संजय कुमार / बचपन में चिड़ियाँ मतलब दो ही पक्षी होते थे – गौरैया और कौआ। अंग्रेजी में क्रमश: हाउस स्पैरो और हाउस क्रो। दोनों ही ‘हाउस’ पक्षी यानि कि घरेलू जैसे। कौआ हमें बचपन में शायद उतना नहीं लुभा पाया, जितनी नन्ही गौरैया ने। कारण चाहे जो भी हो – कौए की कांव-कांव हो या उसका झपट कर खाने का व्यवहार या गौरैये के बच्चों पर उसका जानलेवा हमला। नन्ही गौरैया शायद ज्यादा करीब थी क्योंकि हमने उसे अपने नानी-दादी के इर्द-गिर्द पाया – चावल फटकने के से अलग हुए खुद्दी पर मुंह मारने के लिए। समय बीतता गया, अनाज फटकने के लिए न तो नानी-दादी रही और ना हीं हमें समय रहा इन गौरैयों पर नजर रखने का। शहर में रहने लगा और पर्यावरण की बात सुनने लगा और इंडिकेटर स्पीशीज के बारे में जाना, तब पता चला की हमारी हाउस स्पैरो तो हमारे आस-पास है ही नहीं। समझ आया कि हमारे घर और घर के माहौल बदल चुके हैं। गौरैया का हमसे एक रिश्ता हमारे घर एवं आसपास में उसके पसंदीदा माहौल के कारण था। बदला माहौल गौरैया को रास नहीं आया, और वह हमसे मुँह मोड़ने लगी। न सिर्फ हमारे देश में बल्कि अन्य देशों में भी इसकी उप-प्रजातियों के सामने यही संकट था। गौरैया की ऐसी स्थिति क्यों हुई इसके कई कारण सामने आए, इनमें कुछ तो यक़ीनी हैं लेकिन कई ऐसे भी हैं जो अनुमान पर आधारित हैं।
सवाल यह भी उठता है कि क्या सच में गौरैया विलुप्ति की ओर बढ़ रही थी या अभी बढ़ रही है? इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर (आई.यू.सी.एन.) के रेड-लिस्ट को देखने पर यह बात साफ होती है कि गौरैया की संख्या में कमी जरुर हो रही है, लेकिन यह लुप्तप्राय या संकटग्रस्त नहीं है। यह जरुर है कि अब यह सिर्फ उन्हीं जगहों पर दिखती है जहाँ इसके लिए सही अधिवास है। शहरी क्षेत्र में इसके अधिवास में चिंतनीय क्षरण जरुर हुआ है, लेकिन गावों में स्थितियां बेहतर हैं। शहरों में भी गौरैया के लिए माकूल माहौल बने तो बड़ी आसानी से आज के अपार्टमेंट-चलन में भी यह पुन: हमारी साथी बन सकती है। साथी कैसे बनेगी या गौरैया की घर वापसी कैसे होगी, हर ओर पहल जारी है । सकारात्मक प्रयासों से तस्वीर बदली है आज गौरैया संरक्षण में जुटे लोगों के प्रयास से घरों में गौरैया की घर वापसी हो रही है ।













