पापा गौरैया जिंदाबाद : घोंसला बनाने से उड़ान सिखाने तक

संजय कुमार / गौरैया का जीवन भी इन्सान की तरह है। पापा और माँ गौरैया की भूमिका इन्सान की तरह होता है। वे घर-परिवार, बच्चों का लालन-पालन, सुरक्षा सहित हर दायित्व का निर्वहन करते हैं। नर और मादा गौरैया इन्सान की तरह ही पहले जोड़ा बनाते हैं। जोड़ा बनते ही हर वक्त साथ-साथ रहते है।…

संजय कुमार / गौरैया का जीवन भी इन्सान की तरह है। पापा और माँ गौरैया की भूमिका इन्सान की तरह होता है। वे घर-परिवार, बच्चों का लालन-पालन, सुरक्षा सहित हर दायित्व का निर्वहन करते हैं। नर और मादा गौरैया इन्सान की तरह ही पहले जोड़ा बनाते हैं। जोड़ा बनते ही हर वक्त साथ-साथ रहते है। इस बीच नृत्य संगीत का दौर चलता है एक दूसरे को समझते है। भरोसा पूरा होने पर प्रेम और सृजन का दौर शुरू होता है।

अंडे देने के पहले नर गौरैया घोंसला बनाने में जुट जाता है। पहले जगह देखता है। नर गौरैया छेद, दरार, पंखे का डिब्बा आदि की जाँच करता है। पसंद आ जाए तो चहक-चहक कर चींचीं आवाज से मादा को बुलाता है। कुछ दिन दोनों घोंसला के अंदर-बाहर करते हैं और ज्यदातर समय पास में ही गुजारते हैं। अगर मादा गौरैया कही चली जाती है तो घोंसला के पास बैठा नर गौरैया आवाज देकर मादा को बुलाता रहता हैं। मादा के आते ही चहक उठता है। घोंसला का अच्छी तरह से मुआयना करे के बाद पहला तिनका नर गौरैया रखता है। सूखी घास, कागज, धागे, पुआल, खर-पतवार,पंख, रूई आदि बिछाकर नरम घोंसला बनाने में मादा गौरैया की भूमिका अहम् होती है है। भले ही घोंसला बनाने का काम नर शुरू करता है लेकिन मादा भी साथ देती है।

घोंसला तैयार होते है मादा गौरैया अंडे देती है। फिर अंडे सेने का काम शुरू होता है। अगर दाना- पानी के लिए मादा बाहर जाती है तो, नर गौरैया पिता की भूमिका में आता है और अंडे सेने लगता है साथ की सुरक्षा के लिए घोंसला के अंदर जाकर रहता है या फिर घोंसले के आसपास बैठ कर सुरक्षा करता है। नर गौरैया 5-10 मीटर तक दूसरे नर गौरैया को नहीं आने देता। सीना फुलाकर, आँख दिखाते हुए आक्रमक भूमिका में रहता है। घोंसला के अंदर अंडे / बच्चे की सुरक्षा पर भारत के पक्षी मैन डॉ सलीम अली का प्रसंग अहम् है। फॉल ऑफ़ स्पैरो में वे लिखते हैं। खेतवाड़ी अस्तबल में गौरैया के शिकार  की घटना  मुख्य  विषय थी। दीवार  में  लकड़ी  की खूंटियाँ ठोकी गई थी ताकि अश्व साज उन पर टांगे जा सके उनमें से एक खूंटी निकल आई थी इसलिए गौरैया को घोंसला बनाने के लिए एक सुराख उपलब्ध था। “1906/07 जब मादा गौरैया अंदर सुराख़ में घोंसले के अंदर बैठी थी तब एक नर गौरैया सुराग के पास कील पर बैठा था। मैंने अस्तबल में खड़ी गाड़ी के पीछे से उसे मारा। थोडी देर में उस मादा गौरैया ने एक अन्य नर गौरैया को बुला लिया  और  नर  गौरैया पहरेदार की तरह कील  पर बैठा। मैंने उसे भी  मार दिया। थोड़ी देर में उस मादा  गौरैया के  पास  एक  और  नर गौरैया  था, जो फिर पहरे पर बैठ गया ।  मैंने  उसको  भी  मारा। अगले सात  दिनों  में  मैंने  उस  स्थान पर आठ  नर  गौरैयों को मार गिराया, और प्रत्येक  बार  उस मादा गौरैया को एक नर गौरैया मिल जाता। मानो  नर गौरैया उसके  लिए हमेशा तैयार रहते थे, जो मृत पति गौरैया का स्थान  ग्रहण  कर  लेते  थे।“ यह प्रसंग साफ़ करता है कि पिता गौरैया को कुछ हो जाता है तो मादा गौरैया सुरक्षा के लिए झुण्ड से दूसरे नर गौरैया को बुला लेती है। शायद इस लिए कि बच्चों को अनाथ का एह्सास न हो।

बच्चा गौरैया के प्रति पापा गौरैया की जिम्मेदारी बढती जाती है। मादा सुबह दाना चुगने जाती है, तब नर अंडे सेता है। पंख फैलाकर अंडे गर्म रखता है। ज्यदातर रात में मादा ही सेती है, नर बाहर पहरा देता है। बिल्ली, सांप अंडे खाने आते हैं इसलिए नर हमेशा पहरा देता रहता है। बच्चों के जन्म के बाद 14 दिन तक उड़ नहीं सकते। पापा गौरैया का काम बढ़ जाता है। पापा गौरैया कीड़ा-मकोड़ा, लार्वा बच्चा गौरैया को लाकर खिलाता है। बीच-बीच में माँ गौरैया भी आहार लाने जाती है। घोंसला में पड़े बीट को पापा गौरैया समय-समय पर चोंच से उठाकर कर दूर फेंक आता है । घोंसला साफ रहे और बच्चों को बीमारी नहीं हो इसका ख्याल मादा भी करती है। सुरक्षा की जिम्मेदारी पापा पर होता है। कौवा, शिकरा, बिल्ली,सांप की आहाट को भांप पापा गौरैया ‘चर्र-चर्र’ की आवाज से अलार्म देता है। अगर हमला होता है तो शोर मचाते हुए लड़ने की कोशिश करता है। मादा बच्चों के ऊपर पंख फैला देती है।  

14 दिन बाद बच्चे जब बाहर झांकते हैं, तब पापा गौरैया उनके सामने उड़-उड़ कर उड़ना सिखाता है। माँ पीछे से हौसला देती है। जब बच्चा गौरैया पहली बार घोंसला से निकल उड़ता है और कही ऊँचे पर बैठ जाता है, फिर उड़ता है और जमीन पर गिरने लगता है तब पापा उसे नीचे से सहारा देकर उड़ाते हैं । एक बार जहाँ बच्चे ने उड़ान भरी फिर आसमान उसका हो जाता है। अंडे से लेकर बच्चों के पालन के दौरान मादा के साथ हादसा हो जाए तो पापा गौरैया बच्चों को पाल लेता है ।

माँ गौरैया जन्म देती है, पापा गौरैया ‘इंसान’ बनाता है। घोंसले से उड़ान तक, पापा की ड्यूटी सुपर डैड की होती है। घोंसला से बच्चा गौरैया जब बाहर निकलता है तब पापा गौरैया के आगे पीछे करता है । पंख नीचे कर फडफडाते हुए चीची की आवाज निकालते खाना मांगता है। पापा -माँ दाना चुगते हुए उसे दाना चुगना सिखाते हैं। साथ ही अपनी  सुरक्षा करना भी खतरा को देख कैसे सुरक्षित जगह फ़ुर से उड़ कर जाना है यह भी सिखाते हैं, हालाँकि बच्चा गौरैया,बचपन में दुनियादारी से दूर रहता है । धीरे-धीरे सब सिख लेता है। दुनियादारी सिखाने में पापा गौरैया की भूमिका अहम् होती है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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