विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए कछुए

*विश्व कछुआ दिवस,23 मई* *हृतेश मिश्र / कछुआ पृथ्वी के प्राचीनतम जीवों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि 22 करोड़ वर्ष पहले से यह धरती पर मौजूद है। इसका अर्थ है कि इसने डायनासोर का उदय और अंत भी देखा है। इसका अनोखा कवच इसके जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है। ऐसे…

*विश्व कछुआ दिवस,23 मई*

*हृतेश मिश्र / कछुआ पृथ्वी के प्राचीनतम जीवों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि 22 करोड़ वर्ष पहले से यह धरती पर मौजूद है। इसका अर्थ है कि इसने डायनासोर का उदय और अंत भी देखा है। इसका अनोखा कवच इसके जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है। ऐसे जीव की यदि 54 फीसदी प्रजातियां खत्म या लुप्तप्रायः हो गई हैं, तो यह एक शोचनीय मसला है। यही कारण है कि हर साल 23 मई को विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है, ताकि सरकारों, संस्थाओं व आम लोगों में कछुओं को लेकर जागरूकता बढ़े और वे इसे बचाने के हरसंभव प्रयास करें।
मुख्य रूप से इंसानी गतिविधियां ही कछुओं के जीवन पर भारी पड़ रही हैं। पारंपरिक दवाओं में मांस व कवच के इस्तेमाल के कारण कछुओं का न सिर्फ अवैध शिकार होता है, बल्कि तस्करी भी खूब होती है। इसी तरह, उनके अनुकूलन
वाली जगहों पर इंसान कब्जा करने लगे हैं। जैसे- तालाब अब सिमटते जा रहे हैं, जंगलों की कटाई हो रही है। नतीजतन, कछुओं के प्राकृतिक प्रजनन स्थल तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। प्रदूषण भी कछुओं को खूब नुकसान पहुंचाता है। समुद्र में प्लास्टिक और कचरा जमा होने से समुद्री कछुए अक्सर उनको खाकर मर जाते हैं। इन्हीं सबका दुष्परिणाम है कि इसकी ऑलिव रिडले जैसी प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। इसी तरह, भारतीय स्टार कछुआ को, जिसकी पीठ पर तारों जैसे पीले निशान होते हैं, दुर्लभसूची में शामिल किया जा चुका है। कुछ प्रजातियां तो पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि कुछ को वैज्ञानिकों द्वारा पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह हालत तब है, जब कछुओं को पारिस्थितिकी तंत्र के लिए काफी अहम माना जाता है। यहां तक कि लोककथाओं,
सांस्कृतिक व आध्यात्मिक मान्यताओं में भी उसका महत्वपूर्ण स्थान है। आकलन यही है कि विश्व में ज्ञात 350 से अधिक कछुआ प्रजातियों में से करीब 60 फीसदी प्रजातियां संकटग्रस्त या खत्म होने के कगार पर पहुंच गई हैं, जिसका अर्थ है कि कछुओं के संरक्षण के लिए चल रहे प्रयास पूरी तरह से सफल नहीं हो रहे और उन्हें गंभीरता से आगे बढ़ाने की दरकार है।
कछुआ हमें जीवन का गहरा सबक सिखाता है। यह बताता है कि टिके रहने के लिए महज भागना जरूरी नहीं है, बल्कि धैर्य भी काफी अहम है। इसलिए कछुओं के संरक्षण की आदत हमें अपने अंदर विकसित करनी चाहिए। विश्व कछुआ दिवस इस बाबत गंभीरता से सोचने का मौका देता है। हमें इस दिवस को सार्थक बनाना चाहिए। इस जीव को उसका प्राकृतिक आवास देना चाहिए। (साभार :-दैनिक हिंदुस्तान,नई दिल्ली .23-5-2026)
*टिप्पणीकार

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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