‘सोनकंठी गौरैया’

संजय कुमार / ‘सोनकंठी गौरैया’ की कहानी कुछ अलग ही है। बिहार के मुंगेर में इसे बड़े झुंड में देखकर पक्षी प्रेमी उत्साहित हैं। यह भारत में दिखती तो है लेकिन इसकी पहुंच हमारी पारम्परिक घरेलू गौरैया की तरह घरों तक नहीं है। हां, इसे छत्तीसगढ़, बस्तर और उड़ीसा  आदि के जंगलों में कभी कभार…

संजय कुमार / ‘सोनकंठी गौरैया’ की कहानी कुछ अलग ही है। बिहार के मुंगेर में इसे बड़े झुंड में देखकर पक्षी प्रेमी उत्साहित हैं। यह भारत में दिखती तो है लेकिन इसकी पहुंच हमारी पारम्परिक घरेलू गौरैया की तरह घरों तक नहीं है। हां, इसे छत्तीसगढ़, बस्तर और उड़ीसा  आदि के जंगलों में कभी कभार जरूर देखा जाता रहा है। वे झाड़ियों में सामूहिक रूप से बसती हैं। इसे ‘सोनकंठी गौरैया’ (पेट्रोनिया) कहते हैं, यानी इसके गले में सोने के रंग की मोटी धारी या धब्बा होता है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘जिम्नोरिस जैथोकोलिस’ है। इसकी चोंच जीनस  पासर  की विशिष्ट गौरैयों की तुलना में महीन होती है और उनके विपरीत पंखों पर कोई धारियाँ नहीं होती हैं। कंधे पर सफेद डबल विंग, ग्रे-ब्राउन होता है। गले पर हल्का पीला धब्बा होता है। मादा सोनकंठी गौरैया सुस्त होती हैं। मादा गौरैया में पीला धब्बा नर गौरैया के तुलना में बहुत कम होता है। यह प्रजाति वृक्ष-प्रेमी है, हालांकि कभी-कभी तारों और जमीन पर देखी जाती है, जहां फुदकती मिलती है। सामान्य तौर पर इसकी आवाज एक  चिरप है, लेकिन गीत के लहजे में सुने तो विशिष्ट और दोहराव वाला चिलप.. चल्प.. चॉल्प.. होता है। इसकी उड़ान ख़ास होती है। सोनकंठी गौरैया प्रजाति अप्रैल से जुलाई तक पेड़ों के खोखले में घोंसला बना कर प्रजनन करती है, अक्सर बार्बेट  और  कठफोड़वा पक्षी के घोंसले का प्रयोग करती है। वे इमारतों पर बने खोह या होल का भी उपयोग करती हैं। घोंसला मुख्य रूप से मादा द्वारा बनाया जाता है, लेकिन नर कभी-कभी सहायता करते हैं। मादा द्वारा अंडे देने के लगभग 12 से 14 दिनों के बाद बच्चे बहार निकलते हैं। 

पक्षी प्रेमियों के बीच इसे ‘भारत के पक्षीमैन डॉ. सलीम अली की गौरैया’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे की कहानी यह है कि शिकार के क्रम में एक बार 1908 में डॉ सलीम अली (तब-तक वे शिकारी थे पक्षी प्रेमी या पक्षी वैज्ञानिक नहीं बने थे) ने इसे मार गिराया था, लेकिन बाद में जब उन्होंने इसके बारे में जाँच-पड़ताल की तो, इसे दुर्लभ प्रजाति की चिड़िया के रूप में पाया। उनकी किताब ‘फॉल ऑफ़ स्पैरो’ में इसका विस्तार से जिक्र मिलता है, जहां वे बताते हैं कि किस तरह उन्होंने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से सम्पर्क किया और सोसाइटी के अवैतनिक सचिव डब्ल्यू एस मिलार्ड ने इसकी पहचान दुर्लभ सोनकंठी गौरैया यानी ‘पेट्रोनिया जैंथोकोलिस’ (Petronia Xanthocollis) के रूप में की और बताया कि यह दक्षिणी एशिया में पायी जाती है।

बीते 2 अप्रैल 2023 को यह दुर्लभ ‘सोनकंठी गौरैया’ बिहार में मुंगेर के भीम बांध पर एक ही दिन (2 अप्रैल 2023) में सैकड़ों की संख्या में देखी गयी। पक्षी प्रेमियों के लिए यह खबर खासी रोमांचित करने वाली थी। क्योंकि, जहां एक ओर घरेलू गौरैया का दिखना लगातार कम होता गया हो और उसकी वापसी के लिए लगातार प्रयास हो रहे हों, ऐसे में सोनकंठी गौरैया का सैकड़ों यानि 700 से भी अधिक संख्या में एक ही स्थान (मुंगेर के भीम बांध) पर देखा जाना अद्भुत संयोग है। इस सब से उत्साहित बर्ड वाचर एवं बिहार के पक्षीमैन से चर्चित अरविंद मिश्रा करते हैं अच्छी बात यह है कि लोग अब जागरूक हो रहे हैं और पक्षियों को जाने पहचाने और देखने के प्रति काम करने की सक्रियता बढ़ी है या कह सकते हैं कि बर्ड वॉचर्स बढ़ गए हैं। इनमें युवाओं की संख्या ज्यादा है। मुंगेर के आलावा कई जगहों पर इसका दिखना दर्शाता है कि बर्ड वाचर बढ़ गए हैं और चीजें सामने आ रही है। इसे हमारे पक्षी संरक्षण अभियान से जुड़े कुछ युवकों ने सबसे पहले देखा। वे बताते हैं कि पीले गले वाली यह गौरैया या चेस्टनट-कंधे वाली पेट्रोनिया दक्षिण एशिया की प्रमुख पक्षी है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘जिम्नोरिस जैथोकोलिस’ है और यह ‘जिम्नोरिस वंश’ की जीव वैज्ञानिक जाति से है।

पटना विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व छात्र निशांत रंजन के नेतृत्व में संचालित ‘एनवायरनमेंट वारियर्स’ तथा गौरैया संरक्षण पर सक्रिय संजय कुमार की ‘हमारी गौरैया’ टीम के द्वारा विलुप्ति के कागार पर पहुंच चुकी ‘घरेलू गौरैया’ और ‘पीले कंठ वाली गौरैया’ को बिहार में खोज कर, संरक्षित करने का प्रयास पिछले कई वर्षों से किया जा रहा है। इन्हें देखे जाने की ताजा सूचना पर 2 अप्रैल 2023 को टीम के सदस्य आशुतोष कुमार, वतन कुमार ने संजय कुमार और निशांत रंजन के निर्देशन में मुंगेर के भीमबांध वन क्षेत्र के टोला चोरमार, टोला बसिया, गुमला आदि क्षेत्र में एक साथ लगभग 700 की संख्या में पीले कंठ वाली गौरैया’ को देखा और पहचान की है। जो इस पक्षी के संरक्षण के लिए बहुत बड़ी ख़बर है। एनवायरनमेंट वारियर्स की उपाध्यक्ष अदिति रॉय ने बताया कि जल्द ही क्षेत्र का सघन अध्ययन कर, इस पक्षी को संरक्षित करने का व्यापक प्रयास किया जायेगा।

पीले कंठ वाली गौरैया प्रजाति को सर्वप्रथम खोजने का श्रेय ‘बर्ड मैन ऑफ इंडिया’ डॉ सलीम अली को जाता है। इसका नामकरण करने का काम श्री मिलार्ड ने किया था। बिहार के बर्डमैन अरविंद मिश्रा ने सर्वप्रथम मध्यप्रदेश के कान्हा के जंगल में इसे देखा था। पक्षियों के संरक्षण के लिए दुनिया की सबसे बड़ी संस्था इंग्लैंड की ‘रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड’ के पक्षी वैज्ञानिक डॉ. पॉल डोनाल्ड तथा अरविंद मिश्रा ने अप्रैल 2014 में पूर्णिया के सिंधिया वन क्षेत्र में इस पक्षी को बिहार में पहली बार देखा था। पुनः फरवरी 2022 में जमुई के गरही डैम तथा जून 2022 में बक्सर के गोकुल डैम में इसे देखा गया, लेकिन तब इनकी संख्या काफी कम थी। हालांकि, लगातार गौरैया की खोज के क्रम में एनवायरनमेंट वारियर्स के राहुल मण्डल ने 4 मार्च 2023 को सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार, गया कैंपस में भी कुछ सोनकंठी गौरैया को देखा।

बक्सर में तो अरविन्द मिश्रा ने अपने कैमरे में इस दुर्लभ पक्षी को कैद भी किया। विलुप्त सोनकंठी गौरैया से इस मुलाकात से खासे उत्साहित अरविंद मिश्रा कहते हैं कि, ‘संकल्प मन में हो तो सपने बार-बार भी पूरे होते हैं और  एक  नन्ही  सी  जान  भी  जिन्दगी  का  मकसद  बदल देती है’।

सोनकंठी गौरैया को हिंदी में राजी, जंगली चिड़िया या ललकंधा गौरैया भी कहा जाता है। मादा राजी के कंठ में पीलापन बहुत हल्का होता है, मगर इसकी चोंच घरेलू गौरैया से थोड़ी बड़ी और नुकीली होती है और नर पक्षी की चोंच प्रजनन काल में काली हो जाती है। सोनकंठी गौरैया की प्रजाति वृक्ष-प्रेमी होती है। हालांकि, कभी-कभी इसे तारों और जमीन पर भी देखा गया है। तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित संभवतः म्यांमार के कुछ हिस्सों में भी यह पाई जाती है।

भारत के कई हिस्सों में देखी जरूर जाती है, लेकिन यह घरेलू नहीं है। जंगल झाड़ ही इसकी पसंद हैं, इसलिए इसे सहज देखा जाना उतना आसान नहीं है बर्ड वाचर लगातार इस पर नजर गड़ाए हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के संजय साहू बताते हैं, “सोनकंठी यानि जंगली गौरैया हमारे प्रदेश में पिछले कई वर्षों से हैं। यहां के लोग इसे स्थानीय भाषा में ‘बगरेला’ के नाम से जानते हैं। अमूमन ये जंगल के पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं लेकिन अपने अभियान के तहत पिछले तीन साल से हम घरेलू गौरैया के लिए मिट्टी का बना जो घोंसला घरों में लगा रहे हैं, उसमें भी ये वाली गौरैया सिल्वर बिल पक्षी के साथ-साथ घोंसला बनाने लगे। महासमुंद जिले के आमाकोनी और खल्लारी गांवों में ऐसे कई घोसले भी मिले और तालाब के किनारे और पानी की टंकी के आसपास भी इन्हें घर बनते देखा गया। इनकी प्रकृति की पड़ताल की गयी तो देखने में आया कि यह जंगली गौरैया अंडों से लेकर बच्चों तक का समय इस मिट्टी के बने घोंसलों और इन ठंडी जगहों में बिताती है। हर साल ये अपना घोंसला मार्च के आखिरी दिनों से शुरू कर पूरा गर्मी कभी भी बनाते हैं। यह प्रजाति अप्रैल से जुलाई तक पेड़ों के खोखले में प्रजनन करती है, अक्सर प्राथमिक छेद- घोंसले के शिकार पक्षियों जैसे बार्बेट और कठफोड़वा द्वारा बनाए गए छिद्रों का उपयोग करती है। इमारतों पर खोखली जगह, झाड़ियां इन्हें पसंद आते हैं जहां ये समूह में रहना पसंद करते हैं। ये मुख्य रूप से अनाज पर निर्भर हैं, लेकिन कीड़े का भी सेवन करते हैं। मधुका इंडिका जैसे फूलों की पंखुड़ियां भी इनकी खाद्य रुचियों में हैं। वहीं, जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया, पटना के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर गोपाल शर्मा कहते हैं कि बिहार में सोनकंठी गौरैया का झुंड में मिलना आश्चर्य की बात है, लेकिन यह अमूमन जंगली इलाकों में देखी जाती है। यह प्रजनन के लिए अप्रैल से जुलाई तक घोंसलों की खोज में रहती है। इसे घोंसला बनाने नहीं आता, पेड़ों के खोह में अंडे देती है। ऐसे में जंगली इलाकों में इंसान के घरों में कृत्रिम घोंसला  या जगह मिलने पर अंडे देती है। यह परिवर्तनशील भी है। एक जगह से दूसरी जगह जाती रहती है।

इतिहास गवाह है कि इसी सोनकंठी गौरैया ने डॉ सलीम अली की दुनिया बदल दी थी, जब वह ‘पक्षी शिकारी’ से महान पक्षी विशेषज्ञ बन गए। डॉ. सलीम अली फ़ॉल ऑफ स्पैरो में लिखते हैं, इस सोनकंठी गौरैया की घटना ने मेरे जीवन में ऐसे रास्ते खोल दिए जिसकी मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। और, फिर मेरे अध्ययन की दिशा, प्राकृतिक इतिहास की पुस्तकों, विशेषकर पक्षियों से जुड़ी पुस्तकों की ओर अग्रसर हुई। उन दिनों ही क्यों उसके बाद अनेक वर्षों तक भारतीय पक्षियों पर सचित्र पुस्तकें लगभग नहीं के बराबर थी। लेकिन, इसमें कोई संदेह नहीं कि पक्षियों में मेरी गहरी रूचि का श्रेय उस रहस्यमयी ‘सोन चिरैया’ यानी सोनकंठी गौरैया को जाता है, जिसने मेरी दुनिया ही बदल दी।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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