यमुना का पानी पीने योग्य तो दूर, नहाने के मानकों पर भी नहीं

“दिल्ली में यमुना के पानी में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक, कई स्थानों पर BOD निर्धारित सीमा से 10 गुना तक अधिक” नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना नदी के प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है। नदी का पानी पीने योग्य नहीं है, बल्कि कई स्थानों पर इसकी स्थिति ऐसी है कि…

“दिल्ली में यमुना के पानी में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक, कई स्थानों पर BOD निर्धारित सीमा से 10 गुना तक अधिक”

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना नदी के प्रदूषण की समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है। नदी का पानी पीने योग्य नहीं है, बल्कि कई स्थानों पर इसकी स्थिति ऐसी है कि यह नहाने के निर्धारित मानकों पर भी खरा नहीं उतरता। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की सितंबर 2026 की निगरानी रिपोर्ट के आंकड़े यमुना में बढ़ते प्रदूषण की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। DPCC के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में यमुना के सात निगरानी स्थलों पर पानी की गुणवत्ता की जांच की गई। इनमें से तीन स्थानों पर पानी की गुणवत्ता में और गिरावट दर्ज की गई। ISBT ब्रिज पर जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) का स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया, जबकि अगस्त में यह 28 मिलीग्राम प्रति लीटर था। उल्लेखनीय है कि नहाने योग्य पानी के लिए BOD का स्तर 3 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे कम होना चाहिए। इस लिहाज से ISBT ब्रिज पर BOD का स्तर निर्धारित सीमा से दस गुना अधिक पाया गया।

नहाने के लिए भी तय हैं पानी की गुणवत्ता के मानक

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने नदी के पानी में स्नान के लिए कुछ निर्धारित मानक तय किए हैं। इनके अनुसार पानी में BOD का स्तर 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। घुलित ऑक्सीजन (DO) कम से कम 5 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए, जबकि फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 2,500 MPN प्रति 100 मिलीलीटर निर्धारित है। पानी का pH स्तर 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए।

ये मानक स्पष्ट करते हैं कि किसी नदी का पानी केवल देखने में साफ होने से नहाने के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उसमें मौजूद बैक्टीरिया और जैविक प्रदूषण भी उसकी गुणवत्ता निर्धारित करते हैं। जल शक्ति मंत्रालय की ओर से जुलाई 2025 में लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़े भी दिल्ली में यमुना की खराब स्थिति को उजागर करते हैं। जून 2025 के आंकड़ों के अनुसार, निजामुद्दीन में BOD का स्तर 40 मिलीग्राम प्रति लीटर और ओखला बैराज में 30 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया था। असगरपुर में यह स्तर 44 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गया था। इन सभी स्थानों पर BOD का स्तर नहाने के लिए निर्धारित 3 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा से काफी अधिक था।

निजामुद्दीन में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 7.90 लाख MPN प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया था, जबकि निर्धारित अधिकतम सीमा 2,500 है। यह आंकड़ा नदी में सीवेज और मलजनित प्रदूषण की गंभीरता को दर्शाता है।

स्वास्थ्य के लिए भी खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, सीवेज और जैविक कचरे से प्रदूषित नदी के पानी के संपर्क में आने से त्वचा संबंधी संक्रमण, आंखों में जलन और पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से फीकल कोलीफॉर्म की अधिक मात्रा पानी में मलजनित संदूषण का संकेत देती है। यमुना में प्रदूषण का बढ़ता स्तर केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौती भी है। ऐसे में नदी की सफाई के साथ-साथ नालों के जरिए गिरने वाले अनुपचारित सीवेज पर रोक लगाना और नियमित जल गुणवत्ता की निगरानी करना बेहद जरूरी है।

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

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उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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