संजय कुमार / गौरैया पर्यावरण की ‘रीढ़ की हड्डी’ है। ये न होती तो इंसान का जीना मुश्किल हो जाता। ‘परि’ और ‘आवरण’ के योग से बना पर्यावरण, यानि ‘परि’ -‘चारों ओर’ (आसपास) और ‘आवरण’ – ‘घेरा’ या ‘ढकने वाला आवरण’। सरल शब्दों में कहे तो हमारे चारों ओर का वह घेरा जो हमें और पृथ्वी के सभी जीवों को ढके हुए है, पर्यावरण कहलाता है, और इसमें गौरैया भी रहती है।
पर्यावरण के लिए जितना अहम् अन्य जीव जंतु है उतना ही गौरैया भी पर्यावरण के लिए बहुत मायने रखती है ।
किसानों के लिए फ्री कीटनाशकएक है गौरैया का परिवार। फसलों-सब्जियों पर लगने वाले कीड़ों को खाती है। बच्चों को 95 प्रतिशत कीड़े खिलाती है। जिसमें कैटरपिलर, टिड्डे, एफिड्स, मच्छर के लार्वा आदि शामिल है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार से एक जोड़ा गौरैया साल भर में 2.5 लाख कीड़े खाता है। 1958 में माओ ने गौरैया को ‘फसल का दुश्मन’ बताकर मरवा दिया। नतीजा? टिड्डों ने पूरी फसल चट कर दी, 2 करोड़ लोग अकाल में मरे। अगर गौरैया नहीं तो कीटनाशक पर खर्च बढेगा । फसल बर्बाद होगी । मच्छर बढ़ेंगे तो बीमारियाँ फैलेंगी ।

गौरैया बीज-प्रसारक है। गौरैया फल, बीज खाती है और बीट के साथ दूर-दूर गिराती है। घास, जंगली पौधे, झाड़ियां–इनके बीज फैलाकर हरियाली बढ़ाती है। शहरों में पीपल-बरगद के बीज छतों-दीवारों तक पहुंचाने में इसका हाथ है।
इकोसिस्टम में गौरैया शिकरा, बाज, उल्लू, बिल्ली, सांप आदि का आहार है । ये सब गौरैया को खाकर जिंदा हैं। गौरैया गायब हुई तो इन शिकारी जीव -जंतु के सामने जीवन का संकट खड़ा हो जायेगा, फिर चूहे-सांप बढ़ेंगे। पूरी इकोसिस्टम बिगड़ जाएगी।
गौरैया मांस नहीं खाती लेकिन सर्वाहारी पक्षी है। घर का गिरा अनाज, रोटी के टुकड़े, कीड़े-मकोड़े – सब साफ कर देती है। शहरों में जैविक कचरा कम करने में मदद करती है। गौरैया को बायो इंडिकेटर भी कहते हैं। गौरैया है तो मानिये हवा साफ है, कीटनाशक कम है, हरियाली है,पर्यावरण अनुकूल है। यूके में गौरैया 60 प्रतिशत घटी, तो सरकार ने माना कि शहरी पर्यावरण खराब हो रहा है। गौरैया सिर्फ चिड़िया नहीं, पर्यावरण की चिकित्सक, किसान, माली इंसान की दोस्त है। इसे बचाना मतलब खुद को बचाना है। तो आइये गौरैया को बचाएं,पर्यावरण को बचाएं ।
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