.
संकट से उबारने के लिए शुरू हुई पहल
बिहार में छह प्रजातियों पर मछली पालन की निर्भरता है. देसी मूल के माइनर कार्प, केट फिश, वायु श्वासी मछली, झींगा पालन पर निर्भरता है. इन प्रजातियों को बढ़ाया जायेगा. 65 एकड़ में माइनर मेडियम, 51 एकड़ में झींगा, 50 एकड़ में मोती का पालन किया (साभार- प्रभात खबर,पटना ,18-5-2026)















