प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(5)

“कचरा और खाली शराब की बोतलें: सुंदरता पर दाग” संजय कुमार / उत्तराखंड, अल्मोड़ा के पहाड़ी इलाकों में कई जगहों पर प्राकृतिक सुंदरता के बीच यात्रा करते समय कुछ दृश्य ऐसे भी दिखाई दिए, जिन्होंने मन को खिन्न किया। रास्ते में कई स्थानों पर कचरा और खाली शराब की बोतलें फेंकी हुई मिलीं। ये दृश्य…

“कचरा और खाली शराब की बोतलें: सुंदरता पर दाग”

संजय कुमार / उत्तराखंड, अल्मोड़ा के पहाड़ी इलाकों में कई जगहों पर प्राकृतिक सुंदरता के बीच यात्रा करते समय कुछ दृश्य ऐसे भी दिखाई दिए, जिन्होंने मन को खिन्न किया। रास्ते में कई स्थानों पर कचरा और खाली शराब की बोतलें फेंकी हुई मिलीं।

ये दृश्य पहाड़ों की खूबसूरती के बीच एक गंभीर विरोधाभास की तरह दिखें। एक ओर लोग दूर-दूर से पहाड़ों की स्वच्छ हवा, हरियाली और शांत वातावरण का आनंद लेने आते हैं, दूसरी ओर कुछ लोग वहीं प्लास्टिक, शराब बोतलें और अन्य कचरा छोड़ जाते हैं? जिस प्रकृति से हम मानसिक शांति प्राप्त करने पहुंचते हैं, उसी को अपने व्यवहार से नुकसान पहुंचाते हैं,खासकर स्थानीय लोगों को इससे ज्यादा पीड़ा होती है।

सड़क किनारे फेंका गया कचरा केवल देखने में बुरा नहीं लगता, बल्कि पर्यावरण के लिए भी समस्या पैदा करता है। प्लास्टिक लंबे समय तक पर्यावरण में बना रहता है। कांच की टूटी बोतलें लोगों और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाती हैं। खाद्य पदार्थों के अवशेष वन्यजीवों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। खुले में छोड़ा गया कचरा बारिश के पानी के साथ नालों और जलस्रोतों तक भी पहुंच रहा है। खाली शराब की बोतलें फेंकना भी गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है। पहाड़ी रास्तों पर कांच टूटने से दुर्घटना का खतरा बढ़ता है और प्राकृतिक स्थल गंदे होते हैं। यदि कचरा वन क्षेत्रों या उनके आसपास पहुंचता है, तो उसका प्रभाव जंगलों और वहां रहने वाले जीवों पर भी पड़ता है। इस समस्या का समाधान केवल प्रशासन या सफाई कर्मचारियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। प्रत्येक पर्यटक को अपने साथ निकलने वाले कचरे की जिम्मेदारी लेनी होगी। जहां कूड़ेदान उपलब्ध हों, उनका उपयोग करना चाहिए। अन्यथा कचरे को अपने साथ रखकर उचित निस्तारण स्थल तक ले जाना चाहिए।

प्रकृति में घूमने का एक सरल नियम होना चाहिए—जिस स्थान पर हम जाएं, उसे अपने आने से पहले की तुलना में अधिक गंदा न छोड़ें। यदि हर पर्यटक इस नियम का पालन करे, तो पहाड़ों की स्वच्छता बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया जा सकता है।….जारी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

हमें आप लिख सकते हैं …आप हमें  📩 ईमेल करें: ilovesparrow68@gmail.com

🐦 आपकी भागीदारी जरूरी है: अगर आपके पास गौरैया और पर्यावरण संरक्षण संरक्षण से जुड़े अनुभव, प्रेरक कहानियाँ, कविताएँ, गीत या शोधपरक आलेख हैं, तो हमें ज़रूर भेजें।

www.ilovesparrow.com वेबसाईट का उद्देश्य साफ़ है घर -घर गौरैया संरक्षण की पहल हो..साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो।

सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन