पर्यावरण संकट से जूझती पूरी दुनिया

प्रो. (डॉ.) श्याम नंदन प्रसाद/ आज सम्पूर्ण विश्व गंभीर पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, वनों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग तथा प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन मानव अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि मुख्यतः मानव जनित गतिविधियों का परिणाम है। यदि समय रहते ठोस…

प्रो. (डॉ.) श्याम नंदन प्रसाद/ आज सम्पूर्ण विश्व गंभीर पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, वनों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग तथा प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन मानव अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि मुख्यतः मानव जनित गतिविधियों का परिणाम है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे ।

वनों की कटाई : संकट का प्रमुख कारण

वर्तमान समय में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर्यावरण असंतुलन का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। शहरीकरण एवं भवन निर्माण की दौड़ में पेड़ों का निरंतर विनाश हो रहा है। उदाहरणस्वरूप, पटना जैसे शहरों में अपार्टमेंट और भवन निर्माण के दौरान पेड़ों की कटाई के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर सामान्य स्तर से ऊपर रहता है।

पेड़ केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन के आधार हैं। जब हम एक वृक्ष काटते हैं, तब वास्तव में हम अपने ही भविष्य पर प्रहार करते हैं ।

चिंताजनक आँकड़े

विश्व स्तर पर लगभग 3.04 ट्रिलियन वृक्ष मौजूद हैं, जिससे प्रति व्यक्ति औसतन 422 वृक्ष उपलब्ध हैं। इसके विपरीत भारत में प्रति व्यक्ति वृक्षों की संख्या मात्र 28 है, जो अत्यंत चिंताजनक और असंतुलित स्थिति को दर्शाती है।

यह आँकड़ा स्पष्ट करता है कि भारत में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और वन संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है ।

समाधान : वृक्षारोपण और संरक्षण

पर्यावरण संकट से उबरने के लिए केवल पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी समुचित देखभाल भी आवश्यक है। लगाए गए पौधों को परिवार के सदस्य की तरह तब तक संरक्षण देना होगा, जब तक वे बड़े होकर पर्यावरण संतुलन में योगदान देने योग्य न बन जाएँ ।

आवश्यक कदम:

  • बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान
  • अवैध कटाई पर रोक
  • वनों का पुनर्जीवन (वनीकरण)
  • जल एवं ऊर्जा संरक्षण
  • जन-जागरूकता अभियान
  • स्वच्छ एवं हरित शहरों का विकास

शिक्षा संस्थानों की भूमिका

शिक्षण संस्थान पर्यावरण जागरूकता के सबसे प्रभावी केंद्र बन सकते हैं। नालंदा खुला विश्वविद्यालय में छात्रों को पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रेरित करने के प्रयास सराहनीय हैं ।

विश्वविद्यालय परिसर में स्थित वृक्षों का वैज्ञानिक वर्गीकरण, उनके औषधीय एवं आर्थिक महत्व का प्रदर्शन, तथा पर्यावरण विषयक संगोष्ठियों का आयोजन विद्यार्थियों में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं ।

निष्कर्ष

पर्यावरण संकट केवल वैज्ञानिकों या सरकारों की चिंता नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि हम आज वृक्षों, जल, वायु और प्रकृति की रक्षा करेंगे, तभी कल मानव सभ्यता सुरक्षित रह सकेगी।

एक स्वच्छ, हरित, सुंदर एवं प्रदूषणमुक्त समाज का निर्माण सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। यही समय है :- प्रकृति को बचाने का, भविष्य को संवारने का ।

प्रो. (डॉ.) श्याम नंदन प्रसाद

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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