*युगल किशोर राही/ जब हवा जहर बन जाए, नदियां प्यास बुझाने के बजाय बीमारियां बांटने लगें और जून की धूप शरीर ही नहीं, जीवन को भी झुलसाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि प्रकृति नाराज है। विडंबना यह है कि जिस पर्यावरण दिवस को हमें आत्ममंथन का अवसर बनाना चाहिए था, वह कई बार केवल औपचारिक भाषणों और पौधरोपण की तस्वीरों तक सिमटकर रह जाता है। हर साल 5 जून को पर्यावरण संरक्षण की बातें, संगोष्ठियां और वादे तैरने लगते हैं, लेकिन असलियत में उन पर अमल शायद ही होता है। ऐसे में, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 5 जून सिर्फ एक तारीख बनकर रह गया है?
आज दुनिया का एक बड़ा हिस्सा युद्ध की विभीषिका झेल रहा है। मिसाइलों के धुएं, बारूद के विस्फोट और रासायनिक हथियारों ने न केवल इंसानी बस्तियों को उजाड़ा है, बल्कि सदियों पुराने जंगलों,
नदियों और बेजुबान जीव-जंतुओं के
अस्तित्व को भी संकट में डाल दिया है। युद्ध की यह आग सीधे तौर पर हमारी जलवायु को प्रभावित कर रही है। आज हमें यह समझने की जरूरत है कि पर्यावरण के नष्ट होने से जो सुरक्षा कवच हमारा छिन रहा है, उसके बिना हमारी आने वाली पीढ़ी का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा। आज हमारी धरती धधक रही है। देश का आधा से ज्यादा हिस्सा हर साल गर्मी के पिछले कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ रहा है। नदियां सूखकर नालों में तब्दील हो रही हैं। पहाड़ धसक रहे हैं, और मौसम का चक्र भी पूरी तरह से बिगड़ चुका है। दूसरे देशों का हाल भी इससे अलग नहीं है-
कहीं बेमौसम बाढ़ तबाही मचा रही है, तो कहीं सूखा इंसानी वजूद को निगल रहा है। यह प्रकृति का कोई सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि उसकी तरफ से मानवता को दी जा रही आखिरी चेतावनी है। नष्ट होते पेड़-
पौधे और सिमटते जंगल इस बात के प्रमाण हैं कि हमने विकास की अंधी दौड़ में विनाश का रास्ता चुन लिया है।
यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित भविष्य देना चाहते हैं, तो हमें आज ही चार स्तरों पर काम करना होगा। केवल विलासिता नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास को अपनी आदत बनाना होगा। जीवन के हर विशेष अवसर (जैसे जन्मदिन या वर्षगांठ) पर कम-से-कम एक पौधा लगाना और उसे पेड़ बनने तक पालना अनिवार्य करना होगा। पानी की हर बूंद को बचाना और सिंगल-यूज प्लास्टिक को अपने जीवन से पूरी तरह बाहर करना अनिवार्य है। जब तक हम सब एकजुट होकर प्रकृति की ढाल बनकर खड़े नहीं होंगे, पर्यावरण को नुकसान होता रहेगा। फिर, पछताने के लिए हमारे पास समय भी नहीं बचेगा। (साभार-दैनिक हिंदुस्तान नई दिल्ली ,5-5-26)
*टिप्पणीकार
एकदिवसीय आयोजन से क्या होगा
*युगल किशोर राही/ जब हवा जहर बन जाए, नदियां प्यास बुझाने के बजाय बीमारियां बांटने लगें और जून की धूप शरीर ही नहीं, जीवन को भी झुलसाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि प्रकृति नाराज है। विडंबना यह है कि जिस पर्यावरण दिवस को हमें आत्ममंथन का अवसर बनाना चाहिए था, वह कई बार केवल…

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संयोजक

हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स
Hamari Gauraiya and Environment Warriors
*सम्पादक -डॉ .लीना
*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य
विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प
20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।
घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।
प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“
हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में
यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।
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सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन
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