संजय कुमार/ गौरैया / अनायास ही वह दौर याद आता है जब नींद किसी अलार्म या मोबाईल के रिंग टोन से नहीं, बल्कि घर-आँगन,मुंडेर, खिड़की या बाग़-बगीचा में बैठी नन्ही गौरैया की ‘चीं-चीं’ से खुला करती थी। वह नन्ही सी चिड़ियाँ हमें केवल नींद से जगती ही नहीं बल्कि घर-आंगन में उसका फुदकना, चहकना, फुर्र से पास आना और फुर्र से उड़ जाना, भूरे पंखों वाली गौरैया हमारे घरों की सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि ‘आँगन की नन्ही परी’ है। हमारे घर में आती है। रहती है। इसलिए उसे घरेलू गौरैया कहते हैं। दौर बदल चुका है। कभी चिड़ियों की आवाज से सुबह की नींद खुलती थी। आज सुबह की शुरुआत मोबाइल की कर्कश रिंगटोन से होती है।
गौरैया का इंसानों के साथ एक अनूठा रिश्ता रहा है। पुराने समय में जब घर मिट्टी के होते थे या खपरैल की छतें हुआ करती थीं, तब गौरैया घर के किसी कोने, रोशनदान या तस्वीर के पीछे अपना घोंसला बना लेती थी। हालाँकि, आज भी कुछ घरों में वह ऐसा करती हैं। घरों में दादी या माँ जब आँगन में बैठकर सूप से अनाज साफ करती, तो यह बेखौफ होकर उनके पास गिरते दानों को चुगने आ जाती थी। बच्चों के लिए कौतूहल का विषय होती थी गौरैया। घर के कोने में जब घोंसला बना लेती और अंण्डे देती, फिर बच्चे निकल आते, तो बच्चों की ख़ुशी देखने लायक होती थी। गौरैया का घर के अंदर आना पंखे पर बैठ जाना या ड्रेसिंग ग्लास या दिवार पर लगी आइना में अपनी परछाई से लड़ती, तो कभी आँगन या गमले की मिटटी में लोटपोट कर धूल उड़ाती, ये दृश्य मन को मोह लेते थे।
समय बदला और हमारे ‘आँगन’ सिमटकर फ्लैट्स की ‘बालकनी’ बन गए। कंक्रीट के जंगलों ने नन्ही परी का आशियाना छीन लिया। जहाँ बाग़-बगीचा भी उजड़ गया। वहीँ, आधुनिक दौर में अब वह जगह ही नहीं बची जहाँ गौरैया घोंसला बना सके। हमने अपने बाग- बगीचों को उजाड़ दिया। खेतों में इतने रसायन डाल दिए कि वह छोटे कीड़े ही खत्म हो गए, जिन्हें खिलाकर गौरैया अपने बच्चों को बड़ा करती थी।
आज कई घर आँगन,मोहल्ला,क़स्बा,गांव-शहर से गौरैया गायब हो चुकी है। गौरैया का गायब होना केवल एक पक्षी का कम होना नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि पर्यावरण खतरे में है। जो, पर्यावरण असंतुलन का संकेत भी देता है। गौरैया हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि घर- आँगन में गौरैया नहीं है, तो हमें समझना होगा कि हमारा परिवेश धीरे-धीरे प्रदूषण की चपेट में जा रहा है। नन्ही परी गौरैया को वापस बुलाना मुश्किल नहीं है, बस थोड़ी सी संवेदनशीलता की जरूरत है। कंक्रीट के जंगल को तोड़-फोड़ या काट नहीं सकते। समय निकल चुका है लेकिन पहल किया जा सकता है। आहार-पानी -पेड़-आवास की कमी से हमें छोड़ गयी है ऐसे में हमें अपनी छत या बालकनी या घर की दीवार या खुल्ले में नियमित रूप से ताज़ा पानी और टूटे हुए चावल रखें। बाज़ार से कृत्रिम घोंसले लाकर सुरक्षित ऊँचाई पर लगाएँ जहाँ बिल्लियों का डर न हो। झाड़ीदार-फलदार पौधे लगाएँ, जहाँ ये छिप सकें और सुरक्षित महसूस करें। साथ ही कृत्रिम घोंसला लगाएं। गौरैया हमारी संस्कृति से जुडी है। लोकगीत-संगीत और कहानियों में किरदार है। जो अभी जिन्दा है। अगर हम अभी नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियाँ इस ‘नन्ही परी’ गौरैया को इंटरनेट पर केवल तस्वीरों को देख आहे भरेंगी। इसलिए, हमें आज ही अपने दिलों और घरों के दरवाजे नन्ही परी गौरैया के लिए खोलने होंगे। इस बात से इंकार नहीं, जिस घर के आँगन में गौरैया चहचहाती है, वहाँ खुशियाँ और सकारात्मकता खुद-ब-खुद खिंची चली आती हैं।














