गौरैया में परजीवी मिलते हैं पर उससे मौत नहीं होती

संजय कुमार / गौरैया में परजीवी मिलते हैं। यह बात सही है कि गौरैया परजीवियों से संक्रमित होकर बीमार होती है लेकिन उससे उनकी मौत नहीं होती । मौत के पीछे कीटनाशक, खाना न मिलना आदि कारण हो सकते हैं । वेब साईट pubmed.ncbi.nlm.nih.gov की माने तो तुर्की में 48 गौरैया की जांच में 85.4%…

संजय कुमार / गौरैया में परजीवी मिलते हैं। यह बात सही है कि गौरैया परजीवियों से संक्रमित होकर बीमार होती है लेकिन उससे उनकी मौत नहीं होती । मौत के पीछे कीटनाशक, खाना न मिलना आदि कारण हो सकते हैं । वेब साईट pubmed.ncbi.nlm.nih.gov की माने तो तुर्की में 48 गौरैया की जांच में 85.4% गौरैया एक या ज्यादा एंडोपैरासाइट से संक्रमित मिलीं। इनमें लीवर ट्रेमाटोड, कॉक्सीडिया, टैपवार्म शामिल थे। कहीं यह भी कहा जाता है कि बड़ी संख्या में बीमारी से दम तोड़ देती हैं हालाँकि, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है। ज्यादातर गौरैया इन परजीवियों के साथ जी लेती हैं।

गंभीर बीमारी या मौत तभी होती है जब गौरैया पहले से कमजोर हो, भूखी हो या स्ट्रेस में हो। साल्मोनेला और एस्चेरिचिया कोली 13 प्रतिशत  गौरैया में पाए जाने की संभावना  होती है  गौरैया में साल्मोनेला मिलता है, ये पक्का है। इंडोनेशिया में 30 गौरैया के मल की जांच में 3.3% में साल्मोनेला मिला। बेल्जियम में 364 स्वस्थ गौरैया में साल्मोनेला बिल्कुल नहीं मिला। (pubmed.ncbi.nlm.nih.govbio conferences.orgjournals.plos.org) 13 प्रतिशत गौरैया में यह पाया गया वाला आंकड़ा किसी बड़े स्टडी में नहीं मिला। हर जगह रेट अलग अलग मिला – 0% से 3.3% तक। 13% का आंकड़ा शायद किसी लोकल प्रकोप के दौरान का हो। जंगली पक्षियों में E. coli मिलता है, लेकिन गौरैया में कितना कॉमन है, इसका साफ डेटा नहीं है (bio-conferences.org3.) ।

बेल्जियम स्टडी में सिर्फ दो मरी हुई गौरैया से साल्मोनेला टाइफीम्यूरियम मिला। साल्मोनेला गौरैया के लिए रिजर्वायर नहीं है। यानी गौरैया में ये बीमारी लगातार नहीं बनी रहती। कभी-कभार होता है, खासकर जब गौरैया बर्ड फीडर पर रहती है। वेस्ट नाइल वायरस, घरेलू गौरैया में निष्क्रिय होकर सर्दियों में जीवित रहते हैं, गौरैया वेस्ट नाइल वायरस की कैरियर है। ये वायरस गौरैया में बिना लक्षण के रह सकता है। कोई भी बड़ी रिसर्च ये नहीं कहती कि अकेले रोग से गौरैया खत्म हो रही है। गौरैया घटने के मुख्य कारण हैं – घोंसले की जगह खत्म होना, कीटनाशक, खाना न मिलना, आदि कारण हो सकते हैं । बीमारी एक फैक्टर है, लेकिन सबसे बड़ा नहीं। बेल्जियम स्टडी साफ कहती है कि गौरैया साल्मोनेला का कोई बड़ा रिजर्वायर नहीं है।

गौरैया बीमारियों की वाहक हो सकती है, इसलिए बर्ड फीडर और पानी के बर्तन हफ्ते में एक बार साबुन से साफ करें। इंसानों को खतरा कम है, पर सावधानी जरूरी है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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