संजय कुमार / 21वीं सदी के तीसरे दशक में हम आज जिस ‘विकास’ शब्द की चर्चा करते हैं तो उसके साथ अनचाहे ही लेकिन सही मायने में विनाश की परछाइयाँ भी जेहन में उभरने लगती हैं। खेत-खलिहान, किसान और पर्यावरण—ये तीन शब्द आज वैश्विक विमर्श के केंद्र में हैं। विडंबना यह है कि इनकी चर्चा इनके फलने-फूलने के कारण नहीं, बल्कि इनके अस्तित्व पर मँडराते संकट के कारण हो रही है। जलवायु परिवर्तन की तपिश, मिट्टी के स्वास्थ्य का क्षरण, रसायनों का अनियंत्रित उपयोग और जल संकट ने कृषि को एक जोखिम भरा व्यवसाय बना दिया है।
‘किसान’ को पहली बार संगठित शक्ति का अहसास कराया
ऐसे संकटकाल में, हमें उस महापुरष की ओर देखना पड़ता है जिसने न केवल आधुनिक भारत का मानचित्र खींचा, बल्कि देश की आत्मा—’किसान’—को पहली बार संगठित शक्ति का अहसास कराया था। जी हाँ, बात सरदार वल्लभभाई पटेल की हो रही है। सरदार पटेल का नाम अक्सर रियासतों के एकीकरण के साथ लिया जाता है, लेकिन उनका मौलिक स्वरूप एक ‘किसान’ का था। साथ ही एक पर्यावरणविद के रूप में भी। आज के पर्यावरण संकट और कृषि संकट के समाधान उनके विचारों की गहराई में छिपे हैं।
आज खेत-खलिहान, किसान और पर्यावरण की हालत वाकई खराब है? सवाल का जवाब खोजने दूर तक नहीं जाना होगा, सामने ही मिल जायेगा। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी का क्षरण, और जल संकट, फसल अवशेषों का जलाना, रासायनिक खाद के अंधाधुंध प्रयोग, मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन आदि से किसानों की किसानी खतरे में है, किसान परेशन हैं तो वहीँ आम आदमी पर्यावरण के खतरे में पड़ने से परेशन हैं। हालाँकि, सरकारी और गैरसरकारी पहल जारी है। लेकिन, तस्वीर दिनों-दिन ख़राब हो रही है खासकर जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण खतरे में घिरता जा रहा है। ऐसे में एक नाम सामने आता है देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल। जिनके कामों को गिनाया जाए तो शब्द कम पड़ जायेगे। लेकिन आज बात करेंगे उनके द्वारा आज के महत्वपूर्ण मुद्दे पर्यावरण और किसान को लेकर।
सरदार पटेल ने दशकों पहले वृक्षों और प्रकृति के महत्व को समझ लिया था
बात पहले पर्यावरण संरक्षण को लेकर, तो आज जब हम ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि यह कोई आधुनिक समस्या है। लेकिन सरदार पटेल ने दशकों पहले वृक्षों और प्रकृति के महत्व को समझ लिया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में पर्यावरण संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। आज हम विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुध कटाई कर रहे हैं। सरदार पटेल का मानना था कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था, “पेड़ों को काटना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें बचाना चाहिए। पेड़ हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।” यह कोई सामान्य नारा नहीं था, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य था जिसे पटेल ने उस समय महसूस किया जब औद्योगिक क्रांति भारत में पैर पसार रही थी। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में न केवल उपदेश दिए, बल्कि स्वयं वृक्षारोपण कर उदाहरण प्रस्तुत किया। पटेल का तर्क था कि पेड़ केवल छाया या लकड़ी नहीं देते, वे हमें ‘प्राणवायु’ (ऑक्सीजन) देते हैं। उनकी यह सोच आज के ‘कार्बन क्रेडिट’ और ‘इकोसिस्टम सर्विसेज’ के सिद्धांतों के समान है।
सरदार पटेल के लिए पर्यावरण संरक्षण केवल सुंदरता के लिए नहीं था बल्कि यह राष्ट्र के स्वास्थ्य से जुड़ा था। वे जानते थे कि यदि भारत की नदियाँ सूख गईं या मिट्टी बंजर हो गई, तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं रहेगा। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर ही आज ‘एकता-पर्यावरण संरक्षण’ जैसे अभियान चलाए जाते हैं। उनका मानना था कि मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना और जल संचयन करना देश की सुरक्षा करने के समान ही महत्वपूर्ण है।
सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में कई पेड़ लगाए थे
सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में कई पेड़ लगाए थे और लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किये थे। ताकि पर्यावरण का संरक्षण हो सकें और लोगों की सांसे नहीं थमें तभी तो वे कहते थे, “पेड़ लगाने से हमें ऑक्सीजन मिलती है, जो हमारे जीवन के लिए आवश्यक है।” पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को लेकर सरदार पटेल को हमेशा याद किया जाता है। उनके जन्मदिन पर, 31 अक्ट्यूबर को, भारत में “राष्ट्रीय एकता दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
सरदार पटेल और पर्यावरण के बीच सीधा संबंध कम, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से गहरा दिखता है। पेड़-पौधे किसान और किसानी से भी जुड़ा है। सरदार पटेल ने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था। उनके आत्मनिर्भरता पर जोर दिया था। और, उनके आदर्शों से प्रेरित होकर आज भी वृक्षारोपण व एकता-पर्यावरण संरक्षण अभियान चलाए जाते हैं, जो दर्शाते हैं कि राष्ट्र-निर्माण के लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन व पर्यावरण सद्भाव महत्वपूर्ण है, हालांकि उनका मुख्य ध्यान राष्ट्रीय एकीकरण पर था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सरदार पटेल एक मजबूत स्तम्भ थे बल्कि आज भी हैं। सरदार पटेल की न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी रही बल्कि शोषित, पीड़ित और आम जनों की चेतना के जागरण की गाथा भी रहे हैं। इस गाथा में भारतीय किसान और सरदार पटेल महत्वपूर्ण है। भारत, एक कृषि प्रधान देश है, देश की आत्मा सदैव हल, खेत और खलिहान में बसती रही है। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने इस आत्मा को लहूलुहान कर दिया था।
औपनिवेशिक शासन ने इसी आत्मा को सबसे ज्यादा आहत किया था। किसान परिवार से आने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। क्योंकि सरदार पटेल केवल भारत की राजनीतिक एकता के शिल्पकार ही नहीं थे, बल्कि वे किसान-चेतना के जन प्रहरी भी थे। उनका किसान आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नैतिक दृढ़ता और जन-आधार का सशक्त प्रमाण है, जो आज भी जीवंत है।
इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश शासनकाल में भारत की कृषि-व्यवस्था पूर्णतः औपनिवेशिक हितों के अधीन थी और आजादी की छटपटाहट में साँस ले रही थी। स्थायी बंदोबस्ती, रैयतवारी और महालवारी जैसी व्यवस्थाओं ने किसान को भूमि का स्वामी नहीं, बल्कि करदाता बना दिया था। इतिहासकार आर.सी. दत्त की पुस्तक ‘इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ का संदर्भ यहाँ प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे ब्रिटिश राजस्व नीतियों ने भारतीय किसानों को ‘स्थायी ऋणग्रस्तता’ के कुचक्र में फंसा दिया था। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी और महालवारी जैसी व्यवस्थाओं ने किसान को उसकी अपनी ही जमीन पर एक विवश करदाता बना दिया था। सच भी था अकाल, सूखा और फसल-बर्बादी के बावजूद लगान की कठोर वसूली ने किसानों को विवश और लाचार बना दिया था। यही वह पृष्ठभूमि थी, जहाँ किसान आंदोलन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय प्रश्न बन गया था। और, किसान आन्दोलन की रूप रेखा तैयार हुई। सूखा और फसल बर्बादी के दौर में भी अंग्रेज लगान की वसूली में रत्ती भर रियायत नहीं देते थे। किसानों को उनकी फसल के साथ-साथ उनके स्वाभिमान को भी गिरवी रखना पड़ता था। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसने एक वकील वल्लभभाई पटेल को ‘किसानों का सरदार’ बनाने की दिशा में मोड़ा।
सरदार पटेल के संगठनात्मक कौशल की पहली बड़ी परीक्षा गुजरात के खेड़ा जिले में हुई। सरदार पटेल में संगठन को खड़ा करने और गोलबंदी की अद्भुत शक्ति थी। वे जिस कार्य को धरातल पर उतारने के लिए देश और जन हित में सोचते थे उस कार्य को धरातल पर उतार देते थे। यही वजह है कि सरदार पटेल की यही संगठनात्मक क्षमता किसान आंदोलनों में निर्णायक सिद्ध हुई थी। बात खेड़ा सत्याग्रह की तो भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। किसानों के उपर बढ़ते अंग्रेजी जुल्म-सितम के खिलाफ खेड़ा सत्याग्रह हुआ।
बिहार के चंपारण में नील किसनों की अंग्रेजी जुल्म से मुक्ति के लिए चला ‘चंपारण सत्याग्रह’ के बाद महात्मा गाँधी ने 1918 ई. में गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की समस्याओं को लेकर खेड़ा सत्याग्रह आन्दोलन शुरू किया था। कहा जाता है कि खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी। खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह यानि आन्दोलन था। यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था। खेड़ा जिले के कुनबी-पाटीदार किसानों ने 1918 ई. में अंग्रेज़ सरकार से लगान में राहत की माँग की थी, क्योंकि गुजरात की पूरे वर्ष की फ़सल बर्बाद हो गई थी। किसानों की दृष्टि में फ़सल चौथाई भी नहीं हुई थी। ऐसी स्थिति को देखते हुए लगान माफी होनी चाहिए थी, पर अंग्रेज अधिकारी किसानों की इस बात को सुनने को तैयार नहीं थे। किसानों के प्रयास असफल हो गए तो, तब महात्मा गाँधी ने 22 मार्च, 1918 ई. में ‘खेड़ा आन्दोलन’ की घोषणा की और उसकी बागडोर सम्भाल ली। इस समय गाँधी जी ने लोगों से स्वयं सेवक और कार्यकर्ता बनने की अपील की। गाँधीजी की अपील पर सरदार वल्लभ भाई पटेल अपनी अच्छी-ख़ासी चलती हुई वकालत छोड़ कर उनके साथ आये। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के नेतृत्व में किसानों ने कर न देने का सामूहिक निर्णय लिया। पटेल ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को संगठित किया और उन्हें भयमुक्त किया। इतिहासकार बिपिन चंद्र के अनुसार, खेड़ा आंदोलन ने किसानों को पहली बार उनकी ‘राजनीतिक शक्ति’ का आभास कराया। यह सत्याग्रह भले ही पूर्ण राजस्व माफी नहीं ला सका, लेकिन इसने ब्रिटिश अहंकार को झुकाया और किसानों को निर्भय बनाया (बिपिनचंद्र-India’s Struggle for Independence)। इस आंदोलन की सफलता ने यह सिद्ध किया कि अहिंसक प्रतिरोध केवल नैतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी प्रभावी है। इस दौरान सरदार पटेल ने गाँव-गाँव घूम-घूम कर किसानों से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराया कि वे अपने को झूठा कहलाने और स्वाभिमान को नष्ट कर जबर्दस्ती बढ़ाया हुआ कर देने की अपेक्षा अपनी भूमि को जब्त कराने के लिये तैयार हैं। अंग्रेजी जुल्म बढ़ता गया लगान नहीं देने पर अंग्रेज़ सरकार की ओर से किसानों के मवेशी तथा अन्य वस्तुएँ कुर्क की जाने लगीं। लेकिन, किसान अपनी प्रतिज्ञा पर अड़े रहे। किसानों को मजबूती से खड़े रहने के लिए महात्मा गाँधी ने किसानों से कहा कि ‘जो खेत बेजा कुर्क कर लिए गए हैं, उसकी फ़सल काट कर ले आएँ’। गाँधीजी के इस आदेश का पालन करने मोहनलाल पंड्या आगे बढ़े और वे एक खेत से प्याज की फ़सल उखाड़ लाए। इस कार्य में कुछ अन्य किसानों ने भी उनकी सहायता की। वे सभी पकड़े गए, मुक़दमा चला और उन्हें सजा हुई। इस प्रकार किसानों का यह ‘सत्याग्रह’ चल पड़ा और सफलता की ओर बढ़ने लगा। यह सत्याग्रह गाँधीजी का पहला आन्दोलन था। अंग्रेज सरकार को अपनी भूल का अहसास भी हुआ, पर स्वीकार नहीं करना चाहती थी। अत: उसने बिना कोई सार्वजनिक घोषणा किए ही ग़रीब किसानों से लगान की वसूली बंद कर दी। किसानों से अंग्रेजों ने कोई समझौता नहीं किया। इससे किसानों को अधिक लाभ तो नहीं हुआ, पर उनकी नैतिक विजय हुई।
किसान आंदोलन और पटेल यही नहीं रुका, जून 1928 में गुजरात, सूरत के बारडोली में हुये प्रमुख किसान आंदोलन का नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया था। जो बारदोली सत्याग्रह से इतिहास के पन्नों में दर्ज है। सरदार पटेल के लिए यदि खेड़ा किसान आन्दोलन चेतना का आरंभ था, तो बारडोली किसान आन्दोलन उसका उत्कर्ष। यह आधुनिक भारत का सबसे सुव्यवस्थित किसान आंदोलन था। बारडोली भीषण अकाल की चपेट में था। इसके बावजूद बॉम्बे प्रेसीडेंसी ने लगान में 22% (कुछ स्रोतों के अनुसार 30%) की वृद्धि कर दी। यह सरासर अन्याय था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस लगान वृद्धि का जमकर विरोध किया। वहीँ, सरकार ने इस सत्याग्रह आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए। मजबूरन सरकार को विवश होकर किसानों की मांगों को मानना पड़ा। इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की। बारदोली किसान संघर्ष पर महात्मा गांधी ने कहा कि इस तरह का हर संघर्ष, हर कोशिश हमें स्वराज के करीब पहुंचा रही है और हम सबको स्वराज की मंजिल तक पहुंचाने में ये संघर्ष सीधे स्वराज के लिए संघर्ष से कहीं ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकते हैं। वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में बारडोली सत्याग्रह ने ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का सफल उदाहरण पेश किया था।
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 1925 में बारडोली क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा था, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। इसके बावजूद ब्रिटिश बॉम्बे प्रेसीडेंसी सरकार ने भूमि राजस्व यानि लगान में 22% से 30% तक की बढ़ोतरी कर दी। कुछ स्रोतों में 22% तो कुछ में 30% की लगन वृद्धि का दिया था। वृद्धि अनुचित थी, क्योंकि अकाल के कारण फसलें खराब हुई थीं और किसान कर चुकाने में असमर्थ थे। फिर भी अंगेज सरकार द्वारा जबरन वसूली, संपत्ति जब्त करने और गिरफ्तारियों की धमकी दी जा रही थी। इस आंदोलन को महात्मा गांधी ने नैतिक समर्थन दिया था और जरूरत पड़ने पर बारडोली पहुंच कर वैकल्पिक नेतृत्व की तैयारी भी की थी। साथ ही कई किसान नेताओं के सहयोग किया था। बारडोली किसान आंदोलन जनवरी 1926 से शुरू हुआ, लेकिन मुख्य सत्याग्रह फरवरी 1928 में तेज हुआ। और, 12 फरवरी 1928 में आंदोलन औपचारिक रूप से शुरू था। अगस्त 1928 में अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और समझौता हुआ। सरकार ने लगान वृद्धि रद्द कर दी और जांच समिति ‘मैक्सवेल-ब्रूमफील्ड कमिटी’ गठित की। कमिटी ने किसानों के पक्ष में रिपोर्ट दी। बारडोली आंदोलन पूरी तरह सफल रहा और यह भारतीय इतिहास में अहिंसक किसान आंदोलन का मॉडल बना। सरदार पटेल की रणनीति, संगठन क्षमता और नेतृत्व से कांग्रेस और राष्ट्रवादी आंदोलन को नई ताकत मिली थी। यह आंदोलन आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) का आधार भी बना। आंदोलन में महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी थी और इसने सामाजिक जागृति बढ़ाई। बारडोली सत्याग्रह ने साबित किया कि संगठित, अहिंसक प्रतिरोध से ब्रिटिश सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। यह किसान आंदोलनों में एक मील का पत्थर साबित हुआ और सरदार पटेल को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
सरदार पटेल के संगठित प्रयास से किसान आंदोलन जो जमीन मिली उसमें एक खास मजबूती थी। जाहिर है अगर खेड़ा सत्याग्रह किसान चेतना का आरंभ था, तो वहीँ बारडोली सत्याग्रह उसका उत्कर्ष था। सरदार पटेल ने इस आंदोलन को अत्यंत अनुशासन और सूझबूझ से संचालित किया था। साथ ही किसानों को जाति और धर्म से ऊपर उठाया गया था। इतिहासकार जूडिथ ब्राउन के अनुसार, “बारडोली सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे सुव्यवस्थित जन-आंदोलन था।” वजह थी बिना किसी हिंसा के विजय का हसिल होना। सत्याग्रह से अंग्रेज सरकार डरी और झुकते हुए लगान वृद्धि वापस ली। जब्त भूमि भी लौटाई। यह केवल एक आम विजय नहीं थी, बल्कि किसान आत्मसम्मान की ऐतिहासिक पुनर्स्थापना थी। सरदार पटेल बार-बार कहते थे, “जब तक भारत का किसान सशक्त नहीं होगा, तब तक भारत सशक्त नहीं हो सकता।”
आज का किसान पराली (फसल अवशेष) जलाने, रसायनों के उपयोग और बाजार की अनिश्चितता के बीच फँसा है। सरदार पटेल का दर्शन यहाँ तीन स्तरों पर काम करता है। मसलन, आत्मनिर्भरता- पटेल किसानों को केवल सरकार के भरोसे रहने के बजाय ‘स्वयं सहायता’ और संगठन की शक्ति सिखाते थे। आज के ‘किसान उत्पादक संगठन’ इसी विचार का विस्तार हैं। वहीँ, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन:- सरदार पटेल का मानना था कि खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। आज की ‘प्राकृतिक खेती’ उसी पारिस्थितिक संतुलन की वापसी है जिसकी वकालत पटेल करते थे। मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था:- पटेल का प्रसिद्ध कथन था— “जब तक भारत का किसान सशक्त नहीं होगा, तब तक भारत सशक्त नहीं हो सकता।” यह आज भी हमारी आर्थिक नीतियों का मूल मंत्र होना चाहिए।
सरदार पटेल और पर्यावरण के बीच का संबंध प्रत्यक्ष से अधिक ‘अप्रत्यक्ष और गहरा’ है। वे जानते थे कि एक किसान के लिए उसका पेड़, उसका पशु और उसकी मिट्टी ही उसकी असली पूंजी है। आज मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता के पीछे रासायनिक खाद का अंधाधुंध प्रयोग है। पटेल का ‘स्वदेशी’ और ‘स्वावलंबन’ का विचार हमें स्थानीय और जैविक खादों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है। सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के केवल राजनीतिक नायक नहीं थे, वे एक सामाजिक और पर्यावरणीय दूरद्रष्टा भी थे। उन्होंने मिट्टी की रक्षा के लिए संघर्ष किया और मिट्टी से जुड़े लोगों (किसानों) को स्वाभिमान दिया।
आज जब हम जलवायु परिवर्तन के दौर में साँस ले रहे हैं, तो पटेल की वह बात याद रखना जरूरी है कि “पेड़ लगाने से हमें ऑक्सीजन मिलती है, जो हमारे जीवन के लिए आवश्यक है।” वर्तमान सरकारें और नागरिक समाज मिलकर वृक्षारोपण और मृदा संरक्षण के जो प्रयास कर रहे हैं, वे वास्तव में सरदार पटेल के अधूरे सपनों को पूरा करने की दिशा में एक कदम हैं।
सरदार पटेल भारतीय किसान आंदोलन के मौन नायक और दृढ़ स्तंभ थे। सरदार पटेल ने किसानों को केवल शोषण के विरुद्ध खड़ा नहीं किया, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान, अनुशासन और राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराया था, तभी तो स्वतंत्रता आंदोलन में किसानों की भागीदारी बड़े पैमाने पर देखने को मिला था। आज के परिवेश में पर्यावरण को लेकर संघर्ष हर और चल रहा है। पर्यवरण की बदहाली की तवीर बदलने में हरियाली को तरजीह दी जा रही है। ऐसे में पेड़ों को नहीं काटने और पेड़ लगाने की बात सरदार वल्लभ भाई पटेल जिस दौर में करते थे वह आज भी प्रसांगिक है, उनकी बातों पर अमल किया जाना महत्वपूर्ण है। भारत की कृषि प्रधान संस्कृति को बचाने के लिए हमें पटेल की ‘संगठनात्मक शक्ति’ और उनके ‘प्रकृति प्रेम’ को एक साथ अपनाना होगा। तभी हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर पाएंगे जो न केवल आर्थिक रूप से सशक्त हो, बल्कि पर्यावरणीय रूप से भी सुरक्षित हो। सरदार पटेल के जन्मदिन (31 अक्टूबर) को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाना तभी सार्थक होगा जब हम प्रकृति और किसान के साथ भी अपनी एकता स्थापित करेंगे।
संदर्भ:-1-India’s Struggle for Independence – बिपिन चंद्र
2-Economic History of India – आर.सी. दत्त
3-सरदार पटेल के भाषण और संस्मरण
4-लौहपुरुष सरदार पटेल -विष्णु प्रभाकर और अंतरजाल।
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#सरदार पटेल पटेल की जयंती पर ख़ास














