कहाँ खो गई गौरैया की चीं-चीं 

संजय कुमार/ गौरैया / वह भी क्या दिन थे, जब सुबह की पहली किरण के साथ खिड़की के रोशनदान या आँगन या फिर मुंडेर या घर से सटे बाग़-बाड़ी के पेड़ों पर से एक  मधुर संगीत  गूँजा करता  था, ‘चीं-चीं, चीं-चीं’। यह हमारी नन्ही दोस्त गौरैया की चहचाहट होता थी। गौरैया की ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ सिर्फ…

संजय कुमार/ गौरैया / वह भी क्या दिन थे, जब सुबह की पहली किरण के साथ खिड़की के रोशनदान या आँगन या फिर मुंडेर या घर से सटे बाग़-बाड़ी के पेड़ों पर से एक  मधुर संगीत  गूँजा करता  था, ‘चीं-चीं, चीं-चीं’। यह हमारी नन्ही दोस्त गौरैया की चहचाहट होता थी। गौरैया की ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ सिर्फ आवाज नहीं होती, बल्कि उसके लय-ताल से जहाँ मन को सुकून मिलता वहीँ, दिमाग को थेरेपी भी। जो, तनाव, चिंता, अवसाद व व्यवहारिक समस्याओं से हमें मुक्त करता प्रतीत होता था। लेकिन, आज कंक्रीट के जंगल और बढ़ते  शोर-शराबे  के बीच, ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज़ कहीं खो गई है। सन्नाटे में तब्दील ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज  हमसे  सवाल  कर रहा  है  कि  आखिर  कहाँ खो गई घरेलू गौरैया की चीं-चीं की आवाज़। और, वह हमसे  इतनी  दूर क्यों हो गई? सवाल बड़ा है। हालाँकि ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज पूरी तरह से गायब नहीं हुई है। बल्कि, कई गाँव-शहर-क़स्बा -मोहल्ला-खेत-खलिहान में आज भी ‘चीं-चीं, चीं-चीं’  सुनायी पड़ती है लेकिन  पहले  की  तहर  से  नहीं। 

यह सच है कि गौरैया  और  इंसान  का  साथ  सदियों  पुराना  है। पुराने समय के  कच्चे , खपरैल और फूस  के  घरों  और  ऊँचे  रोशनदानों  में  गौरैया को  अपना  घर (घोंसला) बनाने  के  लिए  सुरक्षित जगह मिल जाया करता था  लेकिन  आधुनिक  फ्लैट्स,  शीशे और जाल  की  दीवार वाले  घरों / दफ्तरों  ने  गौरैया   के  लिए  दरवाज़े  बंद  कर  दिए  हैं। अब  न  घर  में कोना है , न रौशनदान है  जहाँ  गौरैया तिनके जमा कर सके। हमने अपने रहने के लिए महल तो बना लिए, लेकिन  इस नन्ही जान का आशियाना छीन लिया। ऐसे में जब गौरैया का घरों में प्रवेश ही छिन लिया तो वहां कहाँ से आएगी और मनमोहक ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज वाली संगीत?

गौरैया की ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ आवाज कर्कश नहीं होती। एक गौरैया ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ करती है तो आवाज कर्कश नहीं होती और जब समूह में ‘चीं-चीं, चीं-चीं’  करती है तब भी आवाज कर्कश नहीं लगता। शाम के समय पक्षियों के बसेरे में लौटने और सुबह-सुबह घोंसला छोड़ने से पहले, ये गौरैया सामूहिक गायन करती है, जिसे सामान्य भाषा में चहकना कहा जाता है।

गौरैया चहचहाहट के  दौरान  तरह – तरह की आवाज निकालते हुए एक दूसरे से बात करती है। दाना चुगने, आराम करने, खेलने, लड़ने, प्यार/प्रजनन करने, साथी को बुलाने आदि गतिविधियों  के  दौरान  गौरैया के आवाज चहकने में विभिन्नता होती है। झुंड में सुबह और शाम कोलाहल वाली आवाज होती है। सुबह की आवाज  धीरे-धीरे तेज होते हुए, विश्राम स्थल से बाहर जाने का संकेत होता है, जबकि शाम  में  तेज चहकना फिर धीरे – धीरे  शांत होना आराम करने  का  संकेत होता है ।

सुबह और शाम गौरैया समूह ‘चीं-चीं, चीं-चीं’  आवाज निकालती है। पेड़, बिजली के तार या अपने निवास स्थान से गौरैया सुबह सूरज की किरण निकलते ही समूह में ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ करती है और एक दूसरे से संवाद करते हुए आहार या तफरी के लिए उड़ती है । और, शाम में सूरज के डूबत ही  अपने आशियाने  में  वापस  आती है तो ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की  आवाज करते हुए रात गुजरने के लिए बैठ जाती है। दोनों वक्त ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज धीरे-धीरे तेज  और फिर शांत हो जाती है । दोनों वक्त आवाज में गजब का तालमेल होता है। एक साथ बोलना और फिर धीरे-धीरे शांत हो जाना,यह नजारा अद्भुत होता है । गौरैया ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज कई तरह से निकालती है । इसे सामाजिक शोर भी कह सकते हैं । जो सब सुरक्षित हैं का सन्देश देता है। एक दूसरे को बुलाने के लिए गौरैया की आवाज में साफ-साफ संकेत होता है, उसकी आवाज सुन कर गौरैया (नर/मादा) आती है । नर की तुलना में मादा की आवाज मधिम होती है । नर गौरैया जब घोंसला बनाता या उस पर अपना अधिकार जमा रहा होता है तो आवाज तेज और लगातार ख़ुशीमय होती है, जो मादा गौरैया को आकर्षित करने के लिए होती है। अगर बुलाने के क्रम में मादा गौरैया नहीं आती है तो वह तनाव में आकर तेज आवाज लगातार निकालता  है । मादा के आते ही उसके सुर बदल जाते हैं । प्यार का इजहार करते  लय  में  संगीतमय आवाज निकलते हुए, नृत्य करते हुए, मादा गौरैया के आगे-पीछे करता है। गुस्से या चिढ़ में नर गौरैया की आवाज आक्रामक भावना को लिए होती है ।

नर गौरैया जब जोड़ा बनाता है और सृजन करता है। उस दौरान मादा गौरैया के आगे पीछे पंख फैला कर मधुर तान छेड़ते नर गौरैया नृत्य करता है। यह अद्भुत दृश्य होता है। घोंसला में जब गौरैया का बच्चा रहता है तो वह मधिम ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ की आवाज निकालते हुए अपने माता-पिता से संचार करता है । गौरैया की आवाज़ में संचार का पुट होता है। साधारण ‘चीं-चीं, चीं-चीं’ यानि  चहचहाहट सबसे आम आवाज़ है। नर गौरैया इसका उपयोग मादा को या अपने बच्चों को  बताने के लिए करता है। वह अक्सर किसी ऊँची जगह पर बैठकर बार-बार एक ही लय में चहचहाता है ताकि दूसरी गौरैया को पता चले कि वह यहाँ  है।

‘चीं-चीं, चीं-चीं’  की आवाज जब ‘कर्र-कर्र’ हो तो वह खतरे की चेतावनी का संकेत होता है। बिल्ली, सांप या शिकरा गौरैया को दिखाता है यानि कोई  खतरा  है, तो उसकी आवाज़ ‘कर्र-कर्र’ जैसी तेज़ हो जाती है। वहीँ जब दो आपस  में  झगड़ते  है तो  गुस्से वाली लगती है। कह सकते हैं कि गौरैया कई तरह से आवाज निकल लेती है। सबके भाव अलग अलग होते हैं ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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