संजय कुमार/ घरेलू गौरैया और इंसान की दोस्ती नई नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी है। इन्सान जहाँ-जहाँ गया पीछे-पीछे नन्ही गौरैया उसके घर-आँगन या आसपास चली आई और साथ-साथ रहने लगी। बच्चों का बचपन उसके साथ गुजरा, तो खेतों में लगी फसलों एवं बाग़-बगीचा के फल-फूल-सब्जी को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को अपना आहार बना कर किसान मित्र बनी। गौरैया घर की सदस्य, यानि दादी-नानी, दादा-नाना,दोस्त की तरह, जो सुबह सबसे पहले जागते और पूरे घर को अपनी चहचहाहट से जगाती। वह हमसे कुछ मांगती नहीं, बस जमीन पर गिरे अनाज के दाने और थोडा सा प्यार । लेकिन हमने अपना व्यवहार परिवर्तन कर आधुनिकता की चादर ओढ़ ली। कंक्रीट के जंगल का फैलाव हुआ, खपरैल-फूस या पक्के घर से उसे बहार कर दिया ।
कल तक जो चहचहाहट हमारे घर के आँगन का अभिन्न हिस्सा थी, आज वह केवल यादों की गलियों में कहीं खो गई है। विकास की लकीर जो खींची उससे नन्हा साथी पीछे छूटता चला गया। गौरैया बिना किसी स्वार्थ के हमारे साथ रहती। आज सन्नाटे से भरे बंद रोशनदान और सूने पड़े घर के कोने कहते रहते हैं , लौट आओ न नन्हे दोस्त गौरैया । हालाँकि, घरेलू गौरैया पूरी तरह से विलुप्त नहीं हुई है। अभी भी कई घरों को अपनी चहचहाहट से खुशहाल बनाये हुए हैं। लेकिन, सच यह भी है कि कई घरों शहरों से गायब हो चुकी है । लोग कहते हैं, अब गौरैया नहीं दिखती । गौरैया का हमसे दूर जाना केवल एक इत्तेफाक या घटना नहीं है, बल्कि हमारी जीवनशैली में बदलाव का नतीजा है । घरों से मिट्टी की खुशबू गायब हो गयी है और वह घर का कोना भी नहीं रहता जहाँ वह सुरक्षित घोंसला बना सके। हमने अपने घरों को पैक कर दिया जिससे हवा तो क्या, पक्षियों का प्रवेश भी वर्जित हो गया है। पैकेट बंद आहार ने गौरैया के सामने आहार संकट भी पैदा किया । पहले घर के बाहर अनाज सुखाए और साफ़ किये जाते थे, दोस्त गौरैया झुण्ड आती और अब दाना चुगती अब दाना ढूँढना एक कठिन संघर्ष बन गया है। गौरैया घास का बीज पसंद से खाती है लेकिन कंक्रीट के सड़कों ने घास को भी उजाड़ दिया ।
जब से गौरैया पलायन की है, पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने लगा है। गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं थी, वह हमारे घरों के अंदर और बगीचे के कीड़ों को खाकर पौधों एवं हमारी रक्षा करती है। नन्हे दोस्त गौरैया की घर वापसी की पहल हमें करनी होगी क्योंकि हमारी वजह से नन्ही दोस्त रूठ कर कहीं चली गयी है ।
गौरैया की वापसी एक बड़ा और अहम् सवाल है क्योंकि केवल एक पक्षी की वापसी नहीं होगी, बल्कि यह हमारी संस्कृति, संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति प्रेम की जीत होगी। वैसे गौरैया का अस्तित्व एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से वापसी का रास्ता धुंधला पड़ता जा रहा है।असंतुलित पर्यावरण, शहरीकरण और आधुनिक वास्तुकला ने गौरैया से उसका सबसे मौलिक अधिकार यानी आवास छीन लिया है। गौरैया का गायब होना ईकोसिस्टम के ढहने की पहली चेतावनी भी है। सकारात्मक पक्ष यह है कि गौरैया संरक्षण का जो बिगुल 20 मार्च 2010 ‘विश्व गौरैया दिवस को फूंका गया था उसकी गूंज असर दिखने लगी है, लोगों के प्रयास से उनके घरों में फिर से गौरैया की घर वापसी हुई है ।
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