जनसत्ता संवाद/ महासागरों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा गंभीर वैश्विक संकट बन चुका है। इस संकट पर काबू पाने के लिए तकनीकी उपाय पर जोर दिया जा रहा है। इसका असली समाधान प्लास्टिक की खपत घटाने और टिकाऊ विकल्प अपनाने में है।
समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण इस सदी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नीतिगत चुनौतियों में से एक बन चुका है। तेज औद्योगिक विकास, एकल-उपयोग प्लास्टिक की बढ़ती खपत और कमजोर कचरा प्रबंधन के कारण समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, हर वर्ष 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक समुद्री पर्यावरण में पहुंचता है, जबकि समुद्रों में कुल प्लास्टिक का भंडार 75 से 199 मिलियन टन के बीच है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो 2040 तक समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ सकता है।
पर्यावरणीय नुकसान के अलावा, यह संकट आर्थिक और सामाजिक बोझ भी पैदा करता है। समुद्री प्लास्टिक कुल समुद्री कचरे का लगभग 85 फीसद हिस्सा है। पर्यटन, मत्स्य पालन और तटीय आजीविका पर इसका आर्थिक प्रभाव हर वर्ष लगभग छह से 19 अरब अमेरिकी डालर आंका गया है। समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए पुनर्चक्रण और नवाचार आधारित समुद्री जैव प्रौद्योगिकी नीतियां जरूरी हैं। प्लास्टिक लंबे समय तक टिकाऊ रहता है और कई बार सदियों तक नष्ट नहीं होता। समय के साथ बड़े प्लास्टिक टुकड़े रासायनिक, भौतिक और जैविक प्रक्रियाओं से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक (पांच मिमी से छोटे)और नैनोप्लास्टिक में बदल जाते हैं। ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण तटीय क्षेत्रों से लेकर गहरे समुद्री तल और ध्रुवीय क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। महासागरों में लगभग 170 ट्रिलियन प्लास्टिक कण मौजूद हैं, जो ‘प्लास्टिक स्माग’ जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं।
माइक्रोप्लास्टिक समुद्री जीवों के जरिए खाद्य श्रृंखला में पहुंचकर मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं। दूसरी ओर, वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और यह लगभग 450 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुंच चुका है, जबकि पुनर्चक्रण की दर 10 फीसद से भी कम है। यह स्थिति दिखाती है कि समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण वैश्विक संसाधन प्रबंधन की गहरी विफलता का संकेत है।
समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए कचरा प्रबंधन, एकल-इस्लेमाल प्लास्टिक पर प्रतिबंध और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने जैसे पारंपरिक उपाय जरूरी हैं, लेकिन ये पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं। यूएनईपी ने समुद्री पर्यावरण में प्लास्टिक के लंबे समय तक बने रहने और लगातार जमा होने को देखते हुए दीर्घकालिक और व्यापक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दिया है। मशीनों की मदद से समुद्र से प्लास्टिक हटाना बहुत महंगा है और माइक्रोप्लास्टिक को हटाने में काफी हद तक (फाइल फोटो) असफल रहता है। ‘ओशन क्लीनअप’ जैसी पहल ने समुद्री भंवरों से माइक्रोप्लास्टिक हटाने में कुछ प्रगति दिखाई है, लेकिन इसकी क्षमता और बड़े स्तर पर विस्तार अभी भी चुनौती बने हुए हैं। भारत में ‘स्वच्छ सागर सुरक्षित सागर जैसी तटीय सफाई पहल ने जागरूकता और सफाई को बढ़ावा दिया है, लेकिन ये समुद्र तक पहुंचने वाले प्लास्टिक कचरे को शुरुआत में रोकने में खास असरदार नहीं हैं।
*संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, हर वर्ष 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक समुद्री पर्यावरण में पहुंचता है। महासागरों में कुल प्लास्टिक का भंडार 75 से 199 मिलियन टन के बीच है। प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो 2040 तक समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ सकता है। पर्यावरणीय नुकसान के अलावा, यह संकट आर्थिक और सामाजिक बोझ भी पैदा करता है।* (साभार :- जनसत्ता,नई दिल्ली-19.5.2026)















