संशोधित पीएम उत्सर्जन मानकों की समय-सीमा 1 अक्टूबर तक बढ़ी

दिल्ली-एनसीआर के उद्योगों को राहत नई दिल्ली, 31 जुलाई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और आसपास के क्षेत्रों के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने दिल्ली-एनसीआर के उद्योगों को बड़ी राहत देते हुए संशोधित पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) उत्सर्जन मानकों के कार्यान्वयन की समय-सीमा बढ़ा दी है। आयोग ने अपने वैधानिक निदेश संख्या-98 में संशोधन करते…

दिल्ली-एनसीआर के उद्योगों को राहत

नई दिल्ली, 31 जुलाई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और आसपास के क्षेत्रों के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने दिल्ली-एनसीआर के उद्योगों को बड़ी राहत देते हुए संशोधित पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) उत्सर्जन मानकों के कार्यान्वयन की समय-सीमा बढ़ा दी है। आयोग ने अपने वैधानिक निदेश संख्या-98 में संशोधन करते हुए अब 50 mg/Nm³ के संशोधित पीएम उत्सर्जन मानकों को 1 अक्टूबर 2026 से लागू करने का निर्णय लिया है।

सीएक्यूएम के अनुसार यह फैसला केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की सिफारिशों तथा उद्योगों एवं औद्योगिक संगठनों से प्राप्त अभ्यावेदनों पर विचार करने के बाद लिया गया है। इससे पहले 20 फरवरी 2026 को जारी निदेश संख्या-98 के तहत दिल्ली-एनसीआर के चिन्हित उद्योगों के लिए 50 mg/Nm³ का एक समान और कड़ा पीएम उत्सर्जन मानक निर्धारित किया गया था। यह मानक सीपीसीबी की तकनीकी सिफारिशों और आईआईटी कानपुर के अध्ययनों के आधार पर तय किया गया था।

आयोग ने स्पष्ट किया कि संशोधित उत्सर्जन मानक तकनीकी रूप से पूरी तरह संभव हैं और क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण कम करने तथा वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक हैं। हालांकि, कार्यान्वयन के दौरान उद्योगों ने एयर पॉल्यूशन कंट्रोल डिवाइस (एपीसीडी) की खरीद और स्थापना में लगने वाले अतिरिक्त समय, पर्याप्तता आकलन करने वाली एजेंसियों की सीमित उपलब्धता तथा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की क्षमता जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित किया था।

सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (एसपीसीबी) और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के साथ मिलकर अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल विकसित करने, एपीसीडी की स्थापना और रेट्रोफिटिंग की निगरानी तथा समय-समय पर समीक्षा जैसे कदम भी उठाए। इन परिस्थितियों को देखते हुए सीपीसीबी ने समय-सीमा बढ़ाने की सिफारिश की थी।

सीएक्यूएम ने कहा कि सीमित अवधि का यह विस्तार केवल उद्योगों को आवश्यक एपीसीडी की स्थापना, रेट्रोफिटिंग और परीक्षण पूरा करने का अवसर देने के लिए किया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि 20 फरवरी 2026 को जारी निदेश संख्या-98 के अन्य सभी प्रावधान और शर्तें पूर्ववत लागू रहेंगी, जबकि संशोधित उत्सर्जन मानकों का पूर्ण अनुपालन 1 अक्टूबर 2026 से अनिवार्य होगा। इससे औद्योगिक उत्सर्जन में कमी लाने और दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

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उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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