खेतों में जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से गौरैया सहित अन्य पक्षियों को खतरा  

संजय कुमार / पैदावार को बढ़ाने के उद्देश्य से खेतों में जहरीले कीटनाशकों एवं उर्वरकों के प्रयोग से पक्षियों की मौत हो रही है। इसमें नन्ही गौरैया को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। गौरैय की कमी के पीछे कीटनाशक भी एक बड़ा कारण है।   जहरीले कीटनाशकों एवं उर्वरकों के प्रयोग से पक्षियों की मौत की…

संजय कुमार / पैदावार को बढ़ाने के उद्देश्य से खेतों में जहरीले कीटनाशकों एवं उर्वरकों के प्रयोग से पक्षियों की मौत हो रही है। इसमें नन्ही गौरैया को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। गौरैय की कमी के पीछे कीटनाशक भी एक बड़ा कारण है।   जहरीले कीटनाशकों एवं उर्वरकों के प्रयोग से पक्षियों की मौत की खबर का खुलासा शोध रिपोर्ट से हुआ है।

लंदन से आयी एक अध्ययन रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पैदावार बढ़ाने के लिए गहन खेती करने से पक्षियों की संख्या में गिरावट आ रही है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यूरोप में 55 करोड़ पक्षियों की संख्या कम होने के पीछे का कारण कीटनाशकों और उर्वरकों का अधिक प्रयोग किया जाना है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि खेती में अधिक मात्रा में उर्वरकों के इस्तेमाल से ब्रिटेन में पक्षियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। इस अध्ययन के लिए 28 देशों के हजारों नागरिकों से डाटा एकत्रित किये गये। 50 से अधिक शोधकर्ताओं की टीम ने इसमें सहयोग किया। अध्ययन में पाया गया कि महाद्वीप में पक्षियों की आबादी में गिरावट के लिए गहन कृषि जिम्मेदार है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि 1980 के बाद से पूरे महाद्वीप में सभी प्रकार के जंगली पक्षियों की संख्या में एक चौथाई से अधिक की गिरावट आयी है, वही, कुछ प्रजातियों में यह गिरावट आधे से अधिक पायी गयी है। इन पक्षियों में  स्विफ्ट, पीली खंजन, चित्तीदार मक्खीमार आदि शामिल हैं।

करोड़ों पक्षियों की मौत के पीछे कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग को लेकर शोध रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। लेकिन, सच है। जहरीले कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग ने जीव-जंतुओं को काफी नुकसान पहुंचाया है। इन्सान के आसपास रहने वाली किसान दोस्त गौरैया के संख्या में कमी की बात होती है, तो उसके कारणों में कीटनाशकों और उर्वरकों को दोषी माना जाता है। स्टेट ऑफ़  इंडियंस बर्ड्स 2020, रेंज,  ट्रेंड्स  और कंजर्वेशन स्टेट्स की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि गौरैया के पलायन या उसकी विलुप्ति का एक बड़ा कारण खेतों में कीटनाशकों और उर्वरकों का अधिक प्रयोग है। देखा जाए, तो केवल गौरैया या फिर स्विपट, पीले वैगेटेल और चित्तीदार फ्लैकेचर ही नहीं, बल्कि कई पक्षी जो खेतों के इर्द-गिर्द आहार तलाशते हैं, उनके समक्ष भी संकट है।

पैदावार को बढ़ाने के लिए दुनिया भर के खेतों में जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना इन्सानों के लिए तो खतरनाक है ही, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। मधुमक्खियों के विनाश के लिए दोषी ठहराये जाने वाले न्यूरोटॉकसिक कीटनाशक अन्य पशु-पक्षियों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान के जॉन मार्क बॉनमैटिन के मुताबिक, ‘हम प्राकृतिक खेती और पर्यावरण की उत्पादकता के लिए खतरा देख रहे हैं।’ खाद्य उत्पादन की रक्षा करने से दूर, तंत्रिका को लक्षित करनेवाले कीटनाशक जिन्हें नियोनिकोटिनॉइड भी कहा जाता है, वे परागण को खतरे में डाल रहे हैं। कीटनाशक के तौर पर नियोनिक्स का व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है, जिसका पक्षियों पर त्वरित और घातक या दीर्घकालिक कुप्रभाव हो सकता है। इसके संपर्क में आने से कुछ प्रजातियों के सूंघने की क्षमता बिगड़ सकती है और यह याददाश्त पर भी असर कर सकता है। इसके अलावा प्रसव पर अंकुश लगा सकता है, चारा खोजने की क्षमता कम कर सकता है, उड़ने में दिक्कत पहुंचा सकता है और बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।

शोध कहता है कि पौधों द्वारा इन कीटनाशकों को सोख लेने के कारण जीव-जंतुओं खासकर पक्षियों को भी नुकसान पहुंच रहा है, क्योंकि वह पानी और मिट्टी में भी मिल जाता है। सबसे अधिक प्रभावित प्रजातियों में केंचुए हैं, जिनका काम मिट्टी को उपजाऊ बनाना होता है। इसके बाद मधुमक्खियों और तितलियों की बारी आती है। डीडीटी से दस हजार गुणा जहरीला नियोनिक्स मिट्टी में एक हजार दिनों तक कायम रह सकता है और पेड़ों में एक साल से ज्यादा तक रह सकता है। इसी से इसकी भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

वहीं, तापमान से भी पक्षियों की संख्या घटी है। पिछले दिनों खबर आयी थी कि बढ़ती गर्मी से मेढकों की आवाज में परिवर्तन देखा जा रहा है। अध्ययन के प्रमुख वरिष्ठ वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रेगोरी ने कहा है कि गहन खेती का असर एक धूम्रपान से होने वाले प्रभाव से अधिक है। वहीं तापमान में वृद्धि से भी पक्षियों की संख्या में कमी हो गयी है।

जानकारों की माने तो भारत जैसे देश में भी अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग हो रहा है और कुछ उपयोगी कीट भी मारे जाते हैं, जिससे नाइट्रोजन फिक्सेशन में दिक्कत होती है और पैदावार कम होता है। ये कीटनाशक स्थानीय एवं प्रवासी पक्षियों का भोजन भी बन जाते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है।

वैसे, भारत सरकार, पंजीकरण समिति की टिप्पणियों के साथ-साथ विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर विचार करने के बाद 14 अक्टूबर 2016 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें 66 कीटनाशकों में से 12 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, छह कीटनाशकों को वर्ष 2020 तक चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की सिफारिश की गयी थी। एक कीटनाशक (एंडोसल्फान) की समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन होने के कारण नहीं की गयी थी, लेकिन बाद में इसे न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था। एक कीटनाशक फेनिट्रोथियोन को कृषि में उपयोग के लिए पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था। सरकार द्वारा समय-समय पर नये अध्ययन, रिपोर्ट, संदर्भ, सूचना प्राप्त होने पर, पंजीकृत कीटनाशकों की सुरक्षा और प्रभावकारिता के संबंध में समीक्षा की जाती है। विशेषज्ञ समितियों का गठन कर समीक्षा की जाती है। ऐसी विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आधार पर और पंजीकरण समिति के साथ उचित परामर्श के बाद कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने अब तक देश में आयात, निर्माण या उपयोग के लिए 46 कीटनाशकों और चार कीटनाशक यौगिकों पर प्रतिबंध लगा दिया है या उन्हें चरणबद्ध तरीके से हटा दिया है। इसके अलावा, आठ कीटनाशकों के पंजीकरण को वापस ले लिया गया है और नौ कीटनाशकों को प्रतिबंधित उपयोग के तहत रखा गया है।

सरकार जैव कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है, जो आमतौर पर रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं। इसके लिए विभिन्न फसलों पर अनुमोदित कीटनाशकों को पौध संरक्षण, संगरोध एवं भंडारण निदेशालय की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक डोमेन में प्रदर्शित किया जाता है। तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 03 फरवरी 2023 राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में ये जानकारी दी थी।  

ज्यादा फसल उत्पादन के लालच में करोड़ों पक्षियों के मारे जाने को हल्के में नहीं लेना होगा। यह आंकड़ा आज यूरोप का है, कल पूरी दुनिया का हो सकता है। जो इकोसिस्टम के लिए खतरनाक है। फसलों में कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग जैव विविधता को कम करता है, मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण की समस्याओं को बढ़ाता है। इसने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ायी है। वे आलोचना के लिए आगे आये हैं। ऐसे में पर्यावरणविद और शोधकर्ताओं का कहना है कि नियामक एजेंसियों को कड़े नियम बनाने होंगे, जिससे इसकी बिक्री को कम किया जा सके। साथ ही कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग को कम करने या विकल्प तलाशने के लिए किसानों को जागरूक करने की जरूरत है।(संदर्भ – Rigal et al. 2023, PNAS: Farmland practices are driving bird population decline across EuropeRSPB State of UK Birds 2023State of India’s Birds 2020 ReportBonmatin et al. 2015, Environmental Science and Pollution Research – Neonicotinoids कृषि मंत्रालय, भारत सरकार – 03.02.2023 राज्यसभा उत्तर)

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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