संजय कुमार / घरेलू गौरैया (House Sparrow – Passer domesticus) मनुष्य के सबसे निकट रहने वाले पक्षियों में से एक है। कभी यह हर आँगन, छत और खपरैल वाले घर की पहचान हुआ करती थी, लेकिन आज कई शहरों,गाँवों और कस्बों में इसकी चहचहाहट सुनाई देना दुर्लभ होता जा रहा है। यही कारण है कि गौरैया संरक्षण का विषय केवल पर्यावरणविदों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया है।
भारत की संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियाँ
IUCN रेड लिस्ट में भारत की लगभग 182 पक्षी प्रजातियाँ गंभीर रूप से संकटग्रस्त (CR), संकटग्रस्त (EN), सुभेद्य (VU) और संकट-निकट (NT) श्रेणियों में सूचीबद्ध हैं। इनमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, बंगाल फ्लोरिकन, विभिन्न गिद्ध प्रजातियाँ और सारस जैसे पक्षी शामिल हैं। इन प्रजातियों का संरक्षण वैश्विक जैव-विविधता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
IUCN रेड लिस्ट और गौरैया की स्थिति
प्रकृति संरक्षण के लिए कार्य करने वाली संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) विश्वभर की वन्य प्रजातियों का मूल्यांकन कर उन्हें रेड लिस्ट में वर्गीकृत करती है। 1 अक्टूबर 2016 को IUCN ने घरेलू गौरैया (Passer domesticus) का मूल्यांकन किया और उसे “Least Concern (LC) – कम चिंताजनक” श्रेणी में रखा।

इस वर्गीकरण का आधार यह था कि विश्वभर में गौरैया की अनुमानित आबादी लगभग 89.6 करोड़ से 131 करोड़ के बीच है तथा यह अंटार्कटिका, चीन और जापान को छोड़कर लगभग सभी महाद्वीपों में पाई जाती है। इसलिए वैश्विक स्तर पर इसके विलुप्त होने का तत्काल खतरा नहीं माना गया। 2021 में प्रकाशित एक बड़े वैज्ञानिक अध्ययन ने दुनिया की लगभग 9,700 पक्षी प्रजातियों की संख्या का अनुमान लगाया था। उस अध्ययन में हाउस स्पैरो की वैश्विक आबादी लगभग 1.6 अरब (1.6 billion) बताई गई थी, जिससे यह दुनिया के सबसे अधिक संख्या वाले पक्षियों में शामिल है।
IUCN रेड लिस्ट की नौ श्रेणियाँ
IUCN प्रजातियों को निम्नलिखित नौ श्रेणियों में वर्गीकृत करता है—
- विलुप्त (EX) – प्रजाति पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
- वन से विलुप्त (EW) – प्राकृतिक आवास में नहीं मिलती, केवल कैद या संरक्षण केंद्रों में जीवित है।
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त (CR) – विलुप्त होने के अत्यंत निकट।
- संकटग्रस्त (EN) – विलुप्ति का बहुत अधिक खतरा।
- सुभेद्य (VU) – भविष्य में विलुप्ति के उच्च जोखिम में।
- संकट-निकट (NT) – निकट भविष्य में संकटग्रस्त हो सकती है।
- कम चिंताजनक (LC) – वर्तमान में विशेष खतरा नहीं।
- अपर्याप्त डेटा (DD) – पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं।
- अमूल्यांकित (NE) – अभी तक मूल्यांकन नहीं किया गया।
घरेलू गौरैया वर्तमान में LC (Least Concern) श्रेणी में शामिल है।
भारत में गौरैया की वास्तविक स्थिति
हालाँकि IUCN की श्रेणी वैश्विक स्थिति को दर्शाती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर गौरैया की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। State of India’s Birds 2023 रिपोर्ट के अनुसार देश के अनेक क्षेत्रों में गौरैया की आबादी लगातार घट रही है। इसलिए वैश्विक स्तर पर सुरक्षित मानी जाने वाली यह प्रजाति भारत में संरक्षण की आवश्यकता महसूस करा रही है।
गौरैया की संख्या घटने के प्रमुख कारण
1. घोंसले बनाने की जगहों का अभाव
पुराने घरों में रोशनदान, छज्जे और खपरैल होते थे जहाँ गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। आधुनिक इमारतों में ऐसे स्थान लगभग समाप्त हो गए हैं।
2. भोजन की कमी
कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से कीट-पतंगे कम हो गए हैं, जबकि गौरैया के बच्चों का प्रमुख भोजन यही होते हैं। खुले में अनाज मिलने की परंपरा भी कम हो गई है।
3. प्रदूषण और शोर
शहरीकरण, वाहन प्रदूषण और बढ़ता ध्वनि प्रदूषण गौरैया के लिए प्रतिकूल वातावरण तैयार करते हैं।
4. प्राकृतिक शत्रुओं की वृद्धि
बिल्लियों, कौओं तथा अन्य शिकारी पक्षियों की संख्या बढ़ने से गौरैया पर दबाव बढ़ा है।
5. आधुनिक कृषि पद्धतियाँ
मशीनीकरण के कारण खेतों में पहले की तरह बिखरा हुआ अनाज नहीं बचता, जिससे गौरैया का प्राकृतिक भोजन स्रोत कम हुआ है।
गौरैया संरक्षण की पहल
भारत में गौरैया के संरक्षण हेतु अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। लोगों को गौरैया संरक्षण के लिए जागरूक किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow Day) मनाया जाता है।
दिल्ली और बिहार ने गौरैया को अपना राज्यकीय पक्षी घोषित किया है, जिससे इसके संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ी है।
घरेलू गौरैया भले ही IUCN रेड लिस्ट में “कम चिंताजनक” श्रेणी में आती हो, लेकिन भारत के अनेक क्षेत्रों में इसकी घटती संख्या चिंता का विषय है। संरक्षण प्रयासों, पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली और पक्षी-अनुकूल आवासों के निर्माण द्वारा हम इस प्यारे पक्षी को अपने आसपास बनाए रख सकते हैं। कहा जा सकता है कि IUCN की लाल किताब में गौरैया सुरक्षित दिखाई देती है, लेकिन हमारे आँगन से उसकी अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि स्थानीय स्तर पर उसके संरक्षण के लिए अभी से गंभीर प्रयास आवश्यक हैं।
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