गौरैया की चीं-चीं में खुशी, गुस्सा, डर, प्यार सब है

संजय कुमार / गौरैया झुण्ड में रहती है। शाम के समय पक्षियों के बसेरे में लौटने और सुबह-सुबह घोंसला छोड़ने से पहले, ये गौरैया सामूहिक गायन करती है, जिसे सामान्य भाषा में चहकना कहा जाता है। गौरैया चहचहाहट के  दौरान  तरह तरह की आवाज निकालते हुए एक दूसरे से संवाद करते है। दाना चुगने, आराम…

संजय कुमार / गौरैया झुण्ड में रहती है। शाम के समय पक्षियों के बसेरे में लौटने और सुबह-सुबह घोंसला छोड़ने से पहले, ये गौरैया सामूहिक गायन करती है, जिसे सामान्य भाषा में चहकना कहा जाता है। गौरैया चहचहाहट के  दौरान  तरह तरह की आवाज निकालते हुए एक दूसरे से संवाद करते है। दाना चुगने, आराम करने, खेलने, लड़ने, प्यार/प्रजनन करने, साथी को बुलाने आदि गतिविधियों के दौरान गौरैया के आवाज चहकने में विभिन्नता होती है। झुंड में सुबह और शाम कोलाहल वाली आवाज होती है। सुबह की आवाज  धीरे-धीरे तेज होते हुए, विश्राम स्थल से बाहर जाने का संकेत होता है, जबकि शाम में तेज चहकना फिर धीरे – धीरे शांत होना आराम करने  का  संकेत होता है। गौरैया आठ से दस तरह की आवाज तो निकलती है ही है साथ ही सांकेत का भी प्रयोग करती है।

गौरैया की हर आवाज का अलग – अलग मतलब होता है। नर गौरैया ‘चीप-चीप-चीप’ की आवाज निकलते हुए मादा गौरैया यानि प्रेमिका को रिझाता है। नर गौरैया जब खुश होता है और मादा गौरैया को रिझाना होता है, तो वह अपने पंख को नीचे कर चीप-चीप-चीप’ की सुरीली आवाज निकालते हुए नृत्य करता है। नृत्य मुंडेर, जमीन, तार, पेड़ यानि जहाँ मौका या  जगह मिल जाए नृत्य करने से नहीं चुकता है। नृत्य के मामले में मादा गौरैया साथ नहीं देती है सिर्फ देखती है, गाती भी नहीं है। लेकिन सृजन के दौरान नृत्य करते नर को चोंच से मारते हुए प्यार की सहमति प्रदान करती है। जोड़ा बनाने के दौरान मादा गौरैया तेज आवाज वाले नर गौरैया को चुनती है। नर गौरैया इसमें तेज आवाज जोड़ता है तो संकेत है दूसरे नर गौरैया के लिए, की  यह मेरा इलाका है। हालाँकि सुबह की चीप-चीप असल में सूरज को प्रणाम है।

एक दूसरे को बुलाने के लिए गौरैया की आवाज में साफ-साफ संकेत होता है, उसकी आवाज सुन कर गौरैया (नर/मादा) आती है। नर की तुलना में मादा की आवाज मधिम होती है। नर गौरैया जब घोंसला बनाता या उस पर अपना अधिकार जमा रहा होता है तो आवाज तेज और लगातार ख़ुशीमय होती है, जो मादा गौरैया को आकर्षित करने के लिए होती है। अगर बुलाने के क्रम में मादा गौरैया नहीं आती है तो वह तनाव में आकर तेज आवाज लगातार निकालता है । मादा के आते ही उसके सुर बदल जाते हैं । प्यार का इजहार करते लय में संगीतमय आवाज निकलते हुए, नृत्य करते हुए, मादा गौरैया के आगे-पीछे करता है। गुस्से या चिढ़ में नर गौरैया की आवाज आक्रामक भावना को लिए होती है।

खतरे को देखते हुए पशु-पक्षी अलार्म कॉल भी करते हैं गौरैया खतरे को भाप चिर्र या ‘चर्र-चर्र-चर्र’ की आवाज निकालती है यह ‘अलार्म कॉल’ शिकरा, कौवा, सांप,बिल्ली आदि देख सभी साथियों को सचेत करती है। प्यार-मोहब्बत के दौरान धीरे – धीरे ‘चिल-चिल’ करते हैं, खासकर घोंसले में नर-मादा गौरैया आपस में संवाद हैं, बच्चे को पुचकारते हैं। दाना-पानी देख खुशी का इजहार करने के लिए गौरैया ‘च्वीट-च्वीट’ की  मधुर आवाज निकालती है। और ,झुण्ड को बुलाती भी है ।

गौरैया जब गुस्से में और आपस में झगड़ते हो तो ‘चीक-चीक’ की  आवाज करती है। ‘चीं-चीं-चीं’ की आवाज बहुत ही सामान्य है, जिसे बच्चा गौरैया भूख लगने पर करता है । पंख को नीचे कर फड़फड़ाकर, मुँह खोलकर तेज आवाज लगाते घोंसला और बाहर में दाना चुग रहे माँ-पापा गौरैया के आगे पीछे करता है । गौरैया किसानों को मौसम की जानकारी भी देती है।  धीमी आवाज में  ‘चुर्र-चुर्र’ कर बारिश से पहले मौसम की खबर की सूचना देता है। किसान इससे बारिश होने का अंदाजा लगाते हैं।

नर गौरैया 90 प्रतिशत प्रेम गीत गता है। मादा गौरैया कम आवाज निकालती है। बच्चों को खतरा हो या नर गौरैया से संवाद करनी हो, तभी बोलती है। वहीँ नर-मादा बच्चे घोंसले में बच्चे दिनभर चीं-चीं करते हैं। जैसे ही माँ-पिता गौरैया आहार लेकर आते हैं तब चोंच खोल कर तेज आवाज करने लगते हैं। द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स में डॉ सलीम अली लिखते हैं, “गौरैया की चीं-चीं नीरस लग सकती है, पर ध्यान दें तो ये खुशी, गुस्सा, डर, प्यार– सब बोलती है। गौरैया सिर्फ अपने फायदे के लिए आवाज नहीं निकालती बल्कि गौरैया की  चहचहाहट से इन्सान को मानसिक शांति भी मिलती है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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