गौरैया एक पत्नीक होती है

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया के रोचक पक्षी है। जो इंसान के बेहद करीब और कई मायने में मिलती – जुलती छवि लिए रहती है। गौरैया एक पत्नीक होती हैं, और वे अपने साथी के साथ एक मजबूत बंधन बनाती हैं। साथ ही वे अपने घोंसले के स्थान से भी बहुत जुड़ी हुई होती हैं। प्रजनन…

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया के रोचक पक्षी है। जो इंसान के बेहद करीब और कई मायने में मिलती – जुलती छवि लिए रहती है। गौरैया एक पत्नीक होती हैं, और वे अपने साथी के साथ एक मजबूत बंधन बनाती हैं। साथ ही वे अपने घोंसले के स्थान से भी बहुत जुड़ी हुई होती हैं। प्रजनन के मौसम में, नर गौरैया अपने घोंसले के निर्माण स्थल पर अपना ज्यादा समय बिताता हैं, जो यह दर्शाता है कि वे अपने घोंसले की रक्षा और देखभाल में बहुत रुचि रखते हैं।

झुण्ड में रहने वाली गौरैया प्रजनन के मौसम आते ही जोड़ा बना लेती है। एक दूसरे के प्रति भरोसा होने के बाद जोड़े में अक्सर रहते हैं। नर घोंसला स्थल खोजता है, जाँच पड़ताल में अनुकूल लगा तो निर्माण में लग जाता है मादा भी तिनके रखने में सहायत करती है। समय समय पर नर गौरैया, मादा के साथ मेटिंग करता है। नृत्य और संगीत का सहारा लेता है। 5 से 10 सेकेण्ड के कई चक्र चलते हैं। चौड़े बिब साइज वाले नर, संकरे बिब साइज वाले नरों की तुलना में अधिक बार मेटिंग करते हैं, और आक्रामक तरीके से घोंसले के स्थानों की रक्षा करते हैं। बहुत कम मामले में जोड़ा टूटता है। देखा गया है कि जोड़ा बनने, घोंसला बन जाने के बाद मादा गौरैया जब घोंसलें में नहीं लौटती, तब नर गौरैया घोंसले में अंदर-बाहर करते हुए पास में बैठ कर तीखे आवाज में मादा को बुलाता रहता हैं, यह सिलसिला दस से पंद्रह दिन चलता है और अंत में वह घोंसला छोड़ चला जाता है। इस मामले में या तो मादा गौरैया के साथ कुछ होता है या वह नर को छोड़ झुण्ड में चली जाती है।

घरेलू गौरैया जमीन से 8 से 30 फीट की ऊंचाई पर घोंसले बनाते हैं और हर साल उनका दोबारा इस्तेमाल भी करते हैं। गौरैया के घोंसले आमतौर पर सूखी घास, पत्तियों, कोमल तिनके, पुआल, कागज़ और पंखों का एक अव्यवस्थित ढेर होते हैं, वैसे बयां चिड़ियाँ की तरह घोंसला नहीं बनाती है बस घास-फूस आदि रख देती है। ज्यादातर दीवार में होल को चुनती है। घोंसले का निर्माण अंडे देने से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाता है। घरेलू गौरैया के अंडे देने के समय से लेकर एक स्वतंत्र किशोर पैदा होने में केवल 25 से 30 दिन लगते हैं और यौन परिपक्वता 6 से 9 महीने में हो जाता है। इसके अलावा, घरेलू गौरैया आक्रामक रूप से घोंसले की रक्षा करती हैं। घरेलू गौरैया दृढ़ निश्चयी, साधन संपन्न और बुद्धिमान होती हैं। गौरैया एकपत्नीक होती हैं, लेकिन साथी की तुलना में घोंसले के स्थान से ज़्यादा जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।  अंडे देना मार्च या अप्रैल में शुरू होता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से महीने में आगे पीछे भी होता है। आमतौर गौरैया पर पांच अंडे देती है, जो  धब्बेदार सफेद अंडों के औसतन 3 से 4 समूह में होते हैं। अंडे को नर और मादा दोनों 10-16 दिनों तक सेते हैं और बच्चे लगभग 15 दिनों तक घोंसले में रहते हैं। मादाएं घोंसले में रहने वाले बच्चों को पालने की प्राथमिक जिम्मेदारी लेती हैं, और बार- बार बच्चों से मिलने जाती हैं, उड़ने के बाद, पक्षी नए भोजन क्षेत्रों की तलाश में कई किलोमीटर तक भटकते हैं।द क्योंकि बच्चे को शुरुआत में कीड़ें खिलाते हैं। कीड़ें उन्हें फसल-फूल-सब्जी-गोबर के पास मिलता है। गौरैया का जीवनकाल तीन से पांच  साल का सामान्य होता है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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