संजय कुमार / गाय और गोबर का संबंध गौरैया संरक्षण में अति महत्वपूर्ण है। जहां गाय और गोबर होगा वहाँ गौरैया होगी बल्कि दिखती है। वजह हैं, गौरैया गाय के गोबर से निकले अपचे भोजन को तो खाती ही है, बाद में जब वह सड़ जाता है तो उसमें से जो निकलने वाले कैटरपिलर्स यानी पिल्लू को अपने बच्चों को खिलाती है। यह प्रोटीन का बड़ा स्रोत भी होता है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, पटना का वैज्ञानिक डॉ गोपाल शर्मा और मंदार नेचर क्लब भागलपुर के संयोजक एवं पक्षी विशेषज्ञ अरविन्द मिश्रा की माने तो गाय, गोबर और गौरैया का संबंध पुराना है वे बताते हैं कि जहां गाय होगी गौरैया आएगी। जहाँ गायें रहती है वहां पड़े गोबर के पास गौरैया आहार ढ़ूंढती दिखती है। गोबर से निकलने वाले कीड़े एवं अपचे अनाज को वह अपने बच्चों को खिलाती है। गौरैया खेत-खलिहान-बथान-खटाल में से अपना आहार ढूंढ लेती है। कीटनाशकों के भारी प्रयोग से सब्जियों से कीड़े गायब हो रहे हैं। इससे गौरैया के बच्चे को पर्याप्त आहार नहीं मिल रहा है। धान-चावल से बड़ी गौरैया अपना पेट तो भर लेती है लेकिन अपने बच्चों के लिए कीड़े ढूंढती है। खेत-खलिहान-खटाल में कीड़े मिल जाते हैं।

जब से फसल और साग सब्जी कि पैदावार में कीटनाशक का प्रयोग होने लगा है। कीड़े खत्म हो रहे हैं। गौरैया को अपने बच्चों के लिए को प्रोटीनयुक्त आहार नहीं मिल पाता है तो ऐसे में अपने बच्चों के आहार के लिए गौरैया गोबर के पास आहार ढूंढते दिखती है। खास कर मार्च से जून तक तो देखा ही जा रहा है। जब तक बच्चे खुद से खाना शुरू नहीं कर देते तब तक गौरैया खुद से खिलाती है खासकर पिल्लू लाकर खिलाती हैं। गाँवों में सहज ही गौरैया को अपने बच्चे के लिए खेत-खलिहान-बथान-खटाल से पिल्लू मिल जाता है।
शहरों में थोड़ी परेशानी है फिर भी कई लोग घरों में गाय पालते हैं कई जगह खटाल चलते हैं। वहाँ गौरैया निश्चित दिख जाती है। मेरे घर के पास गाय के खटाल में सुबह शाम गौरैया को अपने बच्चों के साथ आहार के लिए देखता रहता हूं। अपने बच्चों के लिए गोबर से निकलने वाले कीड़े को या उसमें पड़े अनाज को वह ले जाती है। वैसे घरेलू गौरैया इंसानों के घरों में बसेरा रखने से इंसानों के यहाँ रखे अनाज को अपना आहार आसानी से बनाती हैं। घर-आंगन में गिरे अनाज को खाने के लिए गौरैया फुदकती हुई झुण्ड में आती है और दाना चुगती है। लेकिन शुरू में बच्चे को पिल्लू खिलाती है।
गोबर के आलवे भी पेड़ –पौधों पर लगे कीड़ो को ढूंढती रहती है। गौरैया अपने छोटे बच्चे को पिल्लू के साथ साथ पौधे की टुसी कोमल पत्ते भी खिलाती है। कई बार ऐसा करते हुये देखा हूँ। कोमल पत्ते को तोड़ कर घोंसले में ले जाती है और बच्चे को खिलाती है। इसके लिये पेड़ पौधे का चयन खुद करती है। इस मामले में उसका अपना विज्ञान काम करता है।
धान-चावल-घास के बीज आदि से बड़ी गौरैया अपना पेट तो भर लेती है लेकिन अपने बच्चों के लिए कीड़े ढूंढती रहती है। बच्चे जब उड़ने लगते हैं तब गाय-गोबर के पास गौरैया को अकसर झुण्ड में भी देखा। अगर एक आती है तो कुछ ही देर में कई और आ जाती हैं। बच्चे घोंसले से निकल आसमान में अपने माँ पापा के संग उड़ने लगते हैं तब ये अक्सर झुंड में होते हैं। माँ- पापा गौरैया अपने साथ आहार वाले जगह पर ले जाते हैं, खासकर खटाल-बथान जहां गाय और गोबर का ढेर पड़ा रहता है। कीड़ो को पकड़ खिलाती तो है ही साथ ही सिखाती भी है। एक दो खिलाने के बाद खुद से खाने के लिए उकसाती है लेकिन बच्चा पंख फैला कर चीं चीं कि आवाज के साथ खाना मांगता है, तो माँ-पापा गौरैया
हटते जाते हैं या चोंच से हटाते हैं फिर भी जब वह नहीं मानता तब फुर्र से उड़ जाते हैं ताकि बच्चा जीवन के पाठशाला में खुद से पढ़ाई करना सीख ले।













