संजय कुमार / घर आँगन में चहकने-फुदकने वाली नन्ही चिड़ियाँ को हिंदी में गौरैया तो अंग्रेजी में स्पैरो और उर्दू में चिडियां से पुकारा जाता है यों तो भारत में लोकल भाषा/बोलियों में इसके कई नाम है। सिंधी में झिरकी, भोजपुरी में चिरई, बुन्देली में चिरैया कहते हैं। कई राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। मसलन- जम्मू और कश्मीर – चेर, पंजाब – चिड़ी,पश्चिम बंगाल– चरूई, ओडिशा(उड़ीसा)- घरचटिया,गुजरात– चकली, महाराष्ट्र– चिमानी, कर्नाटक– गुब्बाच्ची, आन्ध्र प्रदेश-पिच्चूका, केरल, तमिलनाडु– कूरूवी, लद्दाख -‘चिपा ग्याओ’ आदि नाम से पुकारा जाता हैं। गौरैया को कहीं पर गौरा और चटक भी बुलाया जाता हैं।
सवाल स्पैरो या गौरैया का तो स्पैरो शब्द का अर्थ है “छोटी चिड़िया” या “गौरैया” है। यह शब्द मध्य अंग्रेजी में 13वीं शताब्दी में प्रयोग में आया और तब से यह शब्द अंग्रेजी भाषा में प्रयोग में आ रहा है। माना जा सकता है कि स्पैरो (Sparrow) शब्द की उत्पत्ति पुरानी अंग्रेजी भाषा से हुई है। यह शब्द पुरानी अंग्रेजी में “स्पेरव” (Sperw) है। स्पैरो शब्द का मूल स्रोत प्रोटो-जर्मनिक भाषा है, जिसमें यह शब्द “स्पेरव” (Sperw) के रूप में आया। यह शब्द आगे प्रोटो-इंडो-यूरोपीयन भाषा से आया है, जिसमें यह शब्द “स्पेर-” (Sper-) के रूप में आया है। स्पैरो शब्द के विकास को देखें तो साफ़ है – प्रोटो-इंडो-यूरोपीयन: स्पेर- (Sper-), प्रोटो-जर्मनिक: स्पेरव (Sperw), पुरानी अंग्रेजी: स्पेरव (Sperw) या स्पेरव (Sparw) और मध्य अंग्रेजी: स्पैरो (Sparrow) से तस्वीर साफ़ होती है कि नन्ही चिड़ियाँ का नाम स्पैरो कैसे पड़ा।
हिंदी शब्द गौरैया की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से भी होती दिखती है। संस्कृत में गौरैया को “गौर” या “गौरिका” कहा जाता था। हिंदी भाषा में गौरैया शब्द का उपयोग मध्यकाल में शुरू हुआ, जब संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के शब्द हिंदी में शामिल किए गए थे। गौरैया चिड़ियाँ का नाम गौरैया पड़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मसलन, रंग को देखें तो गौरैया का नाम उसके रंग से जुड़ा हो सकता है। जैसे “गौर” शब्द का अर्थ है “सफेद” या “गोरा” और गौरैया के पंखों में सफेद और भूरे रंग का मिश्रण होता है। ये मिलकर गौरैया शब्द बना।
गौरैया केवल एक पक्षी का नाम भर नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं, लोकसंस्कृतियों और मानव-प्रकृति संबंधों की एक समृद्ध विरासत का प्रतीक भी है। इसके विविध नाम भारत की भाषाई बहुलता को दर्शाते हैं, जबकि इसकी व्युत्पत्ति हमें भाषा-विकास की हजारों वर्षों लंबी यात्रा से परिचित कराती है।
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