संजय कुमार/ गौरैया / घर-आँगन, छत और मुंडेर पर बैठ चींचीं करने वाली गौरैया आज कहीं दिखती है, तो कहीं एक दम से नहीं दिखती है। पर्यावरणविदों के लिए गौरैया का गायब होना चिंता का विषय है कि पिछले कुछ दशकों में गौरैया की आबादी में 60% से 80% तक की भारी गिरावट देखी गई है। गाँवों की तुलना में शहरों में यह स्थिति और भी भयावह है। आखिर वे कौन से कारण हैं जिन्होंने हमारी इस नन्ही सहेली के घोंसलों को सूना कर दिया है? गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण हैं जिन पर लगातार शोध हो रहे हैं। मूल कारणों में बढ़ता आवासीय संकट, आहार की कमी, खेतों में कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली में बदलाव, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, शिकार, गौरैया को बीमारी और मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले रेडिएशन(दोषी माना जाता है लेकिन स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020- रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स ने अपने रिपोर्ट इसे ख़ारिज किया है ।
वैसे, सबसे पहले आवासीय संकट सामने आता है। गौरैया सदियों से इंसानी बस्तियों के बीच रहती आई है। पुराने घरों में खपरैल, खुले रोशनदान और दीवारों में बने खोह उनके लिए सुरक्षित घोंसले की जगह थी। लेकिन, आधुनिक घरों में कांच की दीवारें और फ्लैट सिस्टम ने इन छिद्रों को खत्म कर दिया है। गाँवों में भी कंक्रीट के घरों ने अब गौरैया के लिए कोई कोना नहीं छोड़ा है। आवासीय संकट के साथ साथ चिड़ियों को बैठने की जगह भी कम होती जा रही है। बढ़ते कंक्रीट के जंगल के बीच लोगों ने दीवारों पर कीलें या शीशे के टुक्कड़ों को लगवा देते हैं। इससे चिड़िया बैठ नहीं पाती है और भटकती रहती है या उस पर बैठने से घायल हो जाती है। मिसाइलमैन व पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम के सामने ऐसा ही वाक्य आया, तो उन्होने “पक्षियों के प्रति करूणा” दिखायी थी। वाक्य यह है कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डी.आर.डी.ओ) में कार्य करने के दौरान मिसाइलमैन डॉ. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम किसी महत्वपूर्ण बिल्डिंग की बाहरी दीवार को सुरक्षित करने पर चर्चा कर रहे थे। एक सुझाव आया कि “क्यों न चारदीवारी पर शीशे के टूटे हुए टुकड़े लगा दिए जाएं। “डॉ. कलाम ने इस पर सीधे इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, नहीं, “अगर हमने ऐसा किया तो पक्षी उन दीवारों पर नहीं बैठ पाएंगे”
मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों को गौरैया की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुँचाने के लिए दोषी करार देते हैं। स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020- रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स ने अपने रिपोर्ट में साफ-साफ कहा है पिछले 25 साल से गौरैया की संख्या भारत में स्थिर बनी हुई है। और, मोबाईल टावर से गौरैया को कोई नुकसान नहीं है। देखा जाये तो भारत में 1950-70 तक गौरैया की संख्या बढ़ी थी। जबकि 1970-90 के बीच गिरावट आई थी। दोनों काल में मोबाईल टावर नही थे।
गौरैया शाकाहारी लेकिन कीड़ो-मकोड़ों को आहार बनाती है। लेकिन, मांस नहीं खाती है। वह अनाज के साथ-साथ छोटे कीड़े चुग लेती है। गाँव- शहरों में अब अनाज साफ करने का काम सिमटता जा रहा है। सब कुछ पैकेटबंद आने लगा है। किसान खेतों और बगीचों में जिन कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं, उनसे वे कीड़े मर जाते हैं जो गौरैया के बच्चों का मुख्य आहार जो कीड़े होते हैं, उन्हें नहीं मिल पता है। भोजन न मिलने के कारण चूजे घोंसलों में ही दम तोड़ देते हैं। गाँव-शहरों में गौरैया की कमी का एक कारण बदलता पारिस्थितिक तंत्र भी है। कबूतरों की बढ़ती संख्या ने गौरैया के दाना-पानी के स्रोतों पर कब्जा कर लिया है। लोग भी कबूतरों को दाना खिलाते है लेकिन गौरैया के लिए दाना – पानी नहीं रखते हैं । पेड़ों की कटाई ने भी गौरैया को हमसे दूर कर दिया है। जब पेड़ों की कटाई होती है तब गौरैया कहीं और जगह तलाशने निकल पड़ती हैं। शाम होते ही रात गुजारने के लिए ये पेड़ों पर तो बैठती ही साथ ही दिन में भी आराम करने/ खेलने के लिए पेड़ पर आती हैं। कांटेदार झुरमुठ और घने पत्ते वाले पेड़ों पर गौरैया और छोटी चिड़ियों सुरक्षित आश्रय बनाती हैं। पीपल, नीम, गुलमोहर, नीबू, गुलाब, शमी, ब्लैकबेरी, बोगनविलिया मालती की झाड़ियाँ आदि गौरैया को खास पसंद है। गौरैया की संख्या बढ़े इसके लिए हमें उसके लिए आवास, आहार, पेड़, थोडा सा प्यार और बेहतर पर्यावरण देना होगा। गौरैया संरक्षण के दिशा में चल रहे प्रयास से गौरैया की घर वापसी की खबर भी मिल रही है। आप भी इस अभियान से जुड़ें,गौरैया को घर वापस बुलाएँ ।
















