सुमन सिंह/ कछुआ एक ऐसा जीव है, जिसके शरीर पर हड्डियों और केराटिन से बना खोल होता है, जो उसे शिकारियों से बचाता है। निस्संदेह, पृथ्वी के इस सबसे पुराने जीव का जीवन प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, आवास के विनाश और अवैध तस्करी के कारण खतरे में है और इसकी कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं, लेकिन देश-विदेश में इसके संरक्षण के लिए कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, जिनका सकारात्मक असर पड़ा है। 23 मई को ही देखिए। जब से इसे विश्व कछुआ दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हुई है, कछुए के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
भारत की बात करें, तो यहां साल 1975 में ही कछुआ संरक्षण परियोजना की शुरुआत हो गई थी। नवंबर 1999 में कछुओं के संरक्षण के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया, जब पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम
(यूएनडीपी) के सहयोग से राष्ट्रीय समुद्री कछुआ संरक्षण परियोजना शुरू की। इसका मुख्य मकसद लुप्तप्रायः प्रजातियों के कछुओं की रक्षा करना है। इस परियोजना के अंतर्गत ओडिशा के तटों और अन्य तटीय क्षेत्रों में कछुओं के अंडों को शिकारियों से बचाया जाता है और सुरक्षित रूप से समुद्र में छोड़ने की व्यवस्था की जाती है। इन सबके अलावा भी कछुओं को बचाने, अवैध शिकार से मुक्त कराने और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रूप से छोड़ने के लिए देश में कछुआ संरक्षण और पुनर्वास योजनाएं चलाई जा रही हैं।
केंद्र व राज्य सरकारें न सिर्फ कछुआ को बचाने के प्रयास करती हैं, बल्कि उनके प्रजनन को भी सुरक्षित रखने के प्रयास करती हैं। उत्तर प्रदेश में ही सारनाथ और कुकरैल में प्रजनन केंद्र है। सारनाथ तो देश के सबसे पुराने कछुआ प्रजनन
केंद्रों में से एक है, जहां चंबल और यमुना नदियों से लाए गए कछुए अपने अंडे सेते हैं। इसी तरह, गुजरात के मधुपुर में वन विभाग का कछुआ प्रजनन केंद्र है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर भी कालीपुर और डिगलीपुर में कछुओं के प्रजनन स्थान बनाने की सुविधाएं विकसित की गई हैं। वैसे, भारत के ओडिशा में गहिरमाथा तट को दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक कछुआ प्रजनन स्थल के रूप में जाना जाता है, जहां लाखों ऑलिव रिडले कछुए हर साल अंडे देने आते हैं। साफ है, कछुओं के संरक्षण के लिए कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, आम लोगों को भी अपनी तरफ से कुछ कोशिश करनी चाहिए, खासकर अवैध तस्करी करके लाए गए कछुओं की खरीदारी और समुद्री क्षेत्रों में गंदगी फैलाने से उनको बचना चाहिए। (साभार -दैनिक हिंदुस्तान ,नई दिल्ली -23-5 -26)
दुर्लभ जीव की सुरक्षा के हो रहे प्रयास
सुमन सिंह/ कछुआ एक ऐसा जीव है, जिसके शरीर पर हड्डियों और केराटिन से बना खोल होता है, जो उसे शिकारियों से बचाता है। निस्संदेह, पृथ्वी के इस सबसे पुराने जीव का जीवन प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, आवास के विनाश और अवैध तस्करी के कारण खतरे में है और इसकी कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार…

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संयोजक

हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स
Hamari Gauraiya and Environment Warriors
*सम्पादक -डॉ .लीना
*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य
विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प
20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।
घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।
प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“
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