“संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने जिस खतरे की ओर ध्यान खींचा है, वह केवल तापमान बढ़ने की खबर नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के सबसे महत्त्वपूर्ण आधार- कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट है।”
नृपेंद्र अभिषेक नृप/ धरती जब सूरज के ताप से झुलसने लगे, तब केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन का पूरा संतुलन डगमगाने लगता है। कभी जेठ की दोपहर ऋतु का स्वाभाविक स्वभाव मानी जाती थी। मगर आज वही तपती दोपहर भीषण गर्मी का पर्याय बनती जा रही है। खेतों की नमी सूख रही है, नदियों का जल सिकुड़ रहा है, पेड़ों की हरियाली पीली पड़ती जा रही है और किसानों के चेहरे पर भविष्य की चिंता की गहरी रेखाएं उभर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ने जिस खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, वह केवल तापमान बढ़ने की खबर नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के सबसे महत्त्वपूर्ण आधार कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराता संकट है। लु चलना अब एक मौसमी घटना नहीं रही, बल्कि वह धीरे-धीरे समाज, रोजगार और मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह संकट अधिक चिंताजनक है। यहां करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है। खेत केवल अन्न नहीं उगाते, वे गांवों की अर्थव्यवस्था, परिवारों की उम्मीदें और समाज की स्थिरता को भी जीवित रखते हैं। जब तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर पहुंच जाता है और लू के थपेड़े लगातार कई दिनों तक चलते हैं, तब सबसे पहले खेत प्रभावित होते हैं। मिट्टी की नमी समाप्त होने लगती है। फसलों का विकास रुक जाता है और उत्पादन में भारी गिरावट आने लगती है। विशेष रूप से धान जैसी फसलें अत्यधिक तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। यही कारण है कि भारत में धान की पैदावार पर बड़े खतरे की आशंका जताई गई है।
भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कभी मार्च-अप्रैल तक सुहावना रहने वाला मौसम अब फरवरी के अंत से ही गर्म होने लगता है। कई राज्यों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लू की तीव्रता हर वर्ष बढ़ रही है। इसका सबसे गहरा असर खेती पर पड़ रहा है। गेहूं की फसल समय से पहले पकने लगती है, दाने का आकार छोटा हो जाता है और उत्पादन घट जाता है। धान की खेती में पानी की आवश्यकता अधिक होती है, लेकिन बढ़ती गर्मी और बारिश कम होने के कारण जल संकट गहराता जा रहा है। जब खेतों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता, तब किसानों की पूरी मेहनत कुछ ही दिनों में बर्बाद हो जाती है। पहले किसान मौसम के संकेतों को देख कर खेती की योजना बना लेते थे, लेकिन अब मौसम की अनिश्चितता ने अनुभव और परंपरा दोनों को चुनौती दे दी है। यही कारण है कि खेती धीरे-धीरे जोखिम भरा व्यवसाय बनती जा रही है।
अत्यधिक गर्मी के कारण दुनिया भर में करोड़ों कार्य घंटे प्रभावित हो रहे हैं। भारत में यह स्थिति और गंभीर है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी खुले वातावरण में काम करती है। खेतों, निर्माण स्थलों और फैक्टरियों में काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। जब गर्मी असहनीय हो जाती है, तब काम के घंटे घट जाते हैं और मजदूरी पर इसका असर पड़ता की अर्थव्यवस्था में कृषि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार भी है। यदि खेती लगातार नुकसान देने लगेगी, तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और पलायन बढ़ेगा। किसान शहरों की ओर रोजगार की तलाश में जाएंगे, जिससे शहरी क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। पहले ही महानगर भीडमा और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं । साथ-साथ पशुपालन आजीविका का महत्त्वपूर्ण साधन है। अत्यधिक गर्मी के कारण पशुओं में दूध उत्पादन की क्षमता कम हो जाती है। चारे और पानी की कमी से उनकी सेहत पर भी असर पड़ता है। मुर्गी पालन उद्योग भी तापमान बढ़ने से प्रभावित हो रहा है। गर्मी बढ़ने पर पक्षियों की मृत्यु दर बढ़ जाती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। फलों और सब्जियों की खेती भी इस संकट से अछूती नहीं है। अधिक तापमान के कारण फल समय से पहले पक जाते हैं और उनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है। सब्जियों की पैदावार घटने से बाजार में कीमतें बढ़ती हैं और महंगाई आम लोगों की रसोई तक पहुंच जाती है।
भारत में चावल उत्पादन पर मंडराता खतरा भी चिंता का विषय है। चावल केवल एक फसल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के भोजन का आधार है। पूर्वी भारत सबसे बड़ा धान उत्पादक क्षेत्र है। यदि यहां तापमान लगातार बढ़ता रहा और पानी की उपलब्धता घटती गई, तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। यह स्थिति केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती होगी। खाद्यान्न की कमी से कीमतें बढ़ेंगी, तो गरीब तबके पर बोझ बढ़ेगा और सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है। इस संकट का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इसके लिए सबसे कम जिम्मेदार लोग ही सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। गांवों के गरीब किसान, खेतिहर मजदूर और छोटे उत्पादक पर्यावरण को सबसे कम नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत वही चुका रहे हैं। दूसरी ओर, दुनिया के विकसित देशों ने दशकों तक औद्योगिक विकास के नाम पर भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन किया। आज जब पृथ्वी गर्म हो रही है, तब उसका दुष्परिणाम विकासशील देशों को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए जलवायु न्याय की चर्चा भी अब वैश्विक मंचों पर तेज हो रही है।
कृषि नीति में अब हमें व्यापक बदलाव करने होंगे। किसानों को मौसम की सटीक जानकारी, फसल बीमा और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी होगी। सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई प्रणाली और प्राकृतिक खेती जैसे विकल्प भविष्य के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने, पेड़ लगाने और प्रदूषण कम करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे। केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि समाज को भी अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। अत्यधिक उपभोग, संसाधनों की बर्बादी और प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता ने ही इस संकट को जन्म दिया है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बना कर नहीं चलेगा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन और कठिन हो जाएगा।
हमें यह समझना होगा कि धरती केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। खेतों की हरियाली केवल किसानों की नहीं, पूरे समाज के लिए जीवन है। यदि खेती संकट में पड़ेगी, तो शहर भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। भोजन की हर थाली खेतों से होकर गुजरती है और खेतों का भविष्य अब जलवायु परिवर्तन की आग में झुलस रहा है। यह समय केवल चिंतन का नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प का है। यदि आज भी दुनिया ने जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में सूखी धरती और खाली खेत कठोर वास्तविकता बन सकते हैं। इसलिए यह केवल पर्यावरण का मुद्दा
“भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए भा वैश्विक ताप से उपजा संकट अधिक चिंताजनक है। यहां करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है। खेत केवल अन्न नहीं उगाते, वे गांवों की अर्थव्यवस्था, परिवारों की उम्मीदें और समाज की स्थिरता को भी जीवित रखते हैं। जब तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर पहुंच जाता है और लू के थपेड़े लगातार कई दिनों तक चलते हैं, तब सबसे पहले खेत प्रभावित होते हैं। मिट्टी की नमी समाप्त होने लगती है। फसलों का विकास एक जाता है और उत्पादन में भारी गिरावट आने लगती है। विशेष रूप से धान जैसी फसलें अत्यधिक तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भारत में धान की पैदावार पर बड़े खतरे की आशंका जताई गई है।” (साभार -जनसत्ता ,नई दिल्ली ,4-6-2026)















