जब इंसान ने प्रकृति से जंग हारी : गौरैया का नरसंहार

“चीन में 1958 में माओ त्से-तुंग ने ग्रेट लीप फॉरवर्ड के तहत अभियान शुरू किया और, चूहे,मक्खी,मच्छर और गौरैया को मारने का आदेश दिया “ संजय कुमार/चीन में जब गौरैया को चुन-चुन कर मारा जा रहा था, तब गौरैया छुपने के लिए सुरक्षित स्थान पर जाने लगी थी। झुंड बनाकर गौरैया, पीकिंग स्थित पोलैंड के…

“चीन में 1958 में माओ त्से-तुंग ने ग्रेट लीप फॉरवर्ड के तहत अभियान शुरू किया और, चूहे,मक्खी,मच्छर और गौरैया को मारने का आदेश दिया “

संजय कुमार/चीन में जब गौरैया को चुन-चुन कर मारा जा रहा था, तब गौरैया छुपने के लिए सुरक्षित स्थान पर जाने लगी थी। झुंड बनाकर गौरैया, पीकिंग स्थित पोलैंड के दूतावास में भी जा छुपीं। गौरैया को मारने के लिए दूतावास में लोग प्रवेश करने  लगे, अधिकारियों ने बाहर ही रोक दिया। लोगों के सिर पर खून सवार था। पूरे पोलिश दूतावास को चारों तरफ से घेर लिया गया। गौरैया को निकालने के लिए दो दिन तक लोग लगातर ड्रम पीटे गए। आखिरकार ड्रमों के शोर से गौरैया के झुंड ने दम तोड़ दिया। सफाई कर्मियों के बेलचों से मर चुकी प्यारी गौरैया को दूतावास से बाहर फेंका गया।

यह शर्मनाक कांड उस समय हुआ जब 1958 में चीन के शासक  माओ जेडोंग जिसे माओत्सेतुंग के नाम से भी जाना जाता है, ने आकाल पड़ने पर एक मुहिम शुरू की। फोर पेस्ट्स अभियान के तहत नुक़सान पहुंचाने वाले चार जीव-जंतुओं को मारने का फैसला सुनाया। चूहे, जिनसे प्लेग फैलता है, मच्छर से मलेरिया और मक्खियां से हैजा हैं। इनके साथ चौथी थी गौरैया। जेडोंग का मानना था कि गौरैया फसल के दाने खा जाती है जिससे काफी नुकसान हो रहा है। चारों को मारने का अभियान तेजी से चल निकला। मक्खी, मच्छर और चूहे तो छिप गए लेकिन गौरैया को ढूँढना आसान था। उन्हें चारो ओर ढूंढा जाने लगा और जहां भी गौरैया दिखी उसे मार दिया गया। इस अभियान से गौरैया चीन से विलुप्त हो गयी।

गौरैया को मारना दुनिया की सबसे जानलेवा पर्यावरणीय आपदा की शुरुआत थी। उसका असर आज भी महसूस किए जा रहे हैं। इन “कीटों” में से तीन को शामिल करने का कारण तो कुछ हद तक समझ में आता है मसलन, मक्खियाँ, मच्छर और चूहे बीमारियाँ फैला सकते हैं, और आज भी इंसान इन्हें नियंत्रित करने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन गौरैयों को इन तीनों के साथ क्यों शामिल किया गया? तो जवाब था, बहुतायत में पाई जाने वाली गौरैया को अनाज के बीज खाने से रोकना चाहते थे—क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे खेती के उत्पादन को खतरा है। चीन ने अपने नागरिकों को इन चिड़ियों के पीछे इस कदर पड़ने का निर्देश दिया कि वह नरसंहार शायद मानव इतिहास में बेमिसाल ही रहेगा।

गौरैया मरो अभियान के दौरान, लोग घोंसलों और अंडों को तोड़ते गए, और गौरैयों का पीछा करते खोज खोज कर मारा। अभियान में ठीक-ठीक कहना नामुमकिन है कि कितनी गौरैयाँ मरीं, लेकिन कई अनुमानों के मुताबिक यह संख्या करोड़ों में थी। कह सकते हैं कि गौरैया विलुप्त ही हो गयी। वहीँ, दो साल बाद, गौरैयों की गैर-मौजूदगी से एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया। टिड्डियों जैसे कीड़े-मकोड़े, जिन्हें पहले गौरैयाँ और दूसरे पक्षी काबू में रखते थे, 1960 में बेकाबू होकर फैल गए। यह वही साल था जब  एक दुखद संयोग के तौर पर चीन में ज़बरदस्त सूखा भी पड़ा था। फ़सलें पूरी तरह तबाह हो गईं। आकाल पड़ा, बड़ी तबाही हुई। चीन में पड़ा यह अकाल 1962 तक तो खत्म हो गया था लेकिन जो लोग इस आपदा में बच निकले, उनके लिए यह आज भी बीती बात नहीं बन पाई है। 2023 में प्रकाशित दो अध्ययनों में ‘ग्रेट स्पैरो कैंपेन’ के कारण हुई भुखमरी के जीवन भर रहने वाले स्वास्थ्य प्रभावों की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग उस समय जीवित बच गए थे (जिनमें से कई अब 80 साल से ज़्यादा उम्र के हैं) और जो लोग उस अकाल के ठीक बाद पैदा हुए थे, उन सभी को आम आबादी की तुलना में कहीं ज़्यादा दर से स्वास्थ्य समस्याओं या “गैर-संक्रामक बीमारियों” का सामना करना पड़ा।

चीन में गौरैयों का कत्लेआम से पड़े प्रभाव पर डच इतिहासकार फ्रैंक डिकोतर ने अपनी किताब “द ग्रेट फेमिंस इन माओज़ चाइना” में लिखते हैं गौरैयों की कत्लेआम के बाद आए ऐतिहासिक अकाल में कितने लोग मारे गए थे, इसे लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है। डिकोतर से पहले के अनुमानों में मरने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ से लेकर सवा तीन करोड़ तक बताई गई है। लेकिन डच इतिहासकार फ्रैंक डिकोतर मानते हैं कि 1958 से 1962 के बीच क़रीब साढ़े चार करोड़ लोग अनावश्यक रूप से मारे गए थे। चूहे, मच्छर, मक्खियां-कीट और गौरैया को माओ चीन के विकास में बाधा के रूप में देखते थे। माओ के आह्वान पर  चीन के लोगों की तमाम शक्ति को इनसे छुटकारा पाने में लगा दिया गया था। प्राकृतिक इतिहास के विशेषज्ञ और स्पैरो नाम की किताब लिखने वाले जिम टोड कहते हैं, “गौरैया को इसलिए इस सूची में शामिल किया गया था क्योंकि वो बहुत अधिक अनाज खाती हैं। लेकिन माओ को शायद बाद में पता चला कि गौरैया किसान मित्र है, दुश्मन नहीं। फसलों का संरक्षक है। फसलों पर लगने वाले कीड़ों को अपना आहार बनाती है। बीजों को आहार बना कर इकोसिस्टम को मजबूत बनाती है।    

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

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*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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