संजय कुमार / गौरैया प्रजनन काल (मुख्यतः मार्च से अगस्त) में ही घोंसला बनाती गौरैया या अन्य पक्षी घोंसला तभी बनाते हैं जब उन्हें अंडे देने और परिवार बढ़ाने होते हैं। सामान्यतः गौरैया सहित अधिकांश पक्षी दिन में पेड़ों या अन्य सुरक्षित ठिकानों पर आराम करते हैं और वहीं रात भी गुजारते हैं, जबकि घोंसले का उपयोग मुख्य रूप से प्रजनन काल के लिए किया जाता है।
घोंसला बनाम बसेरा – दो अलग-अलग व्यवहार है : घोंसला (Nest) – सिर्फ प्रजनन के लिए : गौरैया प्रजनन काल (मुख्यतः मार्च से अगस्त) में ही घोंसला बनाती है। घोंसला बनाने में नर-मादा दोनों लगते हैं। इसमें सूखी घास, पंख, कागज, धागे और रुई जैसी मुलायम चीजें इस्तेमाल होती हैं। अंडे सेने, बच्चों को पालने और उनके उड़ने लायक होने तक ही घोंसले का उपयोग होता है। बच्चों के उड़ जाने के बाद अक्सर घोंसला छोड़ दिया जाता है।
बसेरा यानि मामला रोज आराम करने का है: बाकी पूरे साल गौरैया सहित अधिकांश चिड़ियाँ घोंसले में नहीं रहतीं। वे दिन में भोजन की तलाश के बाद दोपहर में किसी घने पेड़, झाड़ी, बिजली के तारों या छत की ओट में सुस्ताती हैं और रात को सामूहिक रूप से किसी सुरक्षित घने पेड़, झुरमुट या झाड़ी में एक साथ इकट्ठा होकर सोती हैं। इसे ‘बसेरा’ कहा जाता है। इसलिए अगर हम गौरैया को बचाना चाहते हैं तो सिर्फ कृत्रिम घोंसले लगाना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उन्हें दिन में आराम और रात में सोने के लिए घने झाड़ी वाला पेड़ – जैसे नीम, पीपल, बबूल,मालती,वेगनवेलिया, करंज आदि के पेड़ लगाने की जरूरत है साथ ही झाड़ियों को भी बचाना होगा, जहाँ वे सुरक्षित महसूस कर सकें। कुछ गौरैया घर-आँगन में रौशनदान, पंखे के कप,जहाँ भी जगह मिले रात गुजार लेती है।














