संजय कुमार / विश्वभर में घरेलू गौरैया पायी जाती है। घरेलू गौरैया यूरोप के यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, नीदरलैंड्स और स्कैंडिनेवियाई सहित लगभग हर देश में पाई जाती है। एशिया में यह बहुत व्यापक रूप से फैली हुई है। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, चीन, भूटान, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के कई देशों में यह आसानी से दिख जाती है। जबकि अफ्रीका में यह मुख्य रूप से उत्तरी और दक्षिणी शहरों जैसे मिस्र, मोरक्को’ अफ्रीका में गौरैया सहारा के उत्तर में है, पर दक्षिण अफ्रीका में भी शहरों में है। कूल ग्रीन साइंस न्यूज़लेटर के अनुसार उत्तरी अमेरिका में गौरैया मूल रूप से नहीं थी, लेकिन इसे इंसानों द्वारा लाया गया, उत्तरी अमेरिका में गौरैयों का पहला परिचय 1851 या 1852 में न्यूयॉर्क शहर में हुआ था, हालांकि छोड़े गए 8 जोड़े असफल रहे। इसने पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में गौरैयों के परिचय की एक लहर को जन्म दिया। कॉर्नेल लैब ऑफ ऑर्निथोलॉजी के अनुसार, उत्तरी अमेरिका में घरेलू गौरैयों की संख्या 1966 से 84 प्रतिशत कम हो गई है। फिलाडेल्फिया, वह शहर जहां इंचवर्म को नियंत्रित करने के लिए गौरैयों को लाया गया था, वहां ये पक्षी लगभग गायब हो गए हैं। आज यह अमेरिका के कई इलाकों और कनाडा में पाई जाती है। वहीँ, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी यह इंसानों द्वारा लाई गई। दक्षिण अमेरिका के अर्जेंटीना, चिली, ब्राजील के शहरों में काफी है।
कुल मिलाकर कह सकते हैं गौरैया लगभग पूरी दुनिया के मानव-आबादी वाले क्षेत्रों में मिल जाती है, खासकर जहाँ खाने के स्रोत, घोंसला बनाने की जगह और जलवायु बेहतर हो वहां दिखती है। घरेलू गौरैया दुनिया के कई हिस्सों में आम दिखने वाली छोटी सी चिड़िया है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसके घटते आंकड़ों के कारण कई देशों में इसके संरक्षण पर पहल जारी है। विदेशों में इसका संरक्षण मुख्य रूप से शहरी पारिस्थितिकी, आवास संरक्षण और नागरिक विज्ञान के जरिए किया जाता है।
भारत सहित विश्वभर में घरेलू गौरैया की घटती संख्या के मद्देनजर उसके संरक्षण की पहल 20 मार्च 2010 को विश्व गौरैया दिवस से शुरू हुई। जहाँ तक विदेशों में गौरैया संरक्षण का सवाल है तो पहल जारी है। विदेशों में घरेलू गौरैया का संरक्षण मुख्य रूप से शहरी जैव विविधता को बचाने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। कई देशों में यह देखा गया कि आधुनिक शहरीकरण, कंक्रीट के भवन, कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग और भोजन की कमी अदि कारण से गौरैया की संख्या घटने लगी। इसके बाद अलग-अलग स्तर पर संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए,जो आज भी जारी है।
यूरोप और विशेषकर यूनाइटेड किंगडम में सबसे संगठित प्रयास देखने को मिलते हैं। वहाँ रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स ने गौरैया के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाया। इसमें लोगों को अपने घरों में कृत्रिम घोंसला लगाने, बगीचों में झाड़ियाँ-देशी पौधे लगाने, और पक्षियों के लिए दाना-पानी उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित किया जाता है। साथ ही, शहरी निर्माण में पक्षियों के पक्षियों के अनुकूल आर्किटेक्चर को भी बढ़ावा दिया गया। वैश्विक स्तर पर बर्ड लाइफ़ इंटरनेशनल और उसके साझेदार संगठनों ने गौरैया सहित आम पक्षियों की निगरानी के लिए नागरिक विज्ञान प्रोग्राम भी शुरू किए गये। इनमें पक्षियों की गिनती, घोंसलों का रिकॉर्ड आदि डेटा इकट्ठा किया जाने लगा।
नीदरलैंड्स, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों में शहरों को गौरैया-अनुकूल क्षेत्र बनाने की कोशिश की गई है, जहाँ पार्कों, हरित क्षेत्रों और पुराने भवनों को संरक्षित रखने को पहल हुई। कुल मिलाकर विदेशों में गौरैया संरक्षण का तरीका बहुत व्यावहारिक है, आवास सुधार, लोगों की भागीदारी, और पर्यावरणीय बदलावों को संतुलित करना। इसका उद्देश्य सिर्फ गौरैया को बचाना ही नहीं, बल्कि पूरे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से प्राकृतिक और पक्षी-हितैषी बनाना है।
जहाँ तक संख्या घटने की बात है यूरोप में, खासकर यूनाइटेड किंगडम में, गौरैया की संख्या 1970 के बाद तेजी से घटी। इसके पीछे शहरीकरण, पुराने घरों की जगह आधुनिक इमारतें, और कीटों की कमी जैसे कारण सामने आये। यहाँ रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स जैसे संगठन ने बड़े पैमाने पर संरक्षण अभियान चलाया। यूरोप के अन्य देशों में भी इसी तरह की पहल हुई है। बर्ड लाइफ़ इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ने गौरैया और अन्य सामान्य पक्षियों की निगरानी के लिए डेटा संग्रह और संरक्षण योजनाएँ विकसित की हैं। कई देशों में नागरिक विज्ञान प्रोजेक्ट चलाए जाते हैं, जहाँ आम लोग पक्षियों की गिनती और उनके व्यवहार का रिकॉर्ड रखते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को जनसंख्या रुझान समझने में मदद मिलती है। कूल ग्रीन साइंस न्यूज़लेटर के अनुसार घरेलू गौरैयों की संख्या में गिरावट की पहली रिपोर्ट वास्तव में 1920 के दशक में दर्ज की गई थी, जब घोड़ों की जगह कारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ था। गौरैया शहरों में बिखरे हुए अनाज की भारी मात्रा पर दावत करती थीं। जब भोजन का यह स्रोत समाप्त हो गया, तो गौरैयों की आबादी कम हो गई।
एशिया के कुछ देशों, जैसे भारत, नेपाल और बांग्लादेश में भी गौरैया संरक्षण को बढ़ावा मिला है। हाँ, कुछ देशों और क्षेत्रों में घरेलू गौरैया की संख्या में गिरावट को लेकर अनुमानित आँकड़े उपलब्ध हैं, हालांकि यह हर जगह पूरी तरह एक जैसे या सटीक नहीं हैं। सबसे ज्यादा डेटा यूनाइटेड किंगडम और यूरोप से मिलता है। यूके में 1970 के आसपास गौरैया बहुत आम थी, लेकिन वहाँ के राष्ट्रीय पक्षी सर्वेक्षणों के अनुसार 1970 के बाद से शहरी क्षेत्रों में इसकी संख्या लगभग 60% से 70% तक घट गई। यूरोप के बड़े हिस्से में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखी गई है। कई पश्चिमी यूरोपीय देशों में गौरैया की आबादी में लगभग 30% से 50% तक गिरावट दर्ज की गई है, खासकर 1980–2000 के बीच के समय में। यह डेटा बर्ड लाइफ़ इंटरनेशनल और उसके साझेदार नेटवर्क के पक्षी निगरानी कार्यक्रम से मिलता है। खासकर यूरोप और यूके में गौरैया की संख्या आम तौर पर 30% से 70% तक कम हुई।
दिलचस्प बात यह है कि गिरावट हर जगह समान नहीं है। कुछ शहरों में जैसे नीदरलैंड्स, जर्मनी और बेल्जियम में शहरी गौरैया की कमी अधिक गंभीर रही, जबकि कुछ ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में गिरावट धीमी रही या स्थिर भी हुई। बहरहाल, विदेशों में गौरैया का फुदकना सकून देने वाला है। पक्षियों के प्रति विदेशो में संवेदना का जो ग्राफ दिखता है वह काबिले तारीफ है। तभी तो सड़क किनारे बैठे या टहल रहे लोगों के आसपास गौरैया की मौजूदगी दिखती है।(संदर्भ-RSPB, BirdLife International, State of India’s Birds 2023, Cornell Lab of Ornithology) ।















