संजय कुमार / ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा में समुद्री किनारे पर स्थित ‘द बर्ड्स’ शहर से चर्चित शहर वैंकूवर है, जहाँ गौरैया- हाउस स्पैरो की विशालकाय मूर्ति लगी है। द बर्ड्स में मायफैनवी मैकलेओड द्वारा घरेलू गौरैया को चित्रित करने वाली बाहरी मूर्तियों की एक जोड़ी शामिल है, जिसे 2010 के शीतकालीन ओलंपिक के बाद दक्षिणपूर्व फाल्स क्रीक ओलंपिक प्लाजा में स्थापित किया गया था, जो वैंकूवर, ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा में 2010 ओलंपिक गांव की साइट के रूप में कार्य करता था।
विशालकाय गौरैया मूर्ति में एक नर और एक मादा घरेलू गौरैया है, जो लगभग पांच मीटर लंबा है। मैकलियोड अल्फ्रेड हिचकॉक की 1963 में ‘द बर्ड्स’ नाम की फिल्म से प्रेरित है। covapp.vancouver.careadkong.com के अनुसार मूर्तियों का निर्माण हेवी इंडस्ट्रीज द्वारा किया गया था, जिसमें कुछ बॉडीवर्क अर्ध-कठोर प्लास्टिक पार्ट्स रिपेयर द्वारा पूरा किया गया था। वैंकूवर की कलाकार मायफैनवी मैकलियोड ने इसे बनाया। उनका मकसद सिर्फ सुंदरता नहीं था। मकसद साफ़ था सन्देश देना। आमतौर पर इंसान चिड़िया से बड़ा होता है। यहाँ गौरैया को 18 फुट का बनाकर मैकलियोड ने इंसान और चिड़िया का रिश्ता को उलट दिया। ताकि हम रुककर सोचें कि प्रकृति में हमारी हैसियत क्या है।

कलाकार ने गहरा संदेश दिया है। गौरैया खूबसूरत लगती है, पर ये ‘विदेशी प्रजाति’ है। इस कलाकृति को एक शहरी चौक में स्थापित करना, न केवल इस बात को उजागर करता है कि गौरैया के लिए अब ‘प्राकृतिक’ वातावरण कैसा बन गया है, बल्कि यह किसी ‘विदेशी’ प्रजाति को लाने से पैदा होने वाली ‘छोटी’ सी समस्या और उसके बाद हमारे पारिस्थितिकी तंत्र पर मचने वाली तबाही की बात को भी और मज़बूती से सामने लाता है…द बर्ड्स हमें हमारे अतीत की याद दिलाती है, लेकिन साथ ही यह भविष्य को चुनौती देने की भी आकांक्षा रखती है। मुझे उम्मीद है कि यह कलाकृति लोगों में ऐसी समझ पैदा करेगी, जिससे उनमें आपसी ज़िम्मेदारी और एक-दूसरे की परवाह करने की भावना और भी ज़्यादा मज़बूत होगी।
इसे बनाने में मटीरियल के तौर पर स्टेनलेस स्टील, कास्ट एल्यूमिनियम का इस्तेमालकिया गया। कुछ बॉडीवर्क अर्ध-कठोर प्लास्टिक पार्ट्स रिपेयर द्वारा पूरा किया गया । नर और मादा गौरैया – दोनों करीब 5.5 मीटर यानी 18 फुट ऊंची हैं। इंसान इनके सामने चींटी जैसा लगता है। 23 नवंबर 2017 को मरम्मत के लिए हटाई गई, क्योंकि लोग इस पर चढ़ते थे, साइकिल-स्केटबोर्ड चलाते थे। नर गौरैया की पूंछ बुरी तरह टूट गई थी। इसकी मरम्मती पर करीब 3.5 करोड़ रुपये खर्च हुए। पब्लिक आर्ट के रख रखाव फंड से पैसा लगा। 14 अगस्त 2018 को फिर से लगाई गई, ताकि 19 अगस्त से शुरू होने वाली 27वीं इंटरनेशनल ऑर्निथोलॉजिकल कांग्रेस के लिए तैयार रहे। इस गौरैया को कुछ लोग पसंद करते हैं, तो कुछ इसे ‘अजीब’ कहते हैं। पर बच्चे इस पर चढ़कर खेलते हैं – कलाकार का मकसद सफल कि लोग इससे जुड़ें।
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