(विश्व पर्यावरण दिवस 2026 : 5जून)
संजय कुमार/ आज पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वैश्विक संकट बन चुका है। इसके प्रभाव केवल प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, कृषि, जल स्रोत, वनस्पति और जीव-जंतु सभी प्रभावित हो रहे हैं। लगातार बदलते मौसम, वैश्विक तापमान में वृद्धि, असामान्य सर्दी और बारिश, हीटवेव, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं पर्यावरण की तस्वीर को लगातार बिगाड़ रही हैं। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन पर चिंतन और इसके खिलाफ कार्रवाई अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन गई है। जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने जिस खतरे की ओर ध्यान खींचा है, वह केवल तापमान बढ़ने की खबर नहीं है बल्कि मानव सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण आधार कृषि और खाद्ध सुरक्षा पर मंडराता संकट है।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की थीम भी “जलवायु कार्रवाई है” इसी आवश्यकता पर केंद्रित है। इस वर्ष का मेजबान देश अज़रबैजान है और समारोह का आयोजन बाकू शहर में होगा। विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत 1973 में संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हुई थी, ताकि दुनिया भर में लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके। हर साल 5 जून को यह दिवस मनाया जाता है और यह अब दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरणीय अभियानों में से एक बन चुका है। इसमें 150 से अधिक देश सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। अज़रबैजान ने अपनी प्राकृतिक विरासत की रक्षा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। देश का 10 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षण में रखा गया है, जिसमें राष्ट्रीय उद्यान और रिजर्व शामिल हैं। यह उदाहरण विश्व समुदाय को प्रेरित करता है कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा संभव है यदि नीतियां और प्रयास दृढ़ हों।
जलवायु परिवर्तन और भारत
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के प्रति भारत अत्यधिक संवेदनशील देश है। इसकी भौगोलिक विविधता और कृषि पर निर्भरता इसे इस संकट की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत कृषि आज भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का पैटर्न बदल गया है। कहीं अत्यधिक सूखा पड़ रहा है तो कहीं अचानक बाढ़ आ रही है। इससे किसानों की आय पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है और देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में है।
तापमान वृद्धि के कारण गेहूं, धान और अन्य मुख्य फसलों की उत्पादकता में गिरावट आ रही है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों का प्रवाह प्रभावित होगा। इसके अलावा, हीटवेव की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की तीव्रता और आवृत्ति भी बढ़ रही है। यह सभी संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की कोई अदृश्य समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान की कड़वी वास्तविकता बन चुकी है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव हैं। प्रत्यक्ष प्रभाव में चरम मौसम की घटनाएं जैसे बाढ़, सूखा, हीटवेव और चक्रवात शामिल हैं। अप्रत्यक्ष प्रभाव में खाद्य सुरक्षा पर असर, पानी की कमी, समुद्री जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन, मानव स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान शामिल हैं। भारत में गर्मी की लहरें साल-दर-साल बढ़ रही हैं, जिससे सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं। वहीं कृषि उत्पादन में गिरावट, जल संकट और ऊर्जा की मांग में वृद्धि जैसी समस्याएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं।
समाधान और कार्रवाई
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल और दीर्घकालीन उपाय आवश्यक हैं। किसानों को कम पानी में उगने वाली और गर्मी सहन करने वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके साथ ही ड्रिप सिंचाई जैसी जल संरक्षण तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।
शहरों में कंक्रीट की अधिकता कम करने के लिए ग्रीन बेल्ट और हरित क्षेत्रों का विस्तार आवश्यक है, ताकि ‘अर्बन हीट आइलैंड’ के प्रभाव को कम किया जा सके। वनों की कटाई पर रोक लगाना और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना भी महत्वपूर्ण है। पानी की बर्बादी रोकना, सिंगल-यूज प्लास्टिक का त्याग करना और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाना हर नागरिक की जिम्मेदारी बन गई है।
साथ ही, सरकारों को नीतिगत स्तर पर हरित ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कटौती, कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय शिक्षा पर जोर देना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इसके प्रभाव सीमाओं में बंधे नहीं हैं।
भारत का दृष्टिकोण और वैश्विक भूमिका
भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश ने नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और हरित परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है।
फिर भी, भारत के लिए यह चुनौती दोगुनी है। उसे पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ करोड़ों लोगों को गरीबी और बेरोजगारी से बाहर निकालने के लिए आर्थिक विकास भी करना है। यदि समय रहते वैश्विक स्तर पर और घरेलू स्तर पर कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की समस्या नहीं है, बल्कि हमारी वर्तमान वास्तविकता है। विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की थीम “जलवायु कार्रवाई है” इस संदेश को उजागर करती है कि प्रत्येक व्यक्ति, समाज और सरकार को मिलकर कदम उठाने होंगे। छोटे-छोटे प्रयास जैसे जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक कम करना, ऊर्जा की बचत और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही कुछ कड़े कदम भी उठाने होंगे जैसे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध। देखा जाये तो भारत में 1 जुलाई 2022 से पर्यावरण को बचाने के लिए सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। इन वस्तुओं का उपयोग एक बार करके फेंक दिया जाता है और ये आसानी से नष्ट नहीं होते हैं, प्रतिबन्ध के बावजूद देश भर में इनका इस्तेमाल हो रहा है।
हमारा वर्तमान ही भविष्य की नींव है। अगर हम अब जिम्मेदारी से कदम उठाएं और पर्यावरण की रक्षा के लिए जागरूक हों, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी सुरक्षित और जीवन योग्य बनी रहेगी। भारत और विश्व समुदाय को मिलकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी, तभी यह वैश्विक संकट हल किया जा सकता है।
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