बिनसर: जंगल, हिमालय और जैव विविधता का संसार

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(7) संजय कुमार / हमारी यात्रा का पहला प्रमुख पड़ाव बिनसर था। कुमाऊँ क्षेत्र के अल्मोड़ा जिले में स्थित बिनसर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और हिमालय के मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार, बिनसर लगभग 2,420 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां…

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(7)

संजय कुमार / हमारी यात्रा का पहला प्रमुख पड़ाव बिनसर था। कुमाऊँ क्षेत्र के अल्मोड़ा जिले में स्थित बिनसर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और हिमालय के मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार, बिनसर लगभग 2,420 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से मौसम साफ होने पर चौखंभा, त्रिशूल, नंदा देवी, शिवलिंग और पंचाचूली जैसी हिमालयी चोटियों के दर्शन हो सकते हैं। हमने अपने प्रवास के दौरान हिमालयी चोटियों का कई इलाकों से बेहतरीन दर्शन हुए। आसमान साफ़ होने से नजारा दिव्य था।

बिनसर की पहचान केवल जंगल एवं पहाड़ों के दृश्य तक सीमित नहीं है। यहां का वन क्षेत्र भी विशेष महत्व रखता है। बिनसर वन्यजीव अभयारण्य लगभग 47 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहां ऊंचाई वाले हिस्सों में बांज यानी ओक और बुरांश के वन मिलते हैं, जबकि अपेक्षाकृत निचले हिस्सों में चीड़ के जंगल पाए जाते हैं। यह वनस्पति अनेक जीवों और पक्षियों के लिए आवास उपलब्ध कराती है। क्लब महेंद्र के बिनसर रिसोर्ट पहुँचने पर हमारा स्वागत बुरांश के फूल से बने पेयजल से किया गया। बुरांश के पेयजल पूरे अल्मोड़ा में बिकता है।

बिनसर के अभयारण्य में घुरल, काकड़, जंगली सूअर, हिमालयी काला भालू, लोमड़ी, साही और तेंदुए जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। तेंदुए जैसे वन्यजीवों को देख पाना आसान नहीं है, क्योंकि वे सामान्यतः मनुष्यों से दूरी बनाए रखते हैं। जंगल में उनकी मौजूदगी का महत्व इस बात में है कि वे प्राकृतिक खाद्य शृंखला का हिस्सा हैं। मुझे कस्तूरी सिवेट दिखा जो एक पेड़ के ऊँचे डाल पर सो रहा था।

बात बांज और बुरांश की तो जंगलों का पारिस्थितिक महत्व को भी समझना जरूरी है। पहाड़ों की यात्रा से साफ़ होता हिया कि जंगल मिट्टी को थामने, वन्यजीवों को आश्रय देने और स्थानीय जलवायु को सहारा देने में अहम्भू मिका निभाते हैं। पहाड़ी ढलानों पर वनस्पति का आवरण कमजोर पड़ने से मिट्टी के कटाव और भूमि क्षरण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इन जंगलों का संरक्षण केवल पेड़ों को बचाने का काम नहीं है, बल्कि पूरे पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा का प्रयास है। पहाड़ की खासियत है कि समय समय पर पहाड़ से पत्थर का गिरना लगा रहता है। रास्ते में कई जगहों पर लैंड स्लाइड दिखा। जगह जगह पर पत्थर के गिरने से सम्बंधित चेतावनी बोर्ड भी लगा हुआ है।

खुबसूरत बिनसर का ऐतिहासिक महत्व भी है। स्थानीय लोगों से बातचीत में पता चला कि यह चंद राजाओं की पूर्ववर्ती ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा करता था। यहां का बिनेश्वर महादेव मंदिर स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। इस तरह बिनसर में प्रकृति, इतिहास और संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिलता है।

जंगल को देखने से पहले उसे समझना जरूरी

किसी वन्यजीव अभयारण्य में पहुंचकर अक्सर पर्यटकों की इच्छा होती है कि उन्हें कोई दुर्लभ पक्षी या वन्यजीव दिखाई दे। लेकिन जंगल को केवल वन्यजीवों को देखने की जगह मानना उसकी पूरी पहचान को सीमित कर देना है। जंगल की वास्तविक सुंदरता उसके पूरे जीवन तंत्र में है। एक पेड़ पर उगने वाली काई, पत्तियों के नीचे रहने वाले कीट, मिट्टी में काम करने वाले सूक्ष्म जीव, पेड़ों पर घोंसले बनाने वाले पक्षी और जंगल में विचरण करने वाले बड़े स्तनधारी, ये सभी मिलकर एक जटिल प्राकृतिक व्यवस्था बनाते हैं। किसी दिन बिनसर में तेंदुआ दिखाई न दे, तब भी जंगल का अनुभव अधूरा नहीं होता। हवा में पत्तियों की सरसराहट, पेड़ों के बीच बदलती रोशनी, पक्षियों की आवाज और जंगल की मिट्टी की गंध अपने आप में महत्वपूर्ण अनुभव हैं। इस अनुभव को महसूस करने के लिए आपको एक बार इनके बीच आना ही होगा,तभी प्रकृति के महत्व को हम समझ सकेंगे। प्रकृति को समझने के लिए जरूरी है कि हम कुछ समय बिना किसी जल्दबाजी के बिताएं। हर दृश्य को कैमरे में कैद करने के बजाय कभी-कभी कैमरा नीचे रखकर उस पल को महसूस करें। प्रकृति का अनुभव केवल तस्वीरों में नहीं, हमारी स्मृतियों और संवेदनाओं में भी सुरक्षित तभी रहेगा जब नजदीक से इससे रूबरू होंगे।

पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं

आज पर्यटन अनेक पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। सड़क संपर्क, होटल, होमस्टे, भोजनालय, स्थानीय परिवहन और गाइड जैसी सुविधाओं से लोगों को आय मिलती है। यह सब अल्मोड़ा के कई हिस्सों में भी दिखा। यह सच है कि पर्यटकों के आने से स्थानीय संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता भी बढ़ती है। लेकिन यदि पर्यटन अनियोजित हो जाए, तो इसके साथ कचरा, पानी की बढ़ती मांग, वाहनों का दबाव, ध्वनि प्रदूषण और वन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। इसलिए जरूरी है कि पर्यटन का विकास स्थानीय पर्यावरण की क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। संवेदनशील वन क्षेत्रों में अनावश्यक शोर से बचना, वन्यजीवों को भोजन न देना, निर्धारित रास्तों का उपयोग करना और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए। दरअसल में वन्यजीव क्षेत्र खुद संवेदनशील होता है ऐसे में हमें भी उसके अनुरूप चलने की आवश्यकता है। पहाड़ लाखों लोगों का घर हैं और अनेक जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास। अल्मोड़ा में प्रकृति आधारित पर्यटन में स्थानीय समुदाय की भागीदारी, स्वच्छता, जल संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा की प्राथमिकता देखने को मिली।

प्रकृति हमें बुला रही है, क्या हम उसकी आवाज सुनेंगे?

काठगोदाम से बिनसर तक का सफर हमें कई तरह के अनुभव दिए। रास्तों की खूबसूरती मन को आकर्षित करती रही है, स्थानीय बाजार में पहाड़ी जीवन की झलक दिखी । हालाँकि बाजार छोटे शहरों में छोटे स्वरूप में थे। लोगों ने अपने घर के आगे छोटे दूकान खोल लिए हैं। जहाँ, जरुरत की चीजें मिल जाती है। दूकान में पर्यटकों के ख्याल से खाने पीने की चीजें थी। चाय, नमकीन, मोमो, नुडल्स, ब्रेड अमूमन हर जगह मिल रही थी। पहाड़ के किनारे बने रेस्टोरेंट में हर खाने की चीजें उचित मूल्य में मिल जाते हैं। लेकिन रास्ते में दिखा कचरा और खाली शराब की बोतलें हमें यह भी बताते हैं कि सुंदरता को बनाए रखना अपने आप में एक जिम्मेदारी है। पानी के उपयोग से जुड़े चेतावनी बोर्ड संसाधनों के महत्व को याद दिलाते हैं। जंगलों और पक्षियों की मौजूदगी यह समझाती है कि प्रकृति का हर हिस्सा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।

हम प्रकृति से बहुत कुछ लेते हैं—स्वच्छ हवा, पानी, भोजन, औषधियां, मानसिक शांति और जीवन के लिए जरूरी संसाधन। इसके बदले हम क्या करते हैं, यह सवाल हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए,जो खासकर पहाड़ की यात्रा करते हैं। यदि आप भी पहाड़ों की यात्रा पर जाएं, तो केवल अच्छे दृश्य तलाशने तक सीमित न रहें। वहां के पेड़ों, पक्षियों, जलस्रोतों और स्थानीय जीवन को समझने का प्रयास करें। स्थानीय लोगों से बातचीत करें, उनके अनुभव सुनें और उनकी परिस्थितियों का सम्मान करें। कचरा न फैलाएं, पानी बचाएं और वन्यजीवों को परेशान न करें।

प्रकृति के करीब जाने का अर्थ मेरे लिए केवल दुनिया की खूबसूरती को देखना नहीं रहा, बल्कि अपने भीतर संवेदनशीलता को विकसित करना भी रहा। पहाड़ पर पेंड़ों की कतार, नदी से बहता पानी और किसी पक्षी की आवाज, दृश्य जरुर बनाते मिले लेकिन उनके जीवन और महत्व को समझने का अवसर प्रकृति ने दिया।

तो आइए, प्रकृति से एक बार जुड़कर देखिए। पहाड़ों की शांति को महसूस कीजिए, जंगलों का संगीत सुनिए, पक्षियों की दुनिया को समझिए और लौटते समय अपने साथ केवल खूबसूरत यादें लेकर आइए—कचरा, प्रदूषण और प्रकृति पर बोझ नहीं। क्योंकि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी उसकी सुंदरता, उसका जीवन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।….जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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