सपनों को पंख देना मैंने गौरैया से सीखा : आशा प्रसाद

गौरैया संरक्षक /आशा प्रसाद : बिहार, पटना, के अंबेडकर पथ की आशा प्रसाद जो आम्रपाली इनर व्हील क्लब की प्रेसिडेंट रही हैं। जो पिछले 6 सालों से “Save Sparrow” प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया है। शुरुआत में मेरे घर पर सिर्फ़ तीन या चार गौरैया आती थीं। वे बताती हैं कि छह महीने की…

गौरैया संरक्षक /आशा प्रसाद : बिहार, पटना, के अंबेडकर पथ की आशा प्रसाद जो आम्रपाली इनर व्हील क्लब की प्रेसिडेंट रही हैं। जो पिछले 6 सालों से “Save Sparrow” प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया है। शुरुआत में मेरे घर पर सिर्फ़ तीन या चार गौरैया आती थीं। वे बताती हैं कि छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद गौरैया की संख्या बढ़ने लगी। मैंने 1000 से ज़्यादा गौरैया के घर भी बांटे हैं और उनके बचाव के बारे में जागरूकता फैलाई है। मेरे जानने वाले बहुत से लोग मेरी सलाह मानने लगे हैं और उन्होंने भी गौरैया के बचाव पर काम करना शुरू कर दिया है। मेरा परिवार और स्टाफ़ भी इसमें शामिल है और उन्होंने चिड़ियों के घर बनाने और पेड़ लगाने में पूरी तरह से इन्वेस्ट किया है। हमने अपने गाँव में भी लगभग एक हज़ार पेड़ लगाए हैं और हम अपने अपार्टमेंट की छत पर सब्ज़ियाँ और फल उगाते हैं। मैं अपने आस-पास के लोगों की शुक्रगुज़ार हूँ जो मेरे काम में मेरा साथ देते हैं और मुझे उम्मीद है कि मैं गौरैया और पर्यावरण के बचाव पर काम करना जारी रखूँगी।

आशा प्रसाद कहती हैं, सपनों को पंख देना, शायद मैंने चिड़ियों खासकर गौरैया से सिखी। बचपन में हीं मुझे गौरैया से काफी लगाव हो गया था। इस छोटी सी चिड़िया ने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी होगी। सुबह-सुबह इनकी चहचहाहट से नींद खुलने की आदत हो गई थी। यह एक झुंड में हमारे बराबर रह रही थी।

शहर के विकास ने हमें आगे बढ़ना सिखाया, पर इनसे दूर कर दिया। अब बहुत सालों बाद फिर से मेरी सुबह इनकी आवाज़ से होती है, यह ख़ुशी अवर्णनीय है। हमारे घर की छोटी सी बालकनी में पचास से अधिक गौरैया आती हैं। यह काम आसान नहीं था, पर बहुत अनुभव से भरा था। इन्हें बुलाने में मुझे तीन साल लगे, इस काम को अंजाम देने में बहुत सारे लोगों का योगदान रहा है। जिस तरह से मनुष्य को रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, हमारी गौरैया को भी घर, प्यार, और दाना चाहिए। हमारी नई पीढ़ी को इनके बारे में जागरूक करना मेरा एक मकसद है, साथ ही इनका महत्व और व्यवहार का अध्ययन करना भी। आजकल हमारी बालकनी में गौरैया को देखकर लोग भी हैरान हो जाते हैं। उनकी संख्या में गिरावट की दर के बारे में सोचें। ऐसा कैसे है कि कुछ ही दशकों के अंतराल में वे लुप्त होने की कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण गौरैया को उनके घर बनाने की जगह से वंचित करना है। मैंने गौरैया को बचाने का यह प्रोजेक्ट लॉकडाउन के दौरान शुरू की। मैं, इनर व्हील क्लब की सदस्य हूं और कोरोना के कारण हम अपने घर से छोटे पैमाने के प्रोजेक्ट कर रहे थे। हमें पर्यावरण बचाओ शीर्षक के तहत एक परियोजना पर काम करना था। इस शीर्षक ने मुझे हमारी गौरैया की याद दिला दी, और मेरे पुराने दोस्तों ने मुझे उनकी आदतें और घर के बारे में शोध करने के लिए मदद की। मेरा पहला कदम अपने आसपास के लोगों को गौरैया का घर देना था। मैंने अपने दोस्तों से गौरैया को वापस लाने के लिए मेरे साथ आने को कहा। चूंकि लॉकडाउन की अवधि चुनौतीपूर्ण थी, हमने सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों की मदद ली, जिससे हमने जागरूकता कार्यक्रम के लिए लोगों को जागृत किया। प्रचार के दौरान मैं निशांत से मिली जिन्होंने ने मुझे संजय सर से मिलाया, जो बिहार के स्पैरोमैन के नाम से जाने जाते हैं। संजय सर ने मुझे विभिन्न प्रकार के घरों और गौरैया के खान-पान के बारे में विस्तार से बताया, और उन्होंने बताया कि गौरैया को धान बहुत पसंद है। हमने गांव से धान मंगवाया, घर की बालकनी में और छत पर बर्ड फीडर लगाया। शुरुआत में हमने अपनी बालकनी में विभिन्न प्रकार के पक्षियों को आते देखा। लेकिन गौरैया को आने में कुछ और समय लगा। मैंने आशा छोड़े बिना धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की, और कई महीनों तक विभिन्न प्रकार के पक्षियों को दाना चुगने के बाद हमारी बालकनी में गौरैया को दाना चुगते देखी। मैं, अपने उत्साह रोक न सकी, और अपना अनुभव सबके साथ साझा किया और गौरैया के बारे में और अधिक अध्ययन करना शुरू की। धीरे-धीरे मेरे यहाँ इनकी संख्या बढ़ने लगी। हमारे बिहार राज्य की राजकीय पक्षी को मेरे बालकनी में आते देख लोगों ने इस काम की सराहना की और खुद भी अपनी बालकनी या छत पर घोंसला, पक्षियों का दाना, धान और पानी रखने लगे। मुझे संजय सर ने यह जानकारी भी दी कि हमारी गौरैया कीड़े मकोड़े भी खाती हैं। मैं अपने घर पर खाद बनाती हूं, और कभी-कभी उनमें छोटे-छोटे मिट्टी के कीड़े हो जाते हैं। मैं उन्हें छत पर खुला छोड़ देता हूं ताकि गौरैया उन्हें खा सकें। गौरैया विभिन्न प्रकार के कीड़ों को खाने के लिए जानी जाती है, जिनमें फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक कीट भी शामिल हैं।

गौरैया की आबादी को संरक्षित करके, किसान रासायनिक कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं, जो महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। मैं उनके नहाने के लिए पानी के बर्तन रखती हूँ, और उन्हें बच्चों की तरह पानी में खेलते हुए देखना अच्छा लगता है। ये बहुत ही चुलबुल होती हैं, लगता है मेरा बचपन लौट आया है। आज हमारे पास 100 से भी ज्यादा गौरैया आती हैं, छत पर और बालकनी में, और हमारे आसपास, जैसे कि हमारे अपार्टमेंट के गेराज में, अपना घर बनाए हुए हैं। पूरे दिन हमारे घर में गौरैया की चहचहाहट से मेरा घर आनंदित रहता है। एक कहावत है कि “सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भुला नहीं कहते हैं।” मुझे उम्मीद है आप सभी इस कार्य को करने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे। हमने जो घर इनसे छीन लिया था वह इसे वापस दे देंगे। आइये, हम एकजुट होकर इन्हें वापस अपने घर बुलायें। फिर देखिये कि घर में इनका नटखटपन कितना सुहावना लगता है। इन्हें घर के लिए शुभ माना जाता है, लक्ष्मी भी कहते है। अब मुझे इनके साथ रह कर, प्रकृति से जुड़ कर, पता चला की मन को शांति मिलती है। (संपर्क-मो -9199365823)

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2 responses to “सपनों को पंख देना मैंने गौरैया से सीखा : आशा प्रसाद”

  1. Sanjay Kumar Avatar
    Sanjay Kumar

    अच्छी पहल

  2. Dr. Ashok Prasad Avatar
    Dr. Ashok Prasad

    नई पीढ़ी को सीखने कीबहुत ही प्रेरणादायक कहानी ।कोई भी काम असंभाब नहीं होता बस मिहनत की जरूरत है ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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