100 में 80 मछलियों की किस्में विलुप्ति के कगार पर

संवाददाता, पटना/ बिहार की नदियों, चौर, आर्द्रभूमि और झीलों से समृद्ध बिहार में कभी 100 से अधिक छोटी-बड़ी देसी मछली प्रजातियां प्राकृतिक रूप से पायी जाती थीं. लेकिन, अब इनमें से कई प्रजातियां तेजी से गायब हो रही हैं. सौ में लगभग 20 प्रजाति की मछली ही बिहार में मिल रही है. वर्तमान में रोहू…

संवाददाता, पटना/ बिहार की नदियों, चौर, आर्द्रभूमि और झीलों से समृद्ध बिहार में कभी 100 से अधिक छोटी-बड़ी देसी मछली प्रजातियां प्राकृतिक रूप से पायी जाती थीं. लेकिन, अब इनमें से कई प्रजातियां तेजी से गायब हो रही हैं. सौ में लगभग 20 प्रजाति की मछली ही बिहार में मिल रही है. वर्तमान में रोहू कतला, मृगल, कॉमन कार्प, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प, बिगहेड कार्प, सिंगी, मांगुर, टेंगरा, पंगास, पंगासग, झींगा, गैंची, चेल्हवा, बाम, पोटी, नैनी, कतला और रेहू की स्थानीय किस्मों का ही उत्पादन हो रहा है. केवल सीमित प्रजातियां ही सामान्य रूप से बची हैं. डेयरी, पशु व मत्स्य संसाधन विभाग ने इसे लेकर अनुसंधान कराया है. इसके कारणों की पड़ताल की है. इसमें बताया गया है कि बढ़ते शहरीकरण, जल प्रदूषण, रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल और अन्य मानवीय गतिविधियों का सबसे ज्यादा असर देसी मछलियों पर पड़ा है. जिन जलस्रोतों में पहले मछली की कई प्रजातियां बड़ी संख्या में मिलती थीं, वहां अब चुनिंदा प्रजातियां ही दिखाई दे रही हैं. क्षेत्रवार मछलियां विलुप्त हुई हैं.

दुर्लभ होती जा रहीं छोटी देसी मछलियां
अनुसधान में बताया गया है कि बिहार की कई मूल देसी प्रजातियां संकटग्रस्त हो चुकी हैं. पहले गांवों के तालाबों, आहर-पइन और नदियों में आसानी से मिलने वाली छोटी देसी मछलियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं. इसका असर जैव विविधता के साथ-साथ पारंपरिक मत्स्य पालन और मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है.

संकट से उबारने के लिए शुरू हुई पहल
बिहार में छह प्रजातियों पर मछली पालन की निर्भरता है. देसी मूल के माइनर कार्प, केट फिश, वायु श्वासी मछली, झींगा पालन पर निर्भरता है. इन प्रजातियों को बढ़ाया जायेगा. 65 एकड़ में माइनर मेडियम, 51 एकड़ में झींगा, 50 एकड़ में मोती का पालन किया (साभार- प्रभात खबर,पटना ,18-5-2026)

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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